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बावरा मन: अपने हिसाब से, दिल की किताब पे कुछ तो नया लिखो!!

बचपन की उस कहानी के याद आते ही असीम ने तुरंत सामने खड़े सिपाही से पूछा, "अच्छा ये तो बताओ जब तुम पापा के साथ थे तो एक सिपाही था जिसकी उंगली बंदूक से उड़ गई थी, वो कहां हैं आजकल...

रीब दस साल पहले की बात है. आगरा के एक मशहूर रेडियो स्टेशन के आरजे ने जब उनसे पूछा कि आपका सबसे पसंदीदा गाना कौन सा है, तो उन्होंने जवाब दिया “फिल्म न्यूयॉर्क का गीत, है जुनून सा सीने में” और खासतौर पर गीत की पंक्ति, “अपने हिसाब से दिल की किताब पे कुछ तो नया लिखो.”

जीवन में कुछ नया लिखने की चाहत में ही उस दिन, आठ जनवरी की शाम को उन्होंने सोशल मीडिया हैंडल्स से अपने वीआरएस लेने का संदेश सार्वजनिक किया था. वीआरएस की सूचना देने वाले अपने संदेश के आखिर में असीम ने लिखा था…

“केवल एक ही कष्ट है अपनी अलमारी के सबसे सुंदर वस्त्र अपनी वर्दी को अब नहीं पहन सकूंगा. अपने साथियों से विदा लेते हुए मैं वचन देता हूं वर्दी के सम्मान के लिए हमेशा, सबसे आगे, मैं खड़ा मिलूंगा. आप को मेरी ओर से एक जोरदार सेल्यूट.

जय हिंद!”

ये पंक्तियां वही इंसान लिख सकता था जिसे अपनी वर्दी और अपनी नौकरी से जुनूनी मोहब्बत हो. बस्पन का प्यार हो😊

“बस्पन” के प्यार की कहानी
22 साल पहले की बात है. पुलिस की खानाबदोश नौकरी की शुरुआत हुए अभी चार पांच साल ही हुए थे. उस दिन झांसी के अपने ऑफिस में असीम, कर्मचारियों की समस्याएं सुन रहे थे. एक एक कर के सब अर्जियां निपट चुकी थीं. आखिर में बस एक ही कांस्टेबल बच गया था. उसके हाथ में न तो कोई कागज़ था और न ही वो कुछ कह पा रहा था. असीम को लगा शायद उसकी समस्या गंभीर है. लेकिन कांस्टेबल की आंखों में कुछ असमंजस, कुछ अपनापन सा था. वो बोला, “साब पहचाना मुझे? हमने आपके साथ ड्यूटी की है”

पिछले चार पांच साल की अपनी नौकरी के सारे पुलिसिया साथी असीम की आंखों के सामने उस क्षण, घूम गए. पर ये चेहरा याद नहीं आ रहा था. कांस्टेबल ने दुविधा भांप ली थी. सकुचाता हुआ बोला…

“साहब मैंने सबके सामने कहना उचित नहीं समझा कि लोग मज़ाक बनाएंगे और मेरी बात का विश्वास भी नहीं करेंगे. जब आप छोटे थे, कक्षा एक में पढ़ते थे. आपके पापा एसएसपी थे तब मैं आपका ड्राइवर था.”

असीम ने ध्यान से उनको देखा. खिचड़ी बाल, अधपकी मूछें और भरे हुए शरीर के 50 वर्षीय कॉन्स्टेबल की वो “पुरानी शक्ल” याद ही नहीं कर पा रहे थे. पर फिर भी “पहचाना नहीं” नहीं कह पा रहे थे.

झिझकते हुए बोले, “अच्छा याद आया, लेकिन उस समय तो मिश्रा और रामू दो ही ड्राइवर रहते थे पापा के पास.”

“नहीं साहब मैं भी रहता था जब आपकी मम्मी पुलिस लाइन, वेलफेयर सेंटर जाती थी तो अक्सर मैं ही ले के जाता था”.

असीम मन ही मन थोड़े खीज भी गए थे. पिता के विभाग में ही नौकरी में आने से उन्हें हर समय कुछ इसी तरह की बातें सुननी पड़ती थी कि मैं आपके पापा के साथ यहां था वहां था. हम आपकी मम्मी को जानते हैं आदि-आदि.

