मोदी का जादू: जातिगत राजनीति का अखाड़ा थीं ये सीटें, इस बार वो दांव भी रहा फेल

नासिर हुसैन | News18India.com
Updated: March 12, 2017, 3:37 PM IST
मोदी का जादू: जातिगत राजनीति का अखाड़ा थीं ये सीटें, इस बार वो दांव भी रहा फेल
फाइल फोटो
नासिर हुसैन | News18India.com
Updated: March 12, 2017, 3:37 PM IST
कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र की राजनीति में जातिगत समीकरण खासे मायने रखते हैं. इसी को ध्यान में रखकर राजनीतिक दल टिकट वितरण भी करते हैं. लेकिन इस बार जातिगत राजनीति के सभी समीकरण धरे रह गए. बात आरएलडी की हो या फिर सपा-कांग्रेस गठबंधन और बसपा की, सभी की जातिगत रणनीति फेल हो गई. जातिगत समीकरण वाली 219 सीट में से सिर्फ 30 सीट ही दूसरी पार्टियों के खाते में गई है.

सियासी जानकारों की मानें तो जब भी चुनावों की बात होती है तो खासतौर से पश्चिमी उप्र में जातिगत आंकड़ों को ध्यान में रखकर ही उम्मीदवार उतारे जाते हैं. बात बसपा की करें तो पश्चिमी उप्र से लगे क्षेत्र की करीब 136 सीट ऐसी हैं जहां दलित-मुस्लिम फैक्टर खासा मजबूत माना जाता है. इस क्षेत्र को दलितों की राजधानी भी कहा जाता है. लेकिन हैरत की बात ये है कि यहां बसपा को सिर्फ दो ही सीट मिली हैं. दूसरे चरण की 60 सीट में से एक भी सीट बसपा को नहीं मिली है. जबकि 136 में से 108 सीट भाजपा के खाते में गई हैं.

अब जरा बात करते हैं सपा-कांग्रेस गठबंधन की. 94 सीट यहां ऐसी हैं जहां पर यादव-मुस्लिम फैक्टर का गठजोड़ बताया जाता है. लेकिन गठबंधन को सीट मिली हैं 27. जबकि भाजपा के खाते में गई हैं 66. बात करें किसानों की पार्टी कही जाने वाली आरएलडी की तो उसकी हालत तो और भी खराब है. किसी समय यूपी में आरएलडी की 84 सीट हुआ करती थीं. लेकिन इस चुनाव में सिर्फ एक सीट ही खाते में आई है. जबकि 219 में से 89 सीट पर जाट-मुस्लिम गठजोड़ फैक्टर का खासा असर बताया जाता है.
First published: March 12, 2017
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