मुजफ्फरनगर दंगों में आजम खान का हाथ: केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान

News18.com

First published: January 11, 2017, 3:11 PM IST | Updated: January 11, 2017, 3:11 PM IST
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मुजफ्फरनगर दंगों में आजम खान का हाथ: केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान
केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान का कहना है कि मुजफ्फरनगर दंगे में आजम के रोल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उन्हीं के प्रभाव में ही मुजफ्फरनगर के डीएम और एसएसपी को हटाया गया. पूरे दिन मुजफ्फरनगर जलता रहा और जिला बिना डीएम और एसएसपी के चलता रहा.

केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान को जब 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों में पुलिस ने गिरफ्तार किया तो वह भाजपा के एक छोटे से नेता हुआ करते थे लेकिन उसके बाद बालियान का पार्टी में तेजी से ग्राफ बढ़ता चला गया. आखिरकार पार्टी ने 2014 में उन्हें पश्चिम उत्तर प्रदेश में स्टार कैंपेनर के तौर पर पेश किया और लोकसभा चुनाव भी लड़ाया. संजीव बालियान यही नहीं रुके, उन्होंने पहली बार सांसद बनने के साथ ही मोदी कैबिनेट में भी जगह हासिल की. सूत्रों के अनुसार बालियान की इस उपलब्धि में कहीं न कहीं उनकी बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से नजदीकी भी काम आई.

पश्चिम उत्तर प्रदेश के जाट समुदाय को बीजेपी के करीब लाने में संजीव बालियान का विशेष योगदान माना जाता है. हालांकि कई लोगों के लिए वह अभी भी विवादित चेहरा ही हैं. संजीव बालियान ने न्यूज 18 के उदय सिंह राणा से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों, मुजफ्फरनगर दंगों, कैराना पलायन सहित तमाम मुद्दों पर खुल कर अपनी बात रखी.

सवाल: यूपी विधानसभा चुनाव के लिए आपकी पार्टी ने अभी तक मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी भी घोषित नहीं किया है. क्या बीजेपी पार्टी के भीतर खेमेबंदी और वर्चस्व की लड़ाई से बचना चाहती है?

जवाब: नहीं, कोई वर्चस्व की लड़ाई नहीं है. हम संगठित पार्टी हैं. पिछले कुछ समय में सिर्फ असम और दिल्ली में ही हमने सीएम पद के उम्मीदवारों का ऐलान किया. बाकी के अन्य राज्य, जैसे हरियाण, महाराष्ट्र में हम बिना सीएम चेहरे के मैदान में उतरे और उसे जीता भी. मोदी जी के रहते पार्टी के भीतर आपसी कलह नहीं हो सकती. वह निर्विराध नेता हैं.

सवाल: लेकिन पार्टी में निचले स्तर पर तो आपसी कलह दिखाई दे रही है. कुछ ऐसी भी विधानसभा सीटें हैं, जहां 20 लोग एक टिकट के लिए जूझ रहे हैं. चुनाव इतने करीब हैं, ऐसे में आपके जिला और बूथ स्तर पर आपसी कलह से निपटने की योजना क्या है?

जवाब: पहले तो मैं एक बात आपको साफ कर दूं कि बीजेपी में हर कार्यकर्ता के पास टिकट की दावेदारी का अधिकार है. उसके बाद यह लीडरशिप पर निर्भर करता है. हम बसपा की तरह नहीं है, जहां सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को टिकट बेच दिया जाता है. हम सिर्फ योग्यता देखते हैं और कुछ नहीं. जहां तक उम्मीदों को संजोने का सवाल है तो उनका आसानी से प्रबंध किया जा सकता है. जब भी चुनाव होते हैं, खासकल हाल के दिनों में बीजेपी के टिकट हमेशा डिमांड में रहते हैं. हर चुनाव में प्रत्येक सीट पर कई दावेदार होते हैं. ऐसी स्थिति में डैमेज कंट्रोल में ज्यादा दिक्कत नहीं आती. आखिरकार सभी दावेदार पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशी के साथ आ जाते हैं.

सवाल: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में ​आदेश दिया है कि कोई भी पार्टी या प्रत्याशी धर्म, जाति के आधार पर वोट नहीं मांग सकता. हालांकि बीजेपी के कई ​नेता ध्रुवीकरण से जुड़े बयान देते रहते हैं. हाल की बात करें तो साक्षी महाराज का मुसलमानों के विरोध में दिया गया बयान एक उदाहरण माना जा सकता है. क्या इसका असर चुनाव प्रचार पर पड़ेगा?

