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छात्र राजनीति से निकले ये नेता बढ़ाएंगे यूपी विधानसभा की शोभा

Ajayendra Rajan | News18Hindi
Updated: March 16, 2017, 4:37 PM IST
छात्र राजनीति से निकले ये नेता बढ़ाएंगे यूपी विधानसभा की शोभा
यूपी में इस बार करीब दो दर्जन नेता छात्र राजनीति से निकलकर सियासी समर में किस्मत आजमा रहे थे. इनमें से कुछ के हाथ जीत लगी, वहीं कुछ के हाथ हार लगी.
Ajayendra Rajan | News18Hindi
Updated: March 16, 2017, 4:37 PM IST
यूपी में इस बार करीब दो दर्जन नेता छात्र राजनीति से निकलकर सियासी समर में किस्मत आजमा रहे थे. इनमें से कुछ के हाथ जीत लगी, वहीं कुछ के हाथ हार लगी.

ये नेता लखनऊ विश्वविद्यालय से लेकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं. इनकी दावेदारी पर चाहे भाजपा हो, सपा या कांग्रेस सभी ने युवा छात्र नेताओं पर दांव लगाया था.

बृजेश पाठक 1990 में एलयू के छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे. बाद में बसपा ज्वाइन की. 2004 में उन्नाव से लोकसभा सांसद बने. 2009 में चुनाव हारने के बाद बसपा ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया. इस बार बृजेश पाठक ने भाजपा के टिकट पर लखनऊ मध्य से चुनाव जीत विधानसभा तक का सफर तय किया है.

शैलेश सिंह शैलू ने  एलयू में महामंत्री से लेकर अध्यक्ष तक का चुनाव जीता. शैलू ने पहले बसपा ज्वाइन की, फिर भाजपा में चले गए. 2012 में बलरामपुर के गैसड़ी से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. लेकिन इस बार शैलू एक नजदीकी लड़ाई में बसपा के अलाउद्दीन को दो हजार मतों से हराने में सफल रहे.

बनारस की दक्षिणी विधानसभा क्षेत्र पर अरसे से भाजपा का कब्जा रहा. यहां से श्यामदेव राय चौधरी 'दादा' एमएलए बने. इस बार पार्टी ने दादा की जगह नीलकंठ तिवारी को प्रत्याशी बनाया और नीलकंठ ने पार्टी को निराश नहीं किया और विजेता बन गए. नीलकंठ हरिश्‍चंद्र पीजी कॉलेज छात्रसंघ के महामंत्री रह चुके हैं. वह पेशे से अधिवक्‍ता हैं.

मधुबन सीट से भाजपा उम्‍मीदवार दारा सिंह चौहान ने करीब 30 हजार मतों से जीत दर्ज की. दारा आजमगढ़ के डीएवी पीजी कॉलेज के छात्रसंघ अध्‍यक्ष रहे. 1996 में वह बीएसपी से राज्‍यसभा सदस्‍य और 2009 में घोसी से लोकसभा सांसद रहे.

बलिया जिले के फेफना विधानसभा क्षेत्र के बीजेपी विधायक उपेंद्र तिवारी ने एक बार फिर इस सीट पर कमल खिलाया है. उपेंद्र छात्र जीवन में इलाहाबाद छात्रसंघ का चुनाव लड़े लेकिन सफलता नहीं मिली. लंबे समय के बाद 2012 विधानसभा चुनाव में जनता ने सर माथे पर बिठाया. एक बार फिर उपेंद्र तिवारी ने बसपा में शामिल हुए सपा के दिग्गज नेता अम्बिका चौधरी को करारी शिकस्त दी.

कांग्रेस के गढ़ में कमल खिलाकर विधानसभा पहुंचे धीरेंद्र बहादुर सिंह
धीरेंद्र बहादुर सिंह रायबरेली की सरेनी विधानसभा से भाग्य आजमा रहे थे. उन्होंने बसपा के ठाकुर प्रसाद को करीब 13 हजार वोट से हराकर जीत का परचम लहराया. धीरेंद्र लखनऊ विश्वविद्यालय और विद्यांत डिग्री कॉलेज के महामंत्री रहे.

वैसे कुछ ऐसे भी छात्रनेता थे, जिन्होंने ​2012 में जीत के साथ सत्ता में अपने रसूख का डंका बजाया लेकिन इस बार के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

अखिलेश के करीबी अरविंद सिंह गोप को मिली हार
एलयू के छात्रसंघ से सर्वाधिक चर्चित चेहरों में से हैं. विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष के बाद गोप ने सपा से राजनीतिक कॅरियर शुरू किया. विधायक बनने के बाद अखिलेश सरकार में कैबिनेट मंत्री बने. गोप को सीएम अखिलेश यादव का करीबी माना जाता है. अखिलेश ने इन्हें बाराबंकी की रामनगर से प्रत्याशी बनाया लेकिन इस बार उन्हें भाजपा के शरद कुमार अवस्थी ने करारी शिकस्त दे दी.

अयोध्या में जीत दोहरा नहीं सके पवन पांडेय
2012 से सपा को अयोध्या जैसी अहम सीट से जीत दिलाने वाले पवन पांडेय को सपा सरकार ने मंत्री पद का उपहार दिया. लेकिन इस बार पवन पांडेय जीत दोहरा नहीं सके. लखनऊ विश्वविद्यालय के उपाध्यक्ष रहे पवन की गिनती अखिलेश के करीबी नेताओं में रही है.

माफिया अभय सिंह भी हारे
लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से निकला एक और नाम अभय सिंह है. माफिया छवि के अभय सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय में नब्बे के दशक की अपराध में लिप्त छात्र राजनीति की उपज माने जाते हैं. 2012 में पहली बार सपा के टिकट पर गोसाईंगंज से विधायक बनने में कामयाब हुए. लेकिन इस बार अभय सिंह जीत दोहराने में नाकामयाब साबित हुए.

कभी सांसद थे आज विधायक नहीं बन सके बाहुबली धनंजय सिंह
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बाहुबली नेताओं में शुमार धनंजय सिंह इस बार निषाद पार्टी के टिकट पर मल्हनी से चुनाव लड़े लेकिन किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया. लखनऊ विश्वविद्यालय के जमाने में कभी अभय सिंह और धनंजय सिंह की दोस्ती खासी चर्चा में रहती थी लेकिन समय बीतने के साथ ही दोनों अलग हो गए. धनंजय सिंह विधायक और सांसद रह चुके हैं.

इनके अलावा रिचा सिंह इलाहाबाद पश्चिम से समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी थीं. उन्होंने यहां की सिटिंग विधायक पूजा पाल को तो चुनाव में पछाड़ दिया लेकिन भाजपा के सिद्धार्थनाथ सिंह के हाथों हार गईं. रिचा 2015 से 2016 तक इलााहाबाद छात्र संघ की अध्यक्ष रहीं. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के 128 साल के इतिहास में रिचा पहली महिला हैं, जो अध्यक्ष बनीं.
First published: March 16, 2017
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