JNUSU Election: जेएनयू में लेफ्ट या राइट किसके लिए चुनौती है 'बापसा'

क्या इस बार जेएनयू में होगा ‘बापसा’ का उदय! बापसा ने लाल और भगवा झंडे को भाई-भाई बताकर वामपंथी गढ़ में छात्रों को नया विकल्प देने की कोशिश की है

ओम प्रकाश , News18Hindi
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में आमतौर पर लेफ्ट बनाम लेफ्ट की जंग होती रही है. लेकिन अब ऐसा नहीं है. यहां अंबेडकरवादी राजनीति के नाम पर उभरा बापसा (बिरसा-अंबेडकर-फूले स्‍टूडेंट एसोसिएशन) भी बड़ी ताकत बनता नजर आ रहा है. यह लेफ्ट-राइट दोनों को ललकार रहा है. इसने पिछले दो चुनावों से लेफ्ट फ्रंट और एबीवीपी दोनों की नाक में दम किया हुआ है. इस बार यह और आक्रामक है. बापसा ने लाल और भगवा झंडे को भाई-भाई बताकर वामपंथी गढ़ में छात्रों को नया विकल्प देने की कोशिश की है.15 नवंबर 2014 को अस्‍तित्‍व में आया यह संगठन 2015 से चुनाव मैदान में है. 2016 में यह अध्‍यक्ष पद के लिए 1545 वोट लेकर दूसरे नंबर पर था. उपाध्‍यक्ष पद पर उसे तीसरा स्‍थान मिला था. 2017 के चुनाव में उसे कुल 4620 वैध मतों में से अध्यक्ष पद के लिए 935 वोट मिले. इस बार यहां लेफ्ट, एबीवीपी और बापसा में सीधी जंग है.       बिरसा मुंडा, आंबेडकर और फुले हैं इसके आदर्श (File Photo)पिछले दो चुनाव परिणाम से यह साफ हो चुका है कि बापसा जेएनयू परिसर में अपने पैर जमा चुकी है. बस उसे सीट की दरकार है. ‘लाल दुर्ग’ में लेफ्ट का मुकाबला सिर्फ ‘भगवा’ से ही नहीं बल्कि ‘नीले’ रंग से भी है. बापसा 2014 में बना संगठन है, जो भीमराव आंबेडकर, सावित्री बाई फुले और बिरसा मुंडा के बताए रास्ते पर चलने का दावा करता है. यानी जेएनयू कैंपस में यह आंबेडकरवादी राजनीति का चेहरा है. वो सभी लेफ्ट संगठनों पर ब्राह्मणवादी होने का आरोप लगाता है.इसे भी पढ़ें: SC/ST की सियासत करने वाले ये नेता सवर्णों के लिए क्यों मांग रहे हैं आरक्षणइसके नेता राहुल सोनपिंपले कहते हैं, “लेफ्ट बात जरूर करता है लेकिन एससी/एसटी, ओबीसी और मुस्लिमों को अपने संगठन में जगह नहीं देता. इसलिए अब देश की तरह ही जेएनयू में भी नीली क्रांति का उदय हो रहा है.”इसने अपने गठन के बाद से कैंपस में  एससी/एसटी, पिछड़ों, आदिवासियों, मुस्‍लिमों, कश्‍मीरियों और पूर्वोत्‍तर के रहने वाले विद्यार्थियों में अपनी पैठ बनानी शुरू की. इन्‍हीं पर फोकस किया.ये भी पढ़ें: SC/ST एक्‍ट के विरोध पर BJP सांसद पार्टी पर भड़कीं-'संविधान लागू करो वर्ना कुर्सी खाली करो'मीडिया से दूर रहकर इसने अपना काडर मजबूत किया. नतीजा यह हुआ कि यह लेफ्ट के लिए उन्‍हीं के गढ़ में चुनौती बन गया. जानकारों का कहना है कि सिर्फ पांच साल पहले बने इस संगठन के उभार से सबसे ज्‍यादा नुकसान लेफ्ट को होता दिख रहा है.लेफ्ट की जीत का रथ रोकने के लिए एबीवीपी और बापसा दोनों खड़े हैं. इसीलिए इस बार आईसा (ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन), एसएफआई (स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया), डीएसएफ (डेमोक्रेटिक स्‍टूडेंट्स फेडरेशन) और एआईएसएफ (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फैडरेशन) चार संगठन मिलकर अपना किला बचाने में जुटे हुए हैं. बात एबीवीपी की करें तो लेफ्ट से नाराज जो छात्र उसके साथ जुड़ते उन्‍हें बापसा में विकल्‍प मिल चुका है.       जेएनयू में 14 सितंबर को छात्र संघ चुनाव होने हैं. (File Photo)बापसा ने अध्यक्ष पद के लिए टी. प्रवीण, उपाध्यक्ष के लिए पी. नाइक, जनरल सेक्रेट्री के लिए विश्वंभर नाथ प्रजापति और जॉइंट सेक्रेट्री के लिए कनकलता यादव को मैदान में उतारा है.इसे भी पढ़ें: वही सवर्ण एक्‍ट का विरोध कर रहे हैं जिनकी मंशा SC/ST के उत्पीड़न की: BJP सांसद

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