जवाब: मैं अभी भी उस दिन का इंतजार कर रहा हूं, जब मीडिया मायावती के उस बयान को उठाए, जो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अगले ही दिन दिया था. उन्होंने खुलेआम कहा कि उन्होंने मुस्लिमों को सबसे ज्यादा सीटें दी हैं. आदेश के अगले ही दिन उनके इस बयान और यह कहने कि मुस्लिम पार्टी के साथ आएं, ये कोर्ट का अपमान है. ऐसा लगता है कि मीडिया ने मायावती को हर बात के लिए छूट दे रखी है. अगर बीजेपी के किसी नेता ने ऐसा बयान दिया होता तो मीडिया उसे सूली पर चढ़ा चुकी होती. वहीं जहां तक साक्षी महाराज के बयान का सवाल है तो उस घटना के बाद मेरी उनसे व्यक्तिगत तौर पर बात हुई थी. मुझे लगता है कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा. उन्होंने किसी विशेष समुदाय के लिए कुछ नहीं कहा. उन्होंने सिर्फ भारत की बढ़ती आबादी को लेकर अपनी चिंता जाहिर की.

सवाल: लेकिन ‘चार बीवियां, 40 बच्चे’ सीधे-सीधे मुस्लिमों की तरफ ही संकेत करता है.

जवाब: मैं इसमें कोई अनुमान नहीं लगाना चाहता. उन्होंने किसी भी समुदाय का नाम नहीं लिया. मैं भी इस बात से सहमत हूं कि बढ़ती आबादी के देश के लिए समस्या है.

सवाल: यह कोई एक घटना नहीं है, जब बीजेपी ने विभाजनकारी मुद्दों को उठाया है. इससे पहले कैराना सांसद हुकुम सिंह ने आरोप लगाया कि 250 हिंदू परिवार दूसरे समुदाय के भारी दबाव में जिले को छोड़कर पलायन कर गए हैं तो पार्टी ने उनका पूरा समर्थन किया. यही नहीं आपने भी दावा किया है अन्य जगहों से भी ऐसी ही घटनाएं हुईं.

जवाब: अगर हम ये मुद्दा नहीं उठाते तो हमसे ये पूछा जाता कि आप सरकार से सवाल क्यों नहीं करते? हम उत्तर प्रदेश में विपक्षी पार्टी हैं और ये हमारी जिम्मेदारी बनती है कि जहां सरकार फेल हो रही है, वहां सरकार से सवाल करें. कैराना ने बढ़ते अपराध के कारण परिवारों ने पलायन किया. ये कानून व्यवस्था का मामला है, न कि साम्प्रदायिक.

सवाल: लेकिन सिर्फ हिंदू परिवारों की ही बात क्यों? निश्चित रूप से दूसरे समुदाय भी अपराध से प्रभावित हैं.

जवाब: बिलकुल, कानून व्यवस्था सभी के लिए मुद्दा है. लेकिन सच ये है कि कैराना से 250 परिवारों ने पलायन किया और ये सभी परिवार हिंदू थे. हम सिर्फ तथ्य रख रहे हैं. हुकुम सिंह ने सिर्फ सच ही बोला.

सवाल: 2014 में आप पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए और आपको मोदी कैबिनेट में भी जगह दी गई. कई लोग कहते हैं कि 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों के बाद ही आपको ये ऊंचाई हासिल हुई, जिसमें आप खुद एक अभियुक्त थे. यही नहीं पार्टी के अन्य नेता जो दंगों के आरोपी थे, जैसे सुरेश राणा और संगीत सोम, को भी पार्टी में ऊंचाईयां मिलीं. क्या बीजेपी विवादित नेताओं को पुरस्कृत करती है?

जवाब: हम सभी पर धारा 144 के उल्लंघन का आरोप लगा था. हमारे खिलाफ कोई भी आपराधिक मुकदमा कायम नहीं किया गया. यही नहीं पूरे इलाके में एक भी बीजेपी नेता ऐसा नहीं था, जिसे गिरफ्तार किया गया हो. ये पुरस्कार देने की बात नहीं है. हम किसे टिकट दें, जब सभ्ज्ञी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया हो? इस मामले में सरकार के रवैये पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.

सवाल: आपके और आजम के बीच बेहद कटु संबंध हैं, क्या आपको लगता है कि दंगों में उनका हाथ था?

जवाब: हां, मुझे लगता है कि दंगे में आजम के रोल को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उन्हीं के प्रभाव में ही मुजफ्फरनगर के डीएम और एसएसपी को हटाया गया. पूरे दिन मुजफ्फरनगर जलता रहा और जिला बिना डीएम और एसएसपी के चलता रहा. इस बीच सात लोग, जो सचिन और गौरव की हत्या में शामिल थे, को पुलिस ने छोड़ दिया. सात सितंबर 2013 को महापंचायत से लौट रहे लोगों पर जौली नहर के पास फायरिंग की गई. हमलावरों के पास आॅटोमैटिक हथियार थे. साफ है कि ये सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया. हम सीबीआई जांच के लिए भी तैयार थे लेकिन राज्य सरकार ने इस संबंध में कोई भी प्रस्ताव नहीं भेजा.  अगर बीजेपी सत्ता में आती है तो इसकी जांच सीबीआई से कराएगी.

