ये हैं वो बड़ी वजह जो किसी भी पार्टी के लिए मुख्तार अंसारी को बनाती हैं खास

नासिर हुसैन | News18India.com

Updated: March 12, 2017, 11:11 AM IST
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सपा में विलय के साथ ही मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल पर तरह-तरह के आरोप लग रहे थे. कोई विलय को यादव परिवार में कलह की एक बड़ी वजह बता रहा था. तो कोई कह रहा था कि सपा में कौमी एकता दल के अंदर-बाहर होने की कवायद के चलते ही चाचा-भतीजा विवाद ने तूल पकड़ा है.

दूसरी ओर मुख्तार अंसारी भाई-बेटे संग बसपा में गए तो वहां भी आरोपों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. अंसारी परिवार की सियासी जमीन की बात करें तो ये पहला मौका है जब वो सियासी वजूद के लिए आखिरी वक्त तक जंग लड़ रहे हैं. बेशक मुख्तार अंसारी एक लाख वोटों से जीत हासिल कर चुके हैं, लेकिन बेटा अफजाल अंसारी और बड़े भाई सिबग्तुल्ला दोनों हार गए हैं.

ये हैं वो बड़ी वजह जो किसी भी पार्टी के लिए मुख्तार अंसारी को बनाती हैं खास
फाइल फोटो

क्‍यों और कैसे कौमी एकता दल के दो भाई सपा के लिए इतने खास हो गए? क्‍या वजह है कि पहले भी सपा और बसपा दोनों भाइयों से हाथ मिलाती रही है? क्‍यों चुनावों के वक्‍त पूर्वी यूपी में कौमी एकता दल किसी भी पार्टी के लिए खास हो जाता है?  इन्‍हीं पहलुओं पर रोशनी डालती है आईबीएन खबर की ये पड़ताल.

बेशक कौमी एकता दल वर्ष 2010 में बना है, लेकिन पूर्वी यूपी के पांच जिलों में अंसारी बंधुओं के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता. यह पांच जिले हैं गाजीपुर, मऊ, बलिया, वाराणसी और आजमगढ़। इनमें 20 विधानसभा सीटें मुस्‍लिम बहुल हैं. बात बाहुबली नेता मुख्‍तार अंसारी की हो या फिर अफजाल अंसारी और सिगब्तुल्‍ला अंसारी की, हर एक ने वोटरों के बीच एक पहचान कायम की हुई है। ऐसा भी नहीं है कि यह प्रभाव या पहचान सिर्फ बाहुबली नेता की छवि के दम पर है.

मुख्‍तार अंसारी के पिता मुख्‍तार अहमद अंसारी की शिक्षाविद् और राजनीतिज्ञ वाली शख्‍सियत भी इस प्रभाव की एक बड़ी वजह है। दूसरा एक कारण है जातिगत आधार बताया जाता है कि पांचों जिलों में मुस्‍लिम समाज से ताल्‍लुक रखने वाली बुनकर जाति बड़ी संख्‍या में रहती है.

गाजीपुर में 9.89 प्रतिशत, मऊ में 19.04, बलिया में 6.57, वाराणसी में 14.88 और आजमगढ़ में कुल आबादी का 15.07 प्रतिशत मुसलमान रहते हैं. तीनों अंसारी भाई भी इसी बुनकर जाति से आते हैं। इसके साथ ही दूसरी मुस्‍लिम जातियों के बीच भी अंसारी बंधु स्‍वीकार किए जाते हैं. वहीं कौमी एकता दल के लिए सपा की दिलचस्‍पी के पीछे एक बड़ी वजह बसपा भी है. बसपा ने इस बार करीब 100 मुस्‍लिम उम्‍मीदवारों को टिकट दिया है। बसपा के इस दांव से सपा में बेचैनी है.

