Bhojpuri Spl: जानीं के रहन संत मलूकदास, जे सउसे जिनिगी कइलन मनुजता के सेवा!

मलूकदास एगो अइसन महान संत रहल बाड़न, जे स्वेच्छा से 108 साल के जिनिगी पावल आ आपन सउंसे जीवन मनुजता के सेवा खातिर समर्पित कऽ दिहल.

Bhojpuri Spl: जानीं के रहन संत मलूकदास, जे सउसे जिनिगी कइलन मनुजता के सेवा!

अंक जोतिस में आउर सनातन धरम में एक सइ आठ (108) अंक बड़ा शुभ मानल जाला. एही से सेसर संत-महात्मा के नांव का संगें श्री श्री 108 अंकित करेके लमहर परिपाटी रहल बा. बाकिर मलूक दास एगो अइसन महान संत रहल बाड़न, जे स्वेच्छा से 108 साल के जिनिगी पावल आ आपन सउंसे जीवन मनुजता के सेवा खातिर समर्पित कऽ दिहल.

आपन हाथ जगरनाथ के हिमायती

मलूकदास के जनम विक्रम संवत 1631 के बैसाख बदी पंचमी माने 09 अप्रैल 1574 के भइल रहे आ 108 बरिस के उमिर में ऊ एह असार संसार से विक्रम संवत 1739 में कूच कऽ गइलन. जाति-धरम के दकियानूसी सोच से अलगा हटिके संत कबीरे नियर मलूकोदास हिन्दुओ के ओतने चहेता रहलन,जतना मुसलमान के.एह से दूनों धरम में उन्हुका अनुयायियन के भरमार रहे.

आपन हाथ जगरनाथ में मलूकदास के गहिर आस्था रहे.उन्हुकर एगो साखी आजुओ जन-जन के जबान पर चढ़ल रहेला,बाकिर ओकर गलत माने लगाके समाज के निकम्मा-निठल्ला आ 'दइब-दइब' गोहरावेवाला आलसी ई मानि लिहलन जिनिगी में किछऊ करे-धरे के जरूरत नइखे, काहेंकि देबेवाला दाता राम त सभकर इंतजाम करबे करिहन. एहसे उलट,मलूकदास के कहनाम रहे कि मनई हरेक किसिम के बन्हन से आजाद रहिके आ खुद खातिर पावे के लालसा छोड़िके अगर आपन काम करे,त परमात्मा सभ किछु अपनेआप दीहें. अजगर केहू के चाकरी ना करेला,चिरई-चुरुंग बन्हनमुक्त होके उड़ान भरेला.ओह सभके जरूरत दाता राम पूरा करेलन. 'हारिए न हिम्मत, बिसारिए न हरिनाम/जाहि विधि राखे राम/वाहि विधि रहिए' के भाव जगावत मलूकदास कहले रहलन-

अजगर करे न चाकरी,पंछी करे न काम.

दास मलूका कह गए,सबके दाता राम ..

राजा भा संत के भविसबानी

मलूकदास लरिकाइएं से अंतर्मुखी सुभाव के रहलन. उन्हुकर मन ना त खेलकूद में लागे,ना लरिकाईं वाला गतिविधियन में. ऊ हरदम मनुजता के कल्यान खातिर लवसान रहत रहलन. एगो पहुंचल साधु के निगाह जब बुतरू मलूक प परल,त ऊ भविसबानी कइलन-'देखीं, एह लरिका के बांह ठेहुना के नीचे ले पहुंचत बिया. ई लरिका आगा चलिके या त परतापी राजा बनी, भा एगो बहुत बड़हन सेसर संत.' राह चलत मलूक के निगाह हरदम कांट-कूस आ आंकड़-पथल पर रहत रहे. जइसहीं उन्हुका कवनो ईंटा-कंकड़ भा कांट-कूस लउके,ऊ लपकिके सजगता से उठा लेसु आ अइसना जगहा ले जाके धऽ देसु,जहवां कवनो मनई के पइसार ना होखे, जवना से कि केहू घवाहिल ना होखे पावे. परदुखकातरता उन्हुका में कूटि-कूटिके भरल रहे. ऊ लिखलहूं रहलन-

मलूका सोइ पीर है, जो जाने परपीर.

जो परपीर न जानई, सो काफिर बेपीर..