सवाल : लोकसभा चुनावों में जाट समुदाय ने बीजेपी के पक्ष में भारी मतदान किया. अब हालांकि हरियाणा में जाट आंदोलन के बाद उतना उत्साह नहीं दिख रहा. कई जाट बाहुल्य इलाके बीजेपी के खिलाफ दिख रहे हैं और उसे एंटी जाट पार्टी के तौर प्रचारित किया जा रहा है. उनका दर्द है कि उन्हें आरक्षण का लाभ देने का आश्वासन पूरा नहीं किया गया. आप खुद एक जाट हैं, और आपका इस पर क्या कहना है?

जवाब: जो ये कह रहे हैं कि हमने जाटों को धोखा दिया, गलत है. यूपीए सरकार ने जाट आरक्षण के मामले को जिस तरह से आगे बढ़ाया, उसमें कुछ दिक्कतें हैं. उन्होंने पिछड़ी जातियो के लिए बने राष्ट्रीय आयोग से कभी सहमति नहीं ली. इसी कारण से मामला अभी भी कोर्ट में है. यह बीजेपी की गलती नहीं है. हम तो शुरू से ही जाट आरक्षण के पक्ष में रहे हैं.

सवाल: पिछले साल बीजेपी ने दलितों तक पहुंचने के लिए बड़ा कार्यक्रम शुरू किया लेकिन अब वह खत्म हो गया लगता है. क्या इसके पीछे कारण ये है कि ऊना और रोहित वेमुला मामले के बाद बीजेपी ये मान चुकी है कि दलितों का वोट उसे नहीं मिलेगा?

जवाब: यह सच नहीं है. हम लगातार समाज के हर वर्ग तक अपनी पहुंच बना रहे हैं. बीजेपी के पास किसी अन्य पार्टी की तुलना में ज्यादा दलित सांसद हैं. वहीं जहां तक घटनाओं की बात है तो आप किसी एक घटना के आधार पर पूरे समुदाय के मूड का आंकलन नहीं कर सकते. अगर कुछ गलत हुआ है तो निश्चित रूप से उसमें सजा होनी चाहिए. हालांकि, इसका ये मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि इन घटनाओं के कारण हमारे सभी भाई बहन हमें छोड़ दिए हैं.

सवाल: समाजवादी पार्टी आपसी वर्चस्व की जंग से जूझ रही है, कुछ लोगों को लगता है कि पार्टी में टूट होने जा रही है. क्या इसका फायदा बीजेपी को मिलेगा?

जवाब: मुझे नहीं लगता पार्टी टूटेगी. ये अच्छी तरह से तैयार किया गया फैमिली ड्रामा है. इस ड्रामा के डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, स्क्रिप्ट राइटर और मुख्य किरदार सिर्फ एक इंसान है और वह हैं मुलायम सिंह यादव. वह चाहते हैं कि कोई भी अखिलेश यादव से यह न पूछे कि पिछले पांच सालों में उन्होंने हासिल क्या किया. वह अपने पुत्र की इमेज में सुधार करना चाहते हैं. यह सिर्फ एक ध्यान बंटाने की रणनीति है.

सवाल: पश्चिम उत्तर प्रदेश में कई उद्योग हैं, जिनमें मुरादाबाद में पीतल उद्योग और खुर्जा में मिट्टी के बर्तनों का उद्योग है. इन सभी पर नोटबंदी का बुरा असर पड़ा है. विपक्षी पार्टियां इसे चुनावों में बड़ा मुद्दा बनाने की जुगत में हैं. आप नोटबंदी के खिलाफ उठे भाव से कैसे निपटेंगे?

जवाब: हमने इससे कभी इंकार नहीं किया कि दिक्कतें आई हैं. लेकिन लोगों ने नोटबंदी का दिल खोलकर स्वागत और समर्थन किया है. इसे लेकर कोई बड़ी हिंसा या विरोध देखने को नहीं मिला. सब यही सोच रहे हैं कि इस निर्णय से अर्थव्यवस्था को दूरगामी लाभ होगा. विपक्ष इसे मुद्दा बनाने की कोशिश में जरूर है लेकिन लोग उनका समर्थन नहीं करेंगे.

सवाल: आगामी विधानसभा चुनावों में आपका मुख्य प्रतिद्वंदी कौन होगा, समाजवादी पार्टी या बसपा?

जवाब: मेरा अनुमान है कि सपा और कांग्रेस का गठबंधन होगा और वे ही हमारे मुख्य प्रतिद्वंदी होंगे. दोनों ही पार्टियां कमजोर हैं और एक दूसरे के सहारे ही खड़ी होने की कोशिश करेंगीं. बसपा आखिर में ही खड़ी है क्योंकि बहनजी ​रुपए गिनने में व्यस्त हैं. वह जनता से दूर हो चुकी हैं. बीजेपी पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रही है.

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