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मैं लड़का था, फिर भी 8 साल की उम्र से ही मुझे सब छमिया कहते थे, पढ़ें- कहानी जेंडर बदलवाने वालों की

छत्तीसगढ़ की ट्रांसवुमेन निक्की बजाज जेंडर बदलवाने के बाद खुशहाल जीवन जीने का दावा करती हैं.

छत्तीसगढ़ की ट्रांसवुमेन निक्की बजाज जेंडर बदलवाने के बाद खुशहाल जीवन जीने का दावा करती हैं.

क्या कोई गलत शरीर के साथ पैदा हो सकता है? ट्रांस होना क्या एक बीमारी है? जेंडर बदलवाने वाले लोगों का जीवन कैसा होता है? जेंडर बदलवाना कितनी बड़ी चुनौती है? आत्मा और शरीर का एक होना क्या होता है? क्या ट्रांसजेंडर भी लड़के और लड़कियों की तरह जिंदगी जी सकते हैं? ट्रांसजेंडर से जुड़े ऐसे तमाम सवालों के जवाब के लिए पढ़ें ये खास रिपोर्ट.

रायपुर. निक्की बजाज मई 2022 में राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में तब आईं, जब उन्होंने माउंट एवरेस्ट के फर्स्ट बेस कैंप तक 5,364 मीटर की ऊंचाई पैदल ही नाप दी. निक्की छत्तीसगढ़ की पहली और भारत की उन चुनिंदा ट्रांसजेंडर पर्वतारोहियों में शामिल हैं, जो माउंट एवरेस्ट के फर्स्ट बेस कैंप तक पहुंची. माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई से चार साल पहले 2018 में जेंडर बदलवाकर वो विक्की से निक्की बजाज बनीं. तब उनकी उम्र करीब 27 साल थी.

पेशे से टेक्निकल ट्रेनर एजुकेटर ऑफ हेयर निक्की फिलहाल मुंबई में हेयर स्टाइलिस्ट हैं. अपने काम को इंजॉय करती हैं और ठीक-ठाक पैसे भी कमा लेती हैं. निक्की को 2018 से अब तक लॉरियल बेस्ट हेयर स्टाइलिस्ट अवार्ड, मिस स्मार्ट सिटी, सेंट्रल इंडिया अवार्ड मिल चुका है. 2020 में फ्रेंडशिप माउंटेनर पीक, मनाली को उन्होंने फतह किया. 2 साल के रिलेशनशिप के बाद निक्की ने 16 जून 2021 को मुंबई में रहने वाले शख्स से शादी की. पिछले छह महीने से वे मुंबई में ही सेटल हैं.


क्या पहले इतनी ही खुशनुमा थी जिंदगी?
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जन्मी 31 वर्षीय निक्की कहती हैं जेंडर बदलवाने के बाद से वे मानसिक, शारीरिक दोनों तरह से स्वस्थ्य हैं और सबसे बड़ी बात है कि खुशनुमा जिंदगी जी रही हैं. बातचीत के सिलसिले के बीच निक्की कुछ देर के लिए चुप हो जाती हैं. फिर धीमी आवाज में कहती हैं, “जबसे होश संभाला घर वालों से डांट और मार ही पड़ती थी. पहले मुझे समझ ही नहीं आता था कि मैं कोई गलती न करूं फिर भी मार क्यों पड़ती है. मम्मी कहती थीं विक्की ठीक से चल, पापा कहते थे ठीक से बात किया कर. मैं लड़का था, फिर भी मुझे लड़कियों की तरह रहना, उनके साथ खेलना अच्छा लगता था. मैं लड़कियों के कपड़े भी पहन लेता था. इन आदतों के चलते ही हर दिन मार पड़ती थी, ताने सुनने पड़ते थे.”निक्की कहती हैं, “एक उम्र के बाद धीरे-धीरे शब्दों के मायने समझ आने लगे थे. समझ में आ गया था कि मेरी आत्मा और शरीर अलग-अलग हैं. उस समय ही मुझे ये भी समझ आया कि मैं लड़का था, फिर भी 8 साल की उम्र से ही मुझे कुछ लोग ‘छमिया’ क्यों कहते थे. हमारी ज्वाइंट फैमिली थी. सब एक साथ रहते थे, लेकिन मैं उनके बीच सबसे अलग और अकेला. 15-16 साल की उम्र में मैंने अपनी सबसे करीबी सहेली से अपनी परेशानी बताई. हमने इस संबंध में कुछ रिसर्च पढ़ा, अपने तरीके से पता लगाया. मैंने खुद के बालिग होने का इंतजार किया. इस बीच हमें एक डॉक्टर के बारे में पता चला जो जेंडर बदलने की सर्जरी करते थे. रकम याद नहीं है, लेकिन फीस सुनकर हम वहां से भाग आए.”

