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रामपाल ने यूं विज्ञान की मदद से तैयार की फरेब की दुनिया

रामपाल ने यूं विज्ञान की मदद से तैयार की फरेब की दुनिया

बाबा रामपाल

बाबा रामपाल

स्वयंभू बाबा रामपाल विज्ञान के जरिए लोगों को बेवकूफ बनाता था और लोग इसे चमत्कार समझते थे.

बाबा रामपाल ने इंजीनियरिंग और विज्ञान के छोटे-मोटे आविष्कारों को अपने आश्रम में इस तरह इस्तेमाल किया कि लोग इसे चमत्कार समझते थे. अपने सिंहासन में लगी हाइड्रोलिक लिफ्ट के जरिये वो एक जगह से दूसरी जगह निकल आता था. लोग समझ नहीं पाते थे. उन्हें लगता था कि बाबा तो अलौकिक काम करते हैं. वो लोगों के लिए अवतार समझा जाने लगा. भक्तों की भीड़ बढ़ती गई.

रोहतक के करौंथा में जब रामपाल ने आश्रम बनाया तो उसका फरेब का धंधा खूब फलने फूलने लगा. ये आश्रम दरअसल रामपाल का मायालोक था. इसी आश्रम में उसने विज्ञान के अाविष्कारों से फरेब का आभामंडल तैयार किया. इस मायालोक में एक सिंहासन था, जहां से वह अपने भक्तों को दर्शन दिया करता था. इसके चारों तरफ बुलेट प्रूफ शीशा लगा होता था.

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किसी को पता नहीं चलता था कि रामपाल इसके भीतर कैसे पहुंचता है. वो नीचे से कहीं से निकलता था. प्रवचन खत्म होने पर बाहर निकले बिना दूसरी तरफ हाजिर हो जाता था.

हाइड्रॉलिक मशीन पर टिका होता था सिंहासन

इसका राज यहां बