Exclusive: पिता लंगोट बेचकर करते हैं गुजारा, बेटी ने दंगल में जीते 10 लाख

नित्यानंद पाठक | News18Hindi
Updated: March 24, 2017, 3:28 PM IST
Exclusive: पिता लंगोट बेचकर करते हैं गुजारा, बेटी ने दंगल में जीते 10 लाख
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नित्यानंद पाठक | News18Hindi
Updated: March 24, 2017, 3:28 PM IST

अंबाला. कहते हैं जिद और जुनून से कुछ भी संभव हो सकता है. कुछ ऐसा ही देखने को मिला भारत केसरी दंगल-2017 में. लंगोट बेचकर गुजारा करने वाले सूरज काकरान की बेटी दिव्या ने बड़े-बड़े सूरमा महिला रेसलर्स को रिंग में धूल चटाकर भारत केसरी बनने का गौरव हासिल किया. दिव्या को इनाम के रूप में 10 लाख रुपए मिलेंगे. news18hindi.com को दिए इंटरव्यू में दिव्या ने अपने संघर्ष के बारे में बताया...

वार हीरोज मेमोरियल स्टेडियम में हुए दंगल में दिव्या ने 69+ वेटकटेगरी में धाकड़ महिला पहलवान पिंकी को चित्‍त कर ये फाइट अपने नाम की. एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि उनके पिता सूरज काकरान अब भी लंगोट बेचते हैं. उनकी फैमिली के लिए यही एकमात्र इनकम का जरिया है. ये लंगोट उनकी मां संयोगिता बनाती हैं. वीडियो इंटरव्यू यहां देखें...

पिता भी बनना चाहते थे रेसलर

जूनियर नेशनल लेवल 14 गोल्ड मेडल जीतने वाली दिव्या बताती हैं- मेरे पिता सूरज 1990 के दौरान कुश्ती में करियर बनाने के लिए दिल्ली आए थे, लेकिन सफलता नहीं मिली. असफल होने के बाद वे गांव सरधना लौट आए. शादी की और दूध बेचने लगे, लेकिन यहां भी फेल हो गए. इसके बाद पापा जीविका चलाने के लिए दिल्ली चले आए. इस दौरान मेरा जन्म हो चुका था और मैं बड़ी हो रही थी.

दिल्ली में लंगोट बेचना शुरू किया

भारत की नेक्स्ट साक्षी कही जाने वाली दिव्या कहती हैं- दिल्ली आने के बाद पापा ने मां के हाथ का बनाया हुआ लंगोट बेचना शुरू किया. जहां भी दंगल होता वे लंगोट का गट्ठर लेकर वहां पहुंच जाते. एक बार उन्होंने गीता फोगाट के बारे में न्यूज पेपर में पढ़ा तो उन्हें लगा मेरी बेटी क्यों नहीं दंगल कर सकती? बस यहीं से मेरे रेसलिंग करियर की शुरुआत हो गई. बता दें कि दिव्या पिता सूरज के साथ ईस्ट दिल्ली के गोकुलपुर में किराए के एक रूम में रहते हैं.

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गीता से भी ज्यादा संघर्ष

पिता को अपना हीरो मानने वाली दिव्या बताती हैं- पिता ने ये बात सोच तो आसानी से ली कि बेटी को रेसलर बनाऊंगा, लेकिन ये आसान नहीं था. गांव और अगल-बगल के लोग भद्दे कमेंट किया करते थे. कहते थे बेटी को बर्बाद कर रहा है, लेकिन पिता ने ध्यान नहीं दिया. हालांकि हमारे पास पैसे बिल्कुल भी नहीं थे, लंगोट के बिजनेस से घर का गुजारा भी बड़ी मुश्किल से होता था. यहीं मेरा संघर्ष गीता दी (गीता फोगाट) से अलग हो जाता है.

पुरुष रेसलर से किया था पहला दंगल, मिले थे 30 रुपए

अपने पुराने दिनों को याद करते हुए दिव्या बताती हैं- मैंने पहला दंगल पुरुष रेसलर से किया था वो भी पैसे के लिए, लेकिन सिर्फ 30 रुपए मिले थे. हालांकि उन 30 रुपयों ने मेरी जिंदगी बदल दी. अब मैं पुरुषों को चैलेंज कर दंगल करने लगी थी. पैसे भी ज्यादा मिलने लगे थे और मीडिया में भी आने लगी थी.

मां-पिता और भाई के साथ दिव्या.

अब जब मैं चैंपियन बन गई हूं तो देखना है क्या बदलेगा?

दिव्या कहती हैं- पुरुषों के साथ दंगल का फायदा ये मिला कि मुझे दिल्ली की टीम में जगह मिल गई और इंडियन कैंप में भी नाम आ गया. अब जब मैं भारत केसरी भी जीत चुकी हूं तो देखना है क्या बदलता है? मेरी जरूरते बड़ी हैं, इसलिए जीत की जिद है. कभी हारना नहीं चाहती. टारगेट ओलंपिक गोल्ड है, साक्षी से बड़ी रेसलर बनना चाहती हूं. बस यही तमन्ना है.

First published: March 24, 2017
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