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सड़क पर नोचने वाले घूमते हैं
निक्की कहती हैं, “21 साल तक मैंने लड़का बनकर ही जीने की कोशिश की. घर में मारपीट और तानों का सिलसिला जारी था. लड़के मुझसे दोस्ती नहीं करते थे, कहते थे तुम किन्नर हो. इस दौरान मेरे ही समुदाय के कुछ लोगों से मेरी दोस्ती हुई. इसी उम्र में मैंने घर छोड़ दिया. लड़कियों की तरह खुलेआम कपड़े पहनने शुरू किया, नेल पॉलिश लगाई, मेकअप किया. रोजगार के लिए मेकअप आर्टिस्ट की ट्रेनिंग ली.” निक्की गुस्से में कहती हैं कि कुछ लोग सड़कों पर नोचने के लिए घूमते हैं. 21 से 27 साल की उम्र में कई बार हादसे हुए. इस उम्र तक कई चुनौतियों का सामना किया. किसी तरह पैसे जुटाए और जेंडर बदलवाया. तब जाकर आत्मा और शरीर से एक हो पायी.

घर, समाज वालों से डरता है
रायपुर नगर निगम में संविदा नौकरी कर रहे राघव गड़पायले ट्रांसमैन हैं. राघव ने जेंडर चेंज की प्रक्रिया में टॉप सर्जरी करा चुके हैं. इसके तहत ब्रेस्ट रिमूव किया जा चुका है. बॉटम सर्जरी से पहले जरूरी दवाइयां ले रहे हैं. मूलत: छत्तीसगढ़ के धमतरी के रहने वाले राघव बताते हैं, “मां के पेट से मैंने लड़की के शरीर में जन्म लिया. घर वालों ने नाम ज्योति रखा, लेकिन बचपन से ही मुझे समझ नहीं आता था कि क्या हो रहा है. मुझे लड़कों की तरह रहना पसंद था. घर वाले डांटते थे. उन्हें लगता था कि थोड़ी बड़ी होगी तो समझ जाएगी, लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ी मुझे समझ आने लगा कि मैं गलत शरीर में हूं. 24 साल की उम्र में शादी का रिश्ता आया, लेकिन मैंने मना कर दिया. बाबूजी मुझे समझते थे, वे मेरे पक्ष में थे, लेकिन 2013 में उनका निधन हो गया. उसके बाद घर में रहना मुश्किल हो गया. घर छोड़ना पड़ा.”राघव कहते हैं, “मुझे लगता था कि मैं दुनिया में अकेली ही ऐसी हूं, लेकिन घर छोड़ने के बाद जब अलग-अलग जगहों पर जॉब की तब पता चला कि मेरे जैसे कई लोग हैं. कुछ लोगों के संपर्क में आने के बाद मुझे जेंडर बदलने की सर्जरी के बारे में पता चला. इस दौरान धमतरी में मेरी एक टीचर ने मदद की. उन्होंने घर वालों को भी समझाया. इसी बीच एक हादसे में 2018 में मेरे इकलौते भाई की मौत हो गई. 2 बड़ी बहनों की शादी हो चुकी है. पिता का निधन पहले ही हो चुका था. एक दिन मेरी टीचर घर आयीं. उन्होंने मां और दीदी को समझाने की कोशिश की. लेकिन उन्होंने कहा कि हम अपना भी लेंगे तो समाज हमारा बहिष्कार कर देगा. समाज उसे नहीं अपनाएगा. इसलिए हम उसे लड़के के रूप में घर आने की इजाजत नहीं दे सकते. हालांकि धीरे-धीरे उन्होंने मुझे समझा. अब मां और बहनों ने मुझे बेटे और भाई के रूप में अपना लिया है.”

