बीजेपी याद करे, वाजपेयी के बारे में क्या लिखा था टाइम ने!


Updated: July 9, 2012, 11:56 AM IST
बीजेपी याद करे, वाजपेयी के बारे में क्या लिखा था टाइम ने!
उन्होंने कहा कि टाइम मैगजीन ने जून 2002 में उस वक्त के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ क्या लिखा था ये बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद को पढ़ना चाहिए था। गौरतलब है कि तब टाइम में वाजपेयी के स्वास्थ्य के बारे में नकारात्मक टिप्पणी की गई थी।

Updated: July 9, 2012, 11:56 AM IST
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर टाइम मैगजीन की कवर स्टोरी के बाद कांग्रेस और सरकार अपने नेता के बचाव में उतर आई हैं। गृह मंत्री पी चिदंबरम ने मनमोहन सिंह का बचाव करते हुए कहा कि पीएम देश को आर्थिक संकट से बाहर ले आएंगे। उन्होंने बीजेपी को अटल बिहारी वाजपेयी पर टाइम के 2002 के लेख की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि टाइम मैगजीन ने जून 2002 में उस वक्त के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ क्या लिखा था ये बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद को पढ़ना चाहिए था। गौरतलब है कि तब टाइम में वाजपेयी के स्वास्थ्य के बारे में नकारात्मक टिप्पणी की गई थी।

वहीं केंद्रीय मंत्री अंबिका सोनी और कमल नाथ ने भी अपने पीएम का बचाव किया है। अंबिका सोनी ने कहा है कि पीएम बेहतर तरीके से काम कर रहे हैं और वो देश को संकट से बाहर निकालने में सफल होंगे। वहीं केंद्रीय शहरी विकास मंत्री कमलनाथ का कहना है कि टाइम मैगजीन को पहले अमेरिका और यूरोप के हालात पर ध्यान देना चाहिए।

RJD अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने भी खुलकर पीएम का समर्थन किया और कहा है कि पीएम एक ईमानदार इंसान हैं और उनके जैसा नेता मिलना मुश्किल है। वैसे, सरकार के लिए राहत की बात ये है कि एनडीए के कुछ सहयोगी इस मुद्दे पर बीजेपी के सुर में सुर नहीं मिला रहे हैं। राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का समर्थन करने वाली जेडीयू एक बार फिर सरकार के बचाव में उतरी है। पार्टी अध्यक्ष शरद यादव का कहना है कि मैगजीन में छपी बातें भ्रामक हैं।

गौरतलब है कि दुनिया की जानी मानी अमेरिकी मैगजीन टाइम के मुताबिक मनमोहन सिंह एक असफल प्रधानमंत्री हैं। अपने ताजा अंक में टाइम मैगजीन ने इस मुद्दे पर कवर स्टोरी छापी है। इस कवर स्टोरी में प्रधानमंत्री को अंडरअचीवर करार दिया गया है।

मैगजीन में 'a man in shadow ' नाम के शीर्षक से छपी रिपोर्ट के मुताबिक तीन साल पहले तक प्रधानमंत्री में पाया जाने वाला आत्मविश्वास अब नदारद है। प्रधानमंत्री का अपने मंत्रियों पर नियंत्रण नहीं है जिससे फैसला लेने में देरी हो रही है। सरकार को अर्थव्यवस्था में गिरावट के अलावा भ्रष्टाचार से भी जूझना पड़ रहा है। बढ़ती महंगाई और घोटालों ने सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर दिया है और नतीजा ये कि मनमोहन सरकार पर वोटरों का भरोसा कम होता जा रहा है। मैगजीन ने प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के बीच शक्तियों के अघोषित बंटवारे को भी एक बड़ा रोड़ा करार दिया है जिससे प्रधानमंत्री फैसला नहीं कर पा रहे हैं।


First published: July 9, 2012
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