VIDEO: छोरों पर भारी हैं ये छोरियां, इस तरह करती हैं ‘दंगल’ की तैयारी

Priya Gautam | News18Hindi
Updated: July 16, 2017, 7:54 AM IST
Priya Gautam | News18Hindi
Updated: July 16, 2017, 7:54 AM IST
फिल्म 'दंगल' में पहलवान छोरियों गीता बबीता और फिल्म 'सुल्‍तान' की आरफा को तो आपने पर्दे पर अखाड़े में पसीना बहाते देखा होगा, लेकिन असलियत में पहलवानी कर रही लड़कियां हजार गुना ज्‍यादा मेहनत करती हैं और अच्‍छे-अच्‍छे पहलवानों को धूल चटा देती हैं. इनकी कलाइयां नाजुक नहीं फौलादी होती हैं. ऐसी बेटियां आज ओलंपिक में देश को सोना दिलाने का सपना बुन रही हैं.

11 से 17 साल की उम्र में जहां अन्‍य लड़कियां सजती और संवरती हैं वहीं ये लड़कियां इस उम्र में 20-20 किलो के डंबल और स्‍टील की रॉड उठाकर कसरत करती हैं और पहलवानी के गुर सीखती हैं. आप अगर इनकी रोजाना की खुराक और हर दिन की मेहनत को देखेंगे तो आपको भी यकीन नहीं होगा.

खिलौनों की तरह घुमाती हैं डंबल और रॉड

पहलवानी सीख रहीं ये लड़कियां 20-20 किलो के डंबलों को ऐसे हाथों में उठाती हैं जैसे ये खिलौने हों. हाथों की ग्रिप मजबूत करने के लिए कई मीटर ऊंचाई तक रस्‍सी के सहारे चढ़ जाती हैं. दौड़ती हैं. कच्‍चे अखाड़े को खोदती हैं फिर उस पर पटरा फेरती हैं. इसके बाद स्‍कूल भी जाती हैं.

स्‍टील की रॉड उठाकर कसरत करती पहलवान


ऐसा होता है नाश्‍ता

दिव्‍या बताती हैं कि वे नाश्‍ते में छह अंडे और दो किलो दूध लेती हैं. वहीं संजना कहती हैं कि वे कम से कम छह केले और बादाम घुला हुआ एक किलो दूध लेती हैं. हरियाणा की रिंकल भीगे हुए बादाम खाने के साथ ही चार से छह गिलास दूध लेती हैं.

जबकि आरजू ने कहा कि वे कभी एक लीटर छाछ, बादाम, अंडे, चार परांठे तो कभी केले, दूध, ब्रैड जैम,   का नाश्‍ता करती हैं. वे कहती हैं दो चार मौसमी फल तो कहां चले जाते हैं पता भी नहीं चलता.

लंच में जमकर खाती हैं

चांदनी चौक से आकर मास्‍टर चंदगीराम अखाड़े में दांवपेंच सीखने वाली दिव्‍या बताती हैं कि वे सुबह 4 बजे उठ जाती हैं. रनिंग करती हैं. अखाड़े में आती हैं. तीन घंटे तक दांव और व्‍यायाम करती हैं. रस्‍सी चढ़ती हैं. अखाड़े पर पटरा फेरती हैं. शाम को फिर मेहनत करती हैं.

आम लड़कियों की तुलना में ज्‍यादा खाने वाली महिला पहलवान लंच करती हुई


पहलवान संजना कहती हैं कि उनका लंच भी काफी हैवी होती है. लंच में वे एक प्‍लेट चावल, दो कटोरी दही, आधा किलोग्राम तक सलाद, एक से दो कटोरी तक दाल ले लेती हैं. वे फल, जूस और दूध ज्‍यादा लेती हैं. प्रोटीन से भरपूर खाना लेती हैं. वहीं रात का खाना लंच से हल्‍का होता है, लेकिन उसकी मात्रा सामान्‍य व्‍यक्ति के खाने से ज्‍यादा ही होती है.

सुनिए पहलवानों की कहानी, उन्‍हीं की जुबानी

 मैंने छोरों को बहुत मारा है - रिंकल

हरियाणा के छोटे से कलावती गांव की रिंकल को पहलवानी के लिए उनके माता-पिता ने चार साल का वक्‍त दिया है. रिंकल मां और पिताजी अक्‍सर रिंकल से मिलने मास्‍टर चंदगीराम अखाड़े में भी आते हैं. स्‍वभाव से बेहद बोल्‍ड रिंकल एक नामी रेसलर बनना चाहती हैं.