एक सी ही है संघर्ष और चुनौतियों की कहानी
रायपुर निवासी ट्रांसवूमेन 18 वर्षीय सुधा विश्वकर्मा, जांजगीर निवासी 28 वर्षीय अप्सरा जायसवाल, कोरिया जिले के 35 वर्षीय मन्नत थापा, बेमेतरा की संध्या यादव समेत दर्जनभर से ज्यादा ट्रांस जेंडर ने अपने संघर्ष की कहानी न्यूज 18 से साझा की. बातचीत में लगभग सभी ने परिवार वालों की अनदेखी, प्रताड़ना और फिर मोहल्ले, स्कूल, कॉलेज, व्यावसायिक संस्थानों में तानें, भद्दी टिप्पणियों का जिक्र किया. कुछ लोगों के साथ तो हिंसक घटनाएं भी हुईं.

छत्तीसगढ़ तृतीय लिंग कल्याण बोर्ड की सदस्य रवीना बरिहा कहती हैं, “घरवालों को समझाना सबसे कठिन होता है. ज्यादातर मामलों में तो वे ट्रांस को बीमार मानते हैं और इलाज तक करवाते हैं. जबकि ऐसा नहीं है. कानूनी तौर पर भी मान लिया गया है कि ये एक बीमारी नहीं है. हालांकि इस बात को मनवाने के लिए अभी लंबी लड़ाई लड़ने की जरूरत है.” समाजिक न्याय अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार में सलाहकार रह चुकीं रवीना कहती हैं, ”ट्रांस के रूप में हमारे आस-पास नजर आने वाले कुछ वे लोग हैं, जो परिवार और समाज से संघर्षकर सामने आए. इनसे कई गुना ज्यादा लोग ऐसे हैं, जो ट्रांस होने के बावजूद भी अपनी बात खुलकर नहीं रख पाते. अपने-आप में ही घुटते रहते हैं. ऐसे लोगों की पहचान करना और उनके हालात को समझना सबसे बड़ी चुनौती है.”3 से 5 हजार ट्रांस कराना चाहते हैं सर्जरी
शासकीय मेडिकल कॉलेज रायपुर में प्रोफेसर व प्लास्टिक सर्जन डॉ. दक्षेश शाह बताते हैं, “पिछले कुछ वर्षों में जेंडर बदलने की सर्जरी करवाने वालों की संख्या बढ़ी है. छत्तीसगढ़ में ऐसे 3 से 5 हजार लोग हैं, जो जेंडर परिवर्तन करवाना चाहते हैं. इनमें मेल से फीमेल बनने की इच्छा रखने वालों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा है. शासकीय अस्पताल में भी अब इसकी सुविधा उपलब्ध है.’ डॉ. शाह बताते हैं कि राज्य सरकार द्वारा संचालित रायपुर के दाउ कल्याण सिंह सुपरस्पेशिलिटी हॉस्पिटल के बर्न एंड प्लास्टिक सर्जरी यूनिट में लिंग परिवर्तन के 8 से 10 ऑपरेशन हो चुके हैं.

करीब 25 साल के चिकित्सकीय अनुभव वाले प्लास्टिक सर्जन व कॉस्मेटोलॉजिस्ट डॉ. शाह का कहना है कि ”जेंडर बदलने की सर्जरी काफी कठिन है. हार्मोनल बदलाव के लिए कई दवाइयां लेनी पड़ती हैं. शारीरिक स्थिति और उम्र का भी खयाल रखना होता है. नई तकनीक आने के बाद इसका सक्सेस रेसियो काफी बढ़ा है, लेकिन फिर भी रिस्क से इनकार नहीं किया जा सकता है. सब कुछ सर्जरी की इच्छा रखने वाले के एक्सपेक्टेशन पर निर्भर करता है. शरीर में जितने ज्यादा बदलाव की अपेक्षा रखेंगे, कॉम्प्लिकेशन उतना ही अधिक होगा.”

