JNUSU Election: क्या जेएनयू में इस बार लहराएगा भगवा!

इस बार जेएनयू में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए एबीवीपी ने पूरी ताकत झोंक दी है. पिछले साल चुनावों में अध्यक्ष पद की रेस में दूसरे नंबर रहीं निधि त्रिपाठी का दावा है कि नए स्टूडेंट्स का बड़ा हिस्सा उनके साथ है.

ओम प्रकाश , News18Hindi

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में सभी लेफ्ट संगठनों ने पहले ही भांप लिया है कि यहां पर भगवा झंडा यानी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) कमजोर नहीं है. इसलिए उन्‍होंने सारे मतभेद भुलाकर ‘महागठबंधन’ किया. आंकड़ों पर गौर करें तो भगवा ब्रिगेड 'लालगढ़' में लगातार अपनी जमीन मजबूत कर रहा है, जिसकी वजह से लेफ्ट यहां एक होने को मजबूर हुआ है. ये महागठबंधन बता रहा है कि इस बार लेफ्ट के लिए राह आसान नहीं है. इसलिए सवाल उठ रहा है कि क्‍या अपने ही गढ़ में लेफ्ट संगठनों ने एबीवीपी को बड़ी चुनौती मान ली है?


आमतौर पर जेएनयू में लेफ्ट बनाम लेफ्ट की लड़ाई ही दिखती रही है, क्योंकि यह वामपंथी किला माना जाता है. लेकिन एबीवीपी ने 2015 में यहां सेंध लगा ली. उसने संयुक्‍त सचिव की एक सीट जीत ली थी. इसके बाद वहां लेफ्ट संगठनों को दक्षिणपंथी ताकत के उभार का डर सताने लगा. जैसे-जैसे जमीन खोने का डर सताने लगा लेफ्ट का गठबंधन पहले से ज्‍यादा मजबूत होता गया. 2016 में आईसा (ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन) और एसएफआई (स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया) ने साथ चुनाव लड़ा था.


         एबीवीपी को 2015 में मिला था संयुक्त सचिव का पद


साल 2017 का चुनाव आया तो इस गठबंधन में आईसा और एसएफआई के साथ डीएसएफ (डेमोक्रेटिक स्‍टूडेंट्स फेडरेशन) भी शामिल हुआ. लेफ्ट यूनिटी की ही गीता कुमारी ने जीत हासिल की, लेकिन लेफ्ट के तीन छात्र संगठनों के साथ आने के बावजूद एबीवीपी की निधि त्रिपाठी दूसरे स्थान पर रही थीं.


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इस चिंता में इस साल यानी 2018 में एआईएसएफ (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फैडरेशन) भी लेफ्ट यूनिटी का हिस्सा हो गया है. आइसा की नेशनल प्रेजिडेंट और जेएनयूएसयू की अध्यक्ष रहीं सुचेता डे ये तो मानती हैं कि एबीवीपी कैंपस में मजबूत हुई है, लेकिन उनका ये भी कहना है कि लेफ्ट यूनिटी चारों सीटें आसानी से निकाल लेगी. पिछले चुनाव में हमने कन्हैया कुमार से बातचीत की थी. तब उन्होंने कहा था कि ‘विद्यार्थी परिषद कहीं भी कमजोर नहीं था, फिर भी समझदारी से काम लिया तो वह बाहर हो गए.’


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साल 2015 में अध्‍यक्ष पद के लिए एबीवीपी को 956 वोट मिले थे. 2016 में 1048 और 2017 में 1042 वोट हासिल हुए. जबकि उसके खिलाफ लेफ्ट संगठनों की मोर्चा हर बार मजबूत होता रहा. इस बार जेएनयू में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए एबीवीपी ने पूरी ताकत झोंक दी है. पिछले साल चुनावों में अध्यक्ष पद की रेस में दूसरे नंबर रहीं निधि त्रिपाठी का दावा है कि नए स्टूडेंट्स का बड़ा हिस्सा उनके साथ है. निधि के मुताबिक, एबीवीपी इस साल भी स्टूडेंट सेंट्रिक मुद्दों को लेकर ही चुनाव लड़ रही है.


         क्या जेएनयू में लेफ्ट के आखिरी दिन चल रहे हैं? (File Photo)


क्यों कमजोर हो रहा लेफ्ट?

लेफ्ट यूनिटी के नेता हालांकि सार्वजनिक तौर से इस बात को मानने से हिचकते नजर आते हैं कि जेएनयू में लेफ्ट अब पहले जितना मजबूत नहीं रहा. बापसा (बिरसा आंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन) से जुड़े राहुल और एबीवीपी की निधि त्रिपाठी भी ये सवाल उठाते हैं कि लेफ्ट संगठनों के लोग लगातार कांग्रेस और अन्य दलों में जा रहे हैं.


पूर्व जेएनयूएसयू अध्यक्ष संदीप सिंह कांग्रेस में हैं और शेहला रशीद के भी पीडीपी में जाने की चर्चाएं आम हैं. कई लेफ्ट लीडर्स पर सेक्सुअल हरासमेंट के आरोप लगे हैं. ऐसे में लेफ्ट की नई लीडरशिप के सामने स्टूडेंट्स में भरोसा बनाए रखने का संकट भी है. हालांकि लेफ्ट संगठनों से जुड़े पुराने लोग ये मानते हैं कि दलित-पिछड़ों के दूर होने के चलते लेफ्ट के संगठन सिमट कर एक साथ आने के लिए मजबूर हो गए हैं.


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