लेकिन तभी उनके मस्तिष्क में कुछ पुरानी सुखद यादें भी उभर आई. बचपन से ही असली बंदूक, असली जीप और असली सिपाहियों को देखते, वो बड़े हुए थे. जब पापा एसएसपी थे तो एक सिपाही की कटी हुई उंगली के विषय में वह अपने मित्रों को अक्सर सुनाया करते थे कि कैसे सिपाही बंदूक की नाल पर उंगली रखकर गाड़ी में बैठा गश्त पर जा रहा था कि अचानक झपकी लग गई और बंदूक चल गई. इस प्रकरण में सिपाही की एक पूरी उंगली ही उड़ गई थी. छोटे असीम के दोस्त भी जब घर आते, वो सिपाही उन्हें अपनी उंगली दिखा कर उस उंगली के उड़ने की पूरी कहानी चटकारे ले कर सुनाया करता.

बचपन की उस कहानी के याद आते ही असीम ने तुरंत सामने खड़े सिपाही से पूछा, “अच्छा ये तो बताओ, जब तुम पापा के साथ थे तो एक सिपाही था जिसकी उंगली बंदूक से उड़ गई थी, वो कहां हैं आजकल.”

“मैं ही तो वो हूं साहब! यह देखिए मेरी उंगली!!”

कहते कहते सिपाही का गला भर गया और उसकी आंखें खुशी के आंसुओं से धुंधली हो गईं. असीम को भी लगा जैसे बचपन का खोया कोई खिलौना वापस मिल गया हो. वो उछलकर कुर्सी से उठे और सामने खड़े सिपाही को गले लगा लिया. हंस कर बोले “तब तुम ड्राइवर कहां थे? तभी तो मैं सोचूं कि मैं पहचान क्यों नहीं पा रहा हूं.”

“हां साहब मैं क्लीनर था और जब रामू और मिश्रा छुट्टी जाते थे तब मैं ही आपकी मम्मी की गाड़ी चलाया करता था.”

“और हां बाकी समय हम लोग गाड़ी में चोर सिपाही खेलते थे. लेकिन ये साहब साहब क्या लगा रखा है. भैया बोलो. जैसे पहले बोलते थे.”

“जी साहब जी, जी भैया जी” कहते उन सिपाही का स्वर गदगद हो गया.

एक जुनूनी मोहब्बत, वर्दी

जिस महकमे से मां पिता जुड़े थे. जिस महकमे से बचपन की सारी यादें जुड़ी थीं. जिस महकमे को सिविल सेवा का इम्तिहान देते वक्त, खुद “फर्स्ट चॉइस” के रूप में चुना था.

उसी महकमे को छोड़ते हुए मन बहुत दुखा था.

कुछ नया लिखने की चाहत में उसे भूल पाना, आसान नहीं था. नए के लिए पुराने का परित्याग, वैसे भी बहुत कठिन होता है. और फिर वर्दी वाले का वर्दी परित्याग, सबसे कठिन.

ख़ासकर वो वर्दी, जो पेट की नाल से जुड़ी हो.

ख़ैर, वर्दी से जुड़े प्यारे प्यारे किस्सों पर एक किताब लिखूं, इस पुलिसिया पत्नी यानि “बावरे मन” को ख़्याल आता रहा. पर जब लिखने की बारी आई, कलम उठाई, तो शुरुआत आखरी अध्याय से करनी पड़ेगी, ये न मालूम था. नौ साल अभी रहते थे और इन नौ सालों में बहुत से पुलिसिया किस्से बनने बाकी थे. बहुत सी ट्रांसफर पोस्टिंग, बहुत सी पैकिंग अनपैकिंग, बहुत सी नई मंजिलें, बहुत से नए संस्मरण, बाकी थे पर…

… पर अब पुलिस परिवार से विदा लेते हुए मेरा मन वही कह रहा है जो कभी “कभी कभी” में मेरे सबसे अज़ीज़ शायर, “साहिर” ने कहा था…

“रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें खत्म नहीं होतीं.

ख्वाबों और उमंगों की मियादें खत्म नहीं होतीं.”

खुश रहिए, आबाद रहिए. हम तो सफ़र करते हैं. इसलिए…

“जो अपने लिए सोची थीं कभी, वो सारी दुआएं देता हूं.”

धन्यवाद

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
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