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लोकसभा चुनाव 2019: नवल ठाकुर, जिन्होंने 34 साल में 16 इलेक्शन लड़े, सभी हारे

नवल ठाकुर ने अपने राजनीतिक करियर में सबसे पहला चुनाव 1957 में लड़ा. वहीं, साल 1991 में अंतिम चुनाव लड़ा. साल 1967 में नवल ठाकुर महज 323 मतों के अंतर से विधानसभा चुनाव हारे थे.

News18Hindi |

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू के नवल ठाकुर की उम्र 93 साल है. 93 साल के इस बुजुर्ग की घाटी में खासी पहचान है. पहचान के पीछे की कहानी बड़ी दिलचस्प है. क्योंकि 93 साल के नवल ठाकुर ने अपने 34 साल के राजनीतिक करियर में 16 इलेक्शन लड़े और सभा हारे. जीता भले ही एक भी इलेक्शन न हो, लेकिन लोग आज भी इस वयोवृद्ध नेता को याद करते हैं. नवल ठाकुर ने 12 विधानसभा और चार लोकसभा चुनाव लड़े.


हिमाचल निर्माता से दोस्ती

जिला कुल्लू की ये एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने गरीबों की लड़ाई लड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी. डॉ. वाईएस परमार से विशाल हिमाचल मूवमैंट के दौरान हुई इनकी दोस्ती के बाद इन्होंने कई बार आंदोलन में हिस्सा लिया. लगघाटी के भुट्टी गांव के नवल ठाकुर (93) कई बार लोकसभा और विधानसभा चुनाव के रण में बतौर आजाद प्रत्याशी उतरे.


वीरभद्र सिंह के खिलाफ भी लड़े

नवल ठाकुर ने अपने राजनीतिक करियर में सबसे पहला चुनाव 1957 में लड़ा. वहीं, साल 1991 में अंतिम चुनाव लड़ा. साल 1967 में नवल ठाकुर महज 323 मतों के अंतर से विधानसभा चुनाव हारे थे. कैबिनेट मंत्री लाल चंद प्रार्थी ने उन्हें हराया. इससे पहले साल 1962 में भी नवल ठाकुर ने विधानसभा चुनाव लड़ा और लाल चंद प्रार्थी से हार गए. वीरभद्र सिंह के खिलाफ भी लोकसभा चुनाव लड़े और हार गए, लेकिन चुनावी रण में वह मत हासिल करने वालों में दूसरे नंबर पर रहे. नवल ठाकुर एक ऐसी शख्सियत रहे हैं, जो गरीब मजदूरों की लड़ाई लड़ने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे.


जब दिन में जलती मशाल लेकर पहुंचे डीसी दफ्तर

नवल ठाकुर के उस आंदोलन को लोग आज भी याद करते हैं जब 1964 में वह दिन-दिहाड़े जलती हुई मशाल लेकर डीसी के दफ्तर पहुंचे. घाटी में मजदूरों को कई महीनों के बाद भी जब तनख्वाह नहीं मिली तो मजदूरों ने नवल ठाकुर को अपनी स्थिति से अवगत करवाया. इसके बाद वह मजदूरों को साथ लेकर ढालपुर पहुंचे और मशाल जलाकर डीसी दफ्तर परिसर आ धमके.


अंधेरा मिटाना है…

तत्कालीन डी.सी. सहित अन्य अधिकारियों ने उनसे दिन में मशाल जलाने की वजह पूछी तो उन्होंने तर्क दिया कि सरकार व प्रशासन को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है. ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सरकार और प्रशासन के लिए दिन में भी अंधेरा छाया हुआ है. उस अंधेरे को हटाने के लिए ही मशाल जलाई गई है, ताकि मजदूरों की हालत को प्रशासन देख सके. उसके बाद मजदूरों को उनका मेहनताना मिला था.


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