कैसे पूरा होगा परिवार नियोजन का टार्गेट, डॉक्टर करते ही नहीं नसबंदी

Rajesh Dobriyal | News18India
Updated: July 17, 2017, 6:29 PM IST
कैसे पूरा होगा परिवार नियोजन का टार्गेट, डॉक्टर करते ही नहीं नसबंदी
Rajesh Dobriyal | News18India
Updated: July 17, 2017, 6:29 PM IST
उत्तराखंड में परिवार नियोजन के अपेक्षित परिणाम हासिल न होने की बड़ी वजह परिवार नियोजन के उपायों का समय पर उपलब्ध न हो पाना है. इसकी वजह से न सिर्फ़ आबादी पर नियंत्रण मुश्किल होता है बल्कि महिला स्वास्थ्य पर भी ख़राब असर पड़ता है.
साल 2015-16 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफ़एचएस-4) के अनुसार राज्य में 15-49 साल की शादीशुदा महिलाओं की परिवार नियोजन की कुल आवश्यकताएं गांवों में 16.4% गांवों और शहरों में 14% पूरी नहीं हो पा रही हैं. इसके अलावा बच्चों में दूरी बनाए रखने की अनमेट नीड् (आवश्यकता के समय उपाय उपलब्ध न होना) गांवों में 5.9% गांवों और शहरों में 4% है.
डॉक्टर सरोज नैथानी लंबे समय पर देहरादून स्थित स्वास्थ्य महानिदेशक कार्यालय में परिवार नियोजन कार्यक्रम की प्रभारी रही हैं. दो महीने पहले ही उन्होंने रुद्रप्रयाग की सीएमओ के रूप में काम करना शुरू किया है. वह कहती हैं कि राज्य में ज़्यादातर दंपत्ति अब दो ही बच्चे पैदा कर रहे हैं लेकिन उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ती है.
डॉक्टर नैथानी के अनुसार राज्य में परिवार नियोजन के उपायों की अनमेट नीड्स बहुत अधिक है. इसका अर्थ यह है कि जिस समय दंपत्ति को परिवार नियोजन के लिए कंडोम या ओरल पिल्स या कॉपर्टी की आवश्यकता होती है उसे वह उपलब्ध नहीं हो पाते. इसकी वजह से कई बार महिलाएं न चाहते हुए भी गर्भधारण कर लेती हैं और फिर या तो न चाहते हुए भी उनका बच्चा होता या वह असुरक्षित गर्भपात करवाती हैं.

अनमेट नीड्स में एक बड़ा कारक ट्रेन्ड प्रोफ़ेशनल्स का अभाव है. डॉक्टर नैथानी के अनुसार राज्य के 95 ब्लॉकों में मौजूद सीएफ़सी (सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र) में हर महीने नियमित रूप से परिवार नियोजन के लिए ऑपरेशन नहीं हो पाते हैं. ऐसे में नसबंदी करवाने के लिए लोगों को ज़िला अस्पताल आना पड़ता है.
यह सच है कि तमाम चीज़ों के साथ ही पहाड़ों में परिवार नियोजन के साधन भी आसानी से नहीं मिलते लेकिन सच यह है कि इन क्षेत्रों में लोग ज़्यादा समझदारी के साथ, विभिन्न तरीकों से, परिवार नियोजन कर रहे हैं. इसके विपरीत मैदानी क्षेत्रों में जहां परिवार नियोजन के साधन सहजता से उपलब्ध हैं वहां का टीएफ़आर (टोटल फ़र्टिलिटी रेट) कहीं ज्यादा है.
डॉक्टर नैथानी कहती हैं कि इसकी बड़ी वजह यह है कि राज्य की साक्षरता दर बहुत अच्छी है और इसमें लड़कियां भी शामिल हैं. वह परिवार नियोजन और स्वास्थ्य को लेकर सतर्क हैं इसलिए ज़्यादा बच्चे पैदा नहीं करतीं. लेकिन राज्य के मैदानी इलाक़ों का जनसंख्या का प्रकार अलग होने की वजह से यहां जन्मदर अधिक है.
दरअसल ये समस्या बहुमुखी है. राज्य में परिवार नियोजन के ऑपरेशन करने के लिए डॉक्टरों का भी अभाव है और सुविचारित योजना का भी. अभी प्रक्रिया यह है कि या तो नसबंदी करवाने के लिए महिला-पुरुष ज़िला अस्पताल आते हैं या फिर विशेषज्ञ डॉक्टर कैंपों में/सीएचसी में जाकर ऑपरेशन करते हैं. डॉक्टर नैथानी कहती हैं कि अगर ज़िला अस्पताल से डॉक्टर हर सीएचसी में जाएगा तो अल्मोड़ा, पौड़ी जैसे ज़िलों में (जहां 15-15 सीएचसी हैं) तो ज़िला अस्पताल में ही ऑपरेशन नहीं हो पाएंगे.
इस समस्या से निपटने के लिए ज़रूरत यह है कि नसबंदी के ऑपरेशन करने वाले डॉक्टरों की संख्या बढ़ाई जाए. डॉक्टर नैथानी के अनुसार अभी तक हम पुरानी दूरबीन वाली तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसके बजाय सभी एमबीबीएम डॉक्टरों को आसान मिनीलैप तकनीक में प्रशिक्षित किया जा सकता है. यह प्रक्रिया शुरू भी हुई थी लेकिन बहुत धीमी चल रही है.
इसकी वजह यह भी है कि बहुत से डॉक्टर अलग-अलग तरह के बहाने बनाकर इससे बच रहे हैं. चूंकि अच्छा काम करने वाले को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाता और काम से बचने वाले को दंड नहीं दिया जाता इसलिए लोग इससे बच रहे हैं.
बहरहाल शुरुआत के तौर पर डॉक्टर सरोज नैथानी ने रुद्रप्रयाग में एक प्रयोग शुरू किया है. उन्होंने हर सीएचसी में गाइनोकॉलोजिस्ट के जाने की तारीख निश्चित कर दी है. इससे स्थानीय लोगों को पता चल जाता है कि अमुक तारीख को डॉक्टर आ रही हैं. वहां महिलाएं सलाह लेने पहुंच जाती हैं. उनमें से अगर कोई नसबंदी करवाना चाहे तो तैयारी के साथ गई डॉक्टर नसबंदी भी कर देती हैं.
डॉक्टर नैथानी कहती हैं कि इससे नसबंदी कैंप के मुकाबले न सिर्फ़ सफ़ाई और इत्मीनान से ऑपरेशन होते हैं बल्कि दंपत्ति को भी तैयारी करने का समय मिल जाता है. अब तक के सीमित समय में इसके अच्छे परिणाम नज़र आ रहे हैं.
First published: July 17, 2017
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