किसी भी मुसीबत के वक्‍त में लड़ने-भिड़ने से परहेज न करने वाली रिंकल कहती हैं, "मैंने अपने गांव में छोरों को बहुत मारा है. कोई भी मुझसे ही नहीं किसी और से भी गलत बोलता था तो बर्दाश्‍त नहीं होता था. सबसे पहले तो उसकी कुटाई होती थी."

हालांकि मैं काफी शांत रहती हूं. बचपन से ही ज्‍यादा किसी से बोलती नहीं. मां कहती है बचपन में इतनी सुस्‍त थी मैं कि डॉक्‍टर से दवा दिलवानी पड़ी. स्‍वभाव में चुप्‍पी अभी भी है. लेकिन मार-पीट चलती रहती है. मेरे पापा ने कहकर भेजा है कि कामयाब होकर ही गांव में आना. इसलिए मैं खूब मेहनत कर रही हूं.

शर्म छोड़ी, बाल कटवाए, हिम्‍मत दिखाई तब पहलवान बनने आई - आरजू

हरियाणा के निलोठी गांव से आई आरजू के दांव देखकर पुरुष पहलवान भी दबाते हैं दांतों तले उंगलियां


मेरे कमर तक लंबे बाल थे. लड़कियां अपने लंबे बालों पर इतराती थीं, मुझे भी अपने बाल पसंद थे. लेकिन एक बार प्रो कुश्ती लीग देखने आ गई और बस मन में बात ठहर गई कि पहलवान ही बनना है. लंबे बाल कुछ बाधा से लगे तो कटवा डाले और एक-एक इंच के बाल रख लिए.

मेरा स्‍वभाव पहले से ही तेजतर्रार था. अक्‍सर भाई के साथ ही आना-जाना होता था. कोई कुछ बोलता था, भाई कुछ एक्‍शन ले उससे पहले मैं धुन देती थी. इन्‍हीं कुछ बातों ने भाई का भरोसा दिलवाया और आज मैं पहलवानी सीख रही हूं.

लड़कियों को अगर कुछ करना है तो उन्‍हें अपनी शर्म छोड़नी होगी. वरना करती रहो शर्म और कुछ नहीं कर पाओगी. बाकी लोग भी तुम्‍हें शर्म करवाते रहेंगे. मां-पिता को भी चाहिए कि वे जैसे अपने बेटों पर ध्‍यान देते हैं बेटियों पर भी दें और उन्‍हें कुछ बेहतर करने की आजादी दें.

इतना आसान नहीं है पहलवान बनना- शगुन और विनीता

गीता फोगाट और बबीता फोगाट की तरह नाम रोशन करने का सपना देखने वाली शगुन और विनीता का कहना है कि पहलवान बनना बहुत कठिन है. लोगों को लगता है कि सिर्फ ज्‍यादा खाकर और ताकत जुटाकर आप पहलवान बन सकते हैं. लेकिन ऐसा नहीं है.

शगुन बताती हैं, “सुबह चार बजे से उठकर मेहनत करनी होती है. वो खाना होता है जो जरूरी होता है. चटपने करने का मन होता है लेकिन मिलता ही नहीं. रोज पसीना बहाना होता है. दांव सीखने होते हैं और सबसे बड़ी चीज है कि हमेशा मन में यही रहता है कि अपने आप को साबित करना है, एक सफल  पहलवान बनना है.”

हरियाणा के मोखरा-मदीना गांव की इन दोनों पहलवानों के पिता भी राष्‍ट्रीय स्‍तर के पहलवान रह चुके हैं. विनीता कहती हैं कि अपने पिता को देखकर ही उन्‍हें मन हुआ कि वे भी पहलवानी करें. फिर गीता और बबीता के बारे में सुना.

मास्‍टर चंदगीराम अखाड़े में कुश्‍ती लड़ती दो महिला पहलवान


 

ये लड़कियां लड़कों से ज्‍यादा जुनूनी हैं. 

मास्‍टर चंदगीराम अखाड़े के संचालक और सुल्‍तान में सलमान खान के कोच रहे चुके पहलवान जगदीश कालीरमन कहते हैं कि पहलवानी में लड़कियां बहुत बेहतर कर सकती हैं और कर भी रही हैं. लड़कियां अपने शौक के प्रति ज्‍यादा जुनूनी और गंभीर होती हैं.

चूंकि पहलवानी में बहुत मेहनत करनी होती है तो खुराक भी आम लोगों की तुलना में ज्‍यादा होती है. कोई भी पहलवान एक दिन में इतनी मेहनत करता है कि सामान्‍य लोग एक हफ्ते में करते हैं. महिला पहलवानों को सामाजिक, शारीरिक और अन्‍य चुनौतियों से भी जूझना पड़ता है.
First published: July 16, 2017
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