एह साखी के मलूकदास पहिला बेरि तब कहले रहलन,जब ऊ एगो दृश्य देखलन. बाढ़ के पानी से जनजीवन तबाह हो गइल रहे. जब ऊ बाढ़ के कारन जानल चहलन, त उहां के लोग एगो फकीर कड़क खां के कथा सुनावल. कबो फकीर कड़क खां उहां से गुजरत रहलन. तलहीं उन्हुकर निगाह एगो धोबी प परल रहे. ऊ अपना गदहा के निछोहीं घावे लबदा से पीटत रहे. सूफी फकीर कड़क खां मर्माहत हो गइल रहलन आ आपन किरोध शांत करे खातिर धरती पर एक लात मरलन. फेरु त धरती से पानी के धार फूटि परल रहे आ उहवां बाढ़ आ गइल रहे. एगो अदिमी के करतूत के सजाइ सउंसे जनसमुदाय के दिहल उन्हुका मुनासिब ना लागल. फकीर कड़क खां के चमत्कार में उन्हुका जनता के पीर के झलक मिलल आ ऊ ऊपर के साखी कहिके उहवां के लोगन के समुझवलन. फेरु मलूकदास उहवां एगो ईंटा राखि दिहलन. तुरुंते जल के धार बन्न हो गइल आ थोरहीं देरी का बाद बाढ़ के पानी सूखि गइल.त्रस्त जनमानस के बहुत बड़ राहत मिलल आ चारू ओरि उन्हुकर जै-जैकार होखे लागल रहे.

जरूरतमंद के मदत

मलूकदास के जनमस्थली आ करमस्थली 'कड़ा' रहे. जब मलूक के झुकाव अध्यात्म का ओरि होखे लागल रहे,त उन्हुकर बाबूजी उन्हुका के कवनो कामकाज करे के नसीहत दिहलन. उन्हुकर ऊनी कम्मर के छोट-मोट धन्हा रहे. ऊ मलूक के गिनिके किछु कम्मर दिहलन आ बाजार में बेचिके पइसा ले आवे के कहलन. बाकिर मलूक शीतलहर से कंपकंपात गरीब बेसहारा लोगन में मुफुते में कम्मर बांटिके खाली हाथ लवटि आइल रहलन. बाबूजी सुन्दर दास जब कपार पीटे लगलन,त मलूक उन्हुका के जिनिगी के सार्थकता के भान करवले रहलन आ दीन-दुखी,जरूरतमंदन के मदत कऽके सही माने में सुख पावे के एहसास करवले रहलन.

जवना घरी कड़ा में भयंकर प्लेग के महामारी फइलल रहे, उहवां के लोग एक-एक कऽके गांव छोड़े लागल रहे.मलूक के बाबुओजी गांव से भागे के तय्यारी कऽ लेले रहलन. मलूक ओह घरी घर में ना रहलन. जब सुन्दर दास बेटा के खोज में गांव में निकललन,त देखलन कि मलूक गांव के दक्खिन घिस्सू मोची के प्लेगपीड़िता मेहरारू के सेवा-टहल में लागल रहलन. ऊ अपना बाबुओजी से मानवता के सेवा करेके निहोरा कइलन. फेरु त सुन्दरो दास बेटा के सेवाभाव से सबक लेले रहलन आ आस्ते-आस्ते गांव से प्लेग के नामो-निशान मिटि गइल रहे.

प्रभु हमार सुमिरन करसु

मलूकदास निरगुन आ निराकार ब्रह्म के उपासक रहलन.भक्ति योग के सच्चा साधक रहलन ऊ. उन्हुकर कहनाम रहे कि जीव आ ब्रह्म का बीचे देवाल बनिके ठाढ़ बा अहंकार. जब ले एकर खातमा ना होई, तब ले सांच भक्ति असंभव बा. ई भक्ति संवेदनशीलता में बा. भुखाइल के रोटी आ पियासल के पानी देके अपना संवेदनशील सुभाव के परिचय दिहल जा सकेला. ऊ कहत रहलन कि नि:स्वारथ भाव से दुखिया के दुख दूर कऽके,पीड़ित मानवता के सुख पहुंचाके हमार अंतरातमा परमात्मा में लीन हो सकेला. तब माला फेरला आ राम नांव जपे के जरूरतो ना परी. तब,हम विश्राम करबि आ प्रभु हमार सुमिरन करिहन-

माला फेरु न कर जपौं,जिभ्या भजौं न राम.

सुमिरन मेरा हरि करै, मैं पायौं विश्राम..

सबहिन के हम,सबै हमारे

संत मलूकदास ई बात साफ-साफ कहत रहलन-'हम संध्या-तर्पण सब तजि देले बानीं. तीरथ-नहानो कबो ना करीं. हरि रूपी हीरा त हमरा हिरदये में बा. बस हम ओकरा के भावना रूपी जल से नहवावत रहेलीं.'

तुलसी के भक्ति-भावना 'सियाराममय सब जग जानी' आ 'सुरसरि सम सभ कहं हित होई' में बिसवास राखेवाला संत मलूकदास के तमाम धर्मावलम्बियन से प्यार रहे,संपूर्ण मानवता से ममता रहे. एहसे का हिन्दू,का मुसलिम-सभे उन्हुका से बेइंतिहां प्यार करत रहे,आजुओ करेला. उन्हुकर 108बरिस के लमहर उमिर आ संतजीवन के राज़ आ सार रहे-

सबहिन के हम,सबै हमारे.

जीव-जन्तु मोहि लगैं पियारे..

(लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी जी वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)

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