क्या हैं जेंडर बदलने की औपचारिकता?
डॉ. शाह बताते हैं कि पहले काउंसलिंग की जाती है. इस दौरान उसकी मनोस्थिति समझने की कोशिश की जाती है. काउंसलिंग की प्रक्रिया के बाद भी यदि शख्स अपना जेंडर बदलवाना चाहता है तो उसे कोर्ट से एक शपथ पत्र बनावकर जमा करना पड़ता है. फिर तमाम चिकित्सकीय परीक्षण के बाद लिंग परिवर्तन के लिए दवाइयों और सर्जरी की प्रक्रिया की जाती है.बता दें कि सर्जरी के बाद मेडिकल सर्टिफिकेट की मदद से सरकारी कागजातों जैसे राशन कार्ड, आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड में नाम और जेंडर बदलवाया जा सकता है. जेंडर बदलवा चुके रायपुर के एक ट्रांसवुमेन की मानें तो शासकीय अस्पताल में विभिन्न योजनाओं के दायरे में आने के कारण खर्च बहुत ही कम होता है. हालांकि निजी अस्पतालों में इस पूरी प्रक्रिया में 2 से 5 लाख रुपये सामान्य तौर पर खर्च हो ही जाते हैं.

बात को समझें, अपना विचार न थोपें
छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े शासकीय अस्पताल मेकाहारा के मनोचिकित्सा विभाग के प्रमुख डॉ. मनोज साहू कहते हैं, “शरीर की बनावट चाहे जो भी हो, लेकिन मानसिक रूप से यदि शख्स उससे संतुष्ट नहीं है तो फिर वो उससे परेशान रहता है. मसलन लड़के के रूप में जन्म लेने वाला खुद को लड़की मानने लगता है. इसी तरह लड़की के रूप में जन्म के बावजूद वो शख्स खुद को लड़का समझे और उसी की तरह रहे. यह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि एक सामान्य है. ये लोग कोई असमान्य नहीं हैं. ऐसे में हमें अपने विचार उस पर थोपना नहीं चाहिए. उसकी बात समझनी चाहिए. ऐसे कई केस में काउंसलिंग के लिए लोग हमारे पास आते हैं. कई लोग निजी क्लीनिकों में भी जाते हैं. हमें उन्हें समाज से अलग नहीं समझना चाहिए, बल्कि उनके नजरिये को समझने की जरूरत है. ऐसे नजरिये का सम्मान करना चाहिए. ऐसे लोगों से कटने की बजाय उनके साथ जुड़ने की जरूरत है.”

छत्तीसगढ़ के मशहूर मनोचिकित्सक डॉ. साहू कहते हैं- ”कई बार पैरेंट्स भी साथ में आते हैं, कहते हैं समझाइये कि ये लड़का है, लड़की नहीं, या लड़की लड़का नहीं. हम उनसे कहते हैं आप पुरुष हैं और यदि आप से कहेंगे कि महिला की तरह जीवनभर रहें या आप महिला हैं, लेकिन पुरुष की तरह जिंदगी बिताएं तो क्या आप मानेंगे. ऐसे ही हमें ट्रांस की भावनाओं को भी समझना होगा. कई लोग तो ट्रांस और समलैंगिग को एक ही मानते हैं. इसके बीच के अंतर को भी काउंसलिंग के दौरान समझाया जाता है. बताया जाता है कि ट्रांस समलैंगिग नहीं होते. ऐसे मामलों में पालकों की काउंसलिंग की जरूरत ज्यादा है. अगर पालक 10-12 साल की उम्र में ही बच्चों की हरकतों पर बारीक नजर रखें तो आसानी से पता लगा सकते हैं कि वो ट्रांस है या नहीं.”

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