रामनाथ कोविंद: दो बार चुनाव हारने के बाद भी कैसे बने रहे बीजेपी की पसंद

News18Hindi
Updated: June 20, 2017, 2:07 PM IST
रामनाथ कोविंद: दो बार चुनाव हारने के बाद भी कैसे बने रहे बीजेपी की पसंद
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Updated: June 20, 2017, 2:07 PM IST
दो साल पहले बिहार के राज्यपाल बने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति उम्मीदवार चुनते हुए एनडीए ने सभी को हैरानी में डाल दिया. कोविंद की राजनीति मं​डलियों में बहुत अच्छी पहचान नहीं रही है लेकिन वो बीजेपी के दलित चेहरे के तौर बड़ी पहचान रखते हैं.

कोविंद सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के वकील रह चुके हैं और 16 साल वकालत की प्रैक्टिस के बाद उन्होंने 1991 में बीजेपी से जुड़ गए थे. फिर बिहार के राज्यपाल से अब संभावित राष्ट्रपति बनने तक का सफर तय किया है.

कोविंद वर्ष 1994 से 2006 तक दो बार लगातार बीजेपी से राज्य सभा सांसद रह चुके हैं. कोविंद बीजेपी दलित मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और अखिल भारतीय कोली समाज अध्यक्ष भी रहे. वर्ष 1976 में दलित वर्ग के कानूनी सहायता ब्युरो के महामंत्री भी रहे.

कानपुर देहात की डेरापुर तहसील के गांव परौंख में जन्मे रामनाथ कोविंद ने सुप्रीम कोर्ट में वकालत से करियर की शुरुआत की. वर्ष 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद वह तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई के निजी सचिव बने. इसके बाद भाजपा नेतृत्व के संपर्क में आए.

घाटमपुर से लड़े चुनाव
कोविंद को पार्टी ने वर्ष 1990 में घाटमपुर लोकसभा सीट से टिकट दिया लेकिन वह चुनाव हार गए. वर्ष 1993 व 1999 में पार्टी ने उन्हें प्रदेश से दो बार राज्यसभा में भेजा. पार्टी के लिए दलित चेहरा बन गये कोविंद अनुसूचित मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रवक्ता भी रहे.

घाटमपुर से चुनाव लड़ने के बाद कोविंद लगातार क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं से संपर्क में रहे. वर्ष 2007 में पार्टी ने उन्हें प्रदेश की राजनीति में सक्रिय करने के लिए भोगनीपुर सीट से चुनाव लड़ाया, लेकिन वह यह चुनाव भी हार गए.

प्रशासनिक कुशलता को महत्व
चुनावों में हार के बाद भी पार्टी ने उनकी संस्थागत और प्रशासनिक कुशलता को महत्व दिया. उनकी प्रशासनिक कुशलता उस वक्त भी देखी गई जब उनकी नियुक्ति पर बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने कहा था बिहार के राज्यपाल के तौर पर कोवीन्द की नियुक्ति से पहले उनसे सलाह नहीं ली गई थी. इसके बाद भी रामनाथ कोविंद का नीतीश कुमार के साथ कोई टकराव सामने नहीं आया.

रामनाथ कोविंद की राजनीतिक यात्रा मुख्य तौर पर समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों और उत्थान के इर्दगिर्द ही रही है. बीजेपी की एससी/एसटी विंग के प्रमुख रहने के अलावा वह केंद्र सरकार के विरुद्ध वर्ष 1997 में एससी/एसटी कर्मचारी अभियान भी से जुड़े. ​

बिहार में उन्हें अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति करने और उन्हें पदोन्नति देने में अनियमितताओं और फंड में गड़बड़ी की जांच के लिए न्यायिक आयोग का गठन करने को लेकर काफी प्रशंसा मिली थी.

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First published: June 20, 2017
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