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95 year old woman travels 900 km every 3 months just to tell herself alive read painful story cgnt

हर 3 महीने में 900 किलोमीटर का सफर करती हैं 95 साल की महिला, सिर्फ ये बताने कि- मैं जिंदा हूं

पूर्व सैनिक की पत्नी ललिता देवी को हर तीन महीने में 900 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है.

पूर्व सैनिक की पत्नी ललिता देवी को हर तीन महीने में 900 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है.

एक 95 साल की महिला को हर तीन महीने में लगभग 900 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है. महिला द्वितीय विश्वयुद्ध के सैनिक की बेवा हैं. वे छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रहती हैं, लेकिन हर तीसरे महीने उन्हें बिलासपुर से उत्तर प्रदेश के बलिया का सफर तय करना पड़ता है, वो भी सिर्फ ये बताने के लिए कि 'मैं जिंदा हूं.'

रायपुर. उत्तर प्रदेश के बलिया निवासी रंजित सिंह ने द्वितीय विश्वयुद्ध में हिस्सा लिया और ब्रिटिश इस्ट इंडिया की तरफ से राजपूत रेजिमेंट से युद्ध लड़े. रंजित के पिता दुर्गा दत्त भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे हैं. रंजित सिंह 1942 से 45 तक चले वर्ल्ड वॉर के बाद रिटायर्ड हुए और 2003 में उनका निधन हो गया. उसके बाद छोटे बेटे आरके सिंह जो की छत्तीसगढ़ के बिलासपुर कृषि विभाग में पदस्थ थे, ने अपनी माता ललिता देवी को अपने साथ बिलासपुर ले आए.

बिलासपुर के तिफरा में रहते हुए 95 वर्षीय ललिता देवी अपने सैनिक पति की महज 6000 रुपये की पेंशन को पाने पिछले कई वर्षों से उत्तर प्रदेश तक जाती हैं. ललिता देवी के पुत्र आरके सिंह कहते हैं बिलासपुर से बलिया आने जाने में करीब चार हजार रुपये खर्च हो जाते हैं. जिसकी वजह है की हर तीन माह में सैनिक बोर्ड द्वारा पेंशन के लिए ललिता देवी से जीवित रहने का प्रमाण मंगाते हैं. ये शासकीय नियम है, इसमें कोई आपत्ती नहीं है, लेकिन ललिता देवी के पुत्र ने कई बार पेंशन खाते को बिलासपुर ट्रांसफर करने का आवेदन दिया पर कोई सुनवाई नहीं हुई.


हर बताने जाती हैं कि मैं जिंदा हूं
पूर्व सैनिक की बेवा ललिता देवी उम्र की वजह से अब ठीक से चल भी नहीं पाती हैं. ललिता देवी को उनके पुत्र आरके सिंह, जो अब वे भी बुजुर्ग हो गए हैं, उत्तर प्रदेश के बलिया ले जाते हैं और वहां ललिता देवी बताती हैं कि ‘मैं अभी जिंदा हूं.’ आरके सिंह बताते हैं कि हम चाहते हैं कि पेंशन का खाता बलिया से बिलासपुर शिफ्ट कर दिया जाए. इसके लिए कई बार आवेदन दिए, गुहार लगाई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. आमतौर पर साल में एक बार जीवित प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होता है, लेकिन सैनिक बोर्ड में हर तीन महीने में ये प्रमाण पत्र देना होता है, जिससे काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. अब आना-जाना मुश्किल होता है.

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