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बीत रही उम्र; नौकरी, दो रोटी और राजनीति के दुष्चक्र में फंसा हुआ छात्र क्या करे?

आज जब आरआरबी-एनटीपीसी की नौकरी के लिए देश भर में हजारों छात्रों को सड़क पर पत्थरबाज़ी करते, नारे लगाते , सरकारी दफ्तरों का घेराव करते हुए देखते हैं तो आपके जेहन में पहला सवाल क्या उठता है? ये कौन लोग हैं, कैसी पृष्टभूमि से आते हैं? दरअसल, कहीं न कहीं हम, हमारी व्यवस्था और हमारी सरकारें इसके लिए ज़िम्मेवार हैं.

अपनी मांगों के समर्थन में रेलवे ट्रैक पर प्रदर्शन करते छात्र. (PTI)

पेट की भूख गेहूं से बनी रोटी बुझाती है, जिसके लिए किसान खेतों में मजदूरी करता है. वहीं छात्र 18 घंटे पढ़कर नौकरी के लिए संघर्ष करता हैं. दमघोटू कमरों में वर्षों की साधना और तपस्या के बाद से उसे एक नौकरी मिलती है. वहीं नेता लोग भी अपनी भूख मिटाते हैं, आग पर राजनीतिक रोटियां सेंक कर. तीसरा पक्ष है, उन मदमस्त अधिकारियों का जो वातानुकूलित कमरे में बैठकर पूरे देश को चलाने का भ्रम पाल लेते हैं.

आज जब आरआरबी-एनटीपीसी की नौकरी के लिए देश भर में हजारों छात्रों को सड़क पर पत्थरबाज़ी करते, नारे लगाते , सरकारी दफ्तरों का घेराव करते हुए देखते हैं तो आपके जेहन में पहला सवाल क्या उठता है? ये कौन लोग हैं, कैसी पृष्टभूमि से आते हैं? ये ट्रेन में आगे लगाने जैसी हिंसक घटनाओं में क्यों भागीदार बन रहे हैं? दरअसल, ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके उत्तर हम सभी अच्छी तरह से जानते ही हैं. कहीं न कहीं हम, हमारी व्यवस्था और हमारी सरकारें इसके लिए ज़िम्मेवार हैं.

बिहार, उत्तरप्रदेश और राजस्थान में सरकारी नौकरियों के प्रति दीवानगी हद से ज़्यादा है. इसकी बड़ी वजह है फ़िक्स्ड सैलरी और नौकरी नहीं जाने का खतरा. इसलिए आप देखेंगे कि छात्र 25 वर्ष की उम्र से लगातार सरकारी नौकरी मिलने की आस में मैदान में डटे रहते हैं. नौकरी मिल गई तो उसका ये फायदा होता है कि दहेज अच्छा मिल जाता है और परिवार को सम्मान मिलता है कि फलां का भाई या बेटा सरकारी नौकरी में हैं.

मैं पटना के बोरिंग रोड इलाके में रहता हूं और यहां आप देखेंगे, प्रति वर्ग किलोमिटर में हजारों छात्र अमानवीय स्थितियों में रहते हैं. एक कमरे में 5-6 लड़के छोटी-छोटी चौकी (बेड) लगाकर 12-18 घंटे तक पढ़ते रहते हैं. ये छात्र अपनी पढ़ाई को इतनी गंभीरता से लेते हैं कि इनलोगों ने ओमिक्रोन होने की स्थिति में भी हॉस्टल खाली करने से इंकार कर दिया, कहा कि घर गए तो परीक्षा की तैयारी नहीं हो पाएगी, उनका साल बर्बाद हो जाएगा. मेरे ही कई जानकार पटना में एक दशक से रेलवे और बैंकिंग की नौकरी की तैयारी कर रहे हैं. वो आगे भी कई वर्षों तक तैयारी जारी रखेंगे क्योंकि आगे और कोई रास्ता भी नहीं है.

29 वर्ष की सीमा पार कर चुके एक छात्र से जब मैंने पूछा आगे का क्या सोचा है, तो उसने हाथ जोड़कर कहा कि वो दो साल और तैयारी करेगा. मुझे लगता है कि बिहार, उत्तर प्रदेश या किसी और राज्यों की कमोबेश यही स्थिति है. वो सरकारी नौकरी पाकर जीवन में स्थिरता चाहते हैं, टिफिन लेकर ऑफिस 9 बजे सुबह घर से निकलें और शाम को 6 बजे घर में सोफा पर बैठकर चाय की चुस्कियां लें.

क्या आपको अब भी समझ में आया कि छात्रों के आक्रोश का कारण क्या है? ये एनटीपीसी की वेकेंसी ही चार वर्ष बाद आई.इसके लिए विज्ञापन 2019 में निकाला गया था, जिसकी प्रक्रिया लंबित होते-होते साल 2022 आ गया यानि एक नौकरी हासिल करने का सपना साल दर साल यूं ही आगे की तरफ खिसकता रहा. 2015 में भी यही स्थिति थी, तब भी रेलवे बोर्ड ने नियुक्ति पत्र देते-देते तीन वर्ष का समय लगा दिया था. छात्र संगठनों से जुड़े लोग कहते हैं कि सरकार नौकरी को लेकर गंभीर नहीं रहती है.

एनटीपीसी के 35,281 पदों के लिए कम से कम सात लाख रिज़ल्ट निकाले जाने की बात थी, लेकिन नतीजे कम निकाले गए. इस परीक्षा के लिए करीब-करीब एक करोड़ छात्रों ने फॉर्म भरा था. ग्रुप डी की परीक्षा में भी तीन बार संशोधन हो चुका है छात्र चाहते हैं कि पहले की तरह ही एक ही परीक्षा हो. दो चरण में परीक्षा की घोषणा ने उन्हें परेशान कर दिया लगा कि हाथ आई नौकरी एक बार चली जाएगी तो आगे फिर से अप्लाई करने के लिए योग्य भी नहीं रहेंगे.

कोविड के इस दौर में प्राइवेट नौकरियों का सृजन नहीं हुआ बल्कि उसमें लगातार ह्रास देखने को मिल रहा है. सीएमआईई के आंकड़े बताते हैं कि देश में रोजगार मिलने की संभावना 43 प्रतिशत (2016) से गिरकर 2021 में 37 प्रतिशत पर आ गई है. बिहार के छात्रों के लिए रेलवे की नौकरी बहुत अहम होती है, जिसके लिए वो वर्षों का इंतजार भी करते हैं. एक महत्वपूर्ण बात ये भी बढ़ रही है कि ज़्यादातर सरकारी नौकरियां अब कांट्रैक्ट पर जा रही है जिससे “स्थिरता” का भाव भी जाता रहा है.

गलती अगर कहीं आरआरबी की तरफ से हुई है तो उसमें सुधार करना रेलवे की जिम्मेवारी है.ये भी देखना ज़रूरी है कि छात्र राजनीतिक दलों के लिए राजनीतिक ईंधन न बनें, उन्हें हर कदम सोच समझ कर उठाना होगा. छात्र भी ये गांठ बांध ले कि राजनीतिक दलों के लोग बिना किसी स्वार्थ के न तो किसी का समर्थन करते हैं न ही किसी का विरोध.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
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