इन वजहों से बीजेपी ने 'संकटमोचक' वेंकैया नायडू को बनाया उम्मीदवार

News18Hindi
Updated: July 18, 2017, 9:10 AM IST
इन वजहों से बीजेपी ने 'संकटमोचक' वेंकैया नायडू को बनाया उम्मीदवार
वेंकैया नायडू. साथ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह
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Updated: July 18, 2017, 9:10 AM IST
प्रमोद राघवन (ऐसोसिएट एडीटर , ETV न्यूज नेटवर्क)

केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू एनडीए की तरफ से उप-राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार होंगे. बीजेपी ने बहुत सोच समझकर वैंकेया नायडू का चेहरा तय किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के मुखिया अमित शाह की लंबी सोच का खाका इस फैसले से साफ नजर आता है. एनडीए सरकार के लिए आने वाले समय में वेकैंया नायडू कई तरह से ट्रंप कार्ड की भूमिका में होंगे. इस बात पर गौर करना जरूरी है कि वेकैंया नायडू को आखिर क्यों चुना गया?

क्या खास है वैंकेया नायडू में
वेंकैया नायडू के नाम को आगेकर बीजेपी ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं. बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, वेंकैया नायडू को उपराष्ट्रपति बनाने के पीछे मोदी सरकार की भविष्य को लेकर भी एक बड़ी रणनीति है. बीजेपी के एक बड़े नेता के मुताबिक, राज्यसभा में सरकार को आने वाले साल में कई महत्वपूर्ण मुद्दो पर सहमति बनानी है. कई योजनाओं पर मुहर लगवानी है. ऐसे में वेंकैया नायडू एक मजबूत भूमिका निभा सकते हैं.

नहीं रहा है व्यक्तिगत विरोध
वेंकैया नायडू की साफ बात करने की छवि उनका मजबूत हथियार है. किसी भी विपक्षी दल के नेता से वह सीधी बात करने का कद रखते हैं. कई विपक्षी नेताओं से उनके अच्छे व्यक्तिगत रिश्ते हैं, जो राज्यसभा में सहमति बनाने के काम आ सकते हैं. अभी तक के राजनीतिक इतिहास को खंगाले तो साफ है कि वेंकैया नायडू से कभी किसी विपक्षी नेता को किसी तरह का व्यक्तिगत विरोध नहीं रहा. नायडू के साथ जुड़ा ये प्लस प्वाइंट बीजेपी को भविष्य में काम आएगा.

दक्षिण भारत का हैं बड़ा चेहरा
आंध्रप्रदेश से ताल्लुक रखने वाले नायडू कई भाषा पर पकड़ रखते हैं. हिंदी और अंग्रेजी पर खासतौर पर जबरदस्त पकड़ है. दक्षिण भारत का एक बड़ा चेहरा हैं. दक्षिण भारत में बीजेपी को पहचान देने और कर्नाटक में पहली बार बीजेपी की सरकार बनवाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. कर्नाटक में येदियुरप्पा के भष्ट्राचार में घिरने के बाद राज्य में खड़ी हुई राजनीतिक उठापटक को बीजेपी की तरफ से वेंकैया नायडू ने ही संभाला था. कई महीनो तक वह बैंगलोर में कैंप कर बीजेपी नेताओं को येदियुरप्पा की तबकी बगावत में सहभागी होने से रोका था.

एनडीए को जोड़ने वाले शख्स
नायडू संघ से जुड़े रहे हैं. ऐसे में उपराष्ट्रपति पद पर नाम तय करने में आरएसएस की तरफ से उनको लेकर कोई विरोध नहीं था. उनकी छवि की बात करें तो राजनीतिक करियर में कोई बड़ा विवाद उनसे कभी नहीं जुड़ा. किसान परिवार से ताल्लुक रखने और साल 1970 से राजनीति में सक्रिय नायडू दो बार बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष, चार बार राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं. एनडीए के सदस्य दलों के नेताओं को भी उनके नाम पर कोई आपत्ति नहीं थी. एनडीए को एकजुट करने और एनडीए के साथ नए दलों को जोड़ने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. उनका राजनीतिक ज्ञान और गंभीर मुद्दो पर उनकी साफगोई बीजेपी को हमेशा फायदा पहुंचाती रही है.

कांग्रेस से जुड़े भष्ट्राचार के कई मुद्दो को उछालने से लेकर देश से जुड़े कई अहम मुद्दों और विपक्षी पार्टियों और नेताओं से जुड़े कई विवादस्पाद मुद्दों को मीडिया के सामने तय तरीके से रखने से लेकर उसे बड़े स्तर पर डिबेट का मुद्दा बनाने तक में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई है.

5 साल तक रहेंगे ट्रंप कार्ड
नायडू ने कई नाजुक मौकों पर बीजेपी की गिरती छवि को संभालने का काम बखूबी किया है. एनडीए सरकार को कई मोर्चों पर इस बात की मुश्किल आती रही है कि वह विपक्षी नेताओं में घुसपैठ तो कर लेती थी, लेकिन मुद्दों की राजनीति को नतीजे तक पहुंचाने से कहीं न कहीं थोड़ा पीछे रह जाती थी. अब विपक्षी नेताओं को समझाने के लिए और उन्हें अपनी सोच से सहमत कराने के लिए आने वाले समय में राज्यसभा के मुखिया के तौर पर नायडू होगें. साफ है एक तरह से बीजेपी के लिए वह अब अगले पांच साल एक ट्रंप कार्ड होंगे.
First published: July 18, 2017
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