हमारा एक इतिहास रहा है: अफजाल

कौमी एकता दल के महासचिव और मुख्‍तार अंसारी के भाई अफजाल अंसारी का कहना है कि सपा अध्‍यक्ष मुलायम सिंह यादव ने हमारे अंसारी परिवार को ऐसे ही सम्‍मानित परिवार नहीं कहा है। हमारे दादा का एक इतिहास रहा है. हमारे परिवार में 18 स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे हैं. हमारे नाना महावीर चक्र विजेता बिग्रेडियर उस्‍मान को नौशेरा का शेर भी कहा जाता है. उपराष्‍ट्रपति मो. हामिद अंसारी का ताल्‍लुक भी हमारे परिवार से है. रहा सवाल राजनीतिक प्रभाव का तो आप खुद यहां आइए और देखिए कि कैसे लोग हमें अपना कहते हैं. ये कोई दबंगई के बूते पर नहीं है. हम गरीबों की लडा़ई लड़ रहे हैं, इसलिए लोग हमें चुनते हैं. यह तो भाजपा की एक चाल थी, वो नहीं चाहती थी कि हमारा विलय सपा में हो, क्‍योंकि हमारे सपा से हाथ मिलाने के बाद भाजपा के सभी मंसूबे फेल हो जाते.

 

ये हैं अंसारी परिवार के प्रमुख लोग

अफजाल अंसारी-  अफजाल दो बार लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं. वर्ष 2004 में वह सपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे. उन्‍होंने 4,15687 वोट हासिल कर भाजपा के मनोज को हराया था. मनोज को 1,88910 ही वोट मिले थे. लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में अफजाल बसपा की टिकट पर सपा के श्री राधेमोहन से चुनाव हार गए थे. करीब 70 हजार वोटों से उनकी हार हुई थी. सपा के उम्‍मीदवार को 3,79233 वोट मिले थे. अफजाल पार्टी के महासचिव हैं.

मुख्‍तार अंसारी- मुख्‍तार अंसारी लगातार मऊ से यूपी विधानसभा का चुनाव लड़ते रहे हैं. एक बार बसपा और कौमी एकता दल से तो दो बार निर्दलीय चुनाव लड़ा था. पहला चुनाव वर्ष 1996 में लड़ा था, जिसमें उन्‍हें 45.85, 2002 में 46.6, 2007 46.78 और 2012 के चुनावों में 31.34 प्रतिशत वोट मिले थे. उन्‍होंने वर्ष 2002 में वाराणसी से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा था. लेकिन भाजपा के मुरली मनोहर जोशी से वह चुनाव हार गए थे. जोशी को 30.52 और मुख्‍तार को 27.94 प्रतिशत वोट मिले थे. मुख्‍तार अंसारी कौमी एकता दल के प्रमुख हैं.

सिगब्‍तुल्‍ला अंसारी- सिगब्‍तुल्‍ला अंसारी ने वर्ष 2012 में यूपी विधानसभा का चुनाव लड़ा. उन्‍होंने सपा के उम्‍मीदवार को चुनाव हराया था. चुनाव में उन्‍हें 66922 वोट और सपा उम्‍मीदवार को 59589 वोट मिले थे.

डॉ. मुख्‍तार अहमद अंसारी- डॉ. मुख्‍तार अहमद अंसारी पेशे से डॉक्‍टर थे. कांग्रेस के बड़े लीडरों में उनका नाम शुमार होता है. वह मुस्‍लिम लीग के भी अध्‍यक्ष रहे. जामिया मिलिया इस्‍लामिया के संस्‍थापकों में से भी एक हैं. वह वर्ष 1928 से 1936 तक जामिया के चांसलर भी रहे. उन्होंने आजादी की लड़ाई में भी नायक की भूमिका निभाई और बढ-चढ़कर हिस्‍सा लिया था.

बेटा अफजाल अंसारी पहली बार चुनाव लड़ रहा है. बेटे के चुनाव पर खुद मुख्तार अंसारी की साख भी दांव पर लगी हुई थी. अफजाल अंसारी को भाजपा उम्मीदवार ने 7000 से अधिक वोटों से शिकस्त दी है.

 

First published: March 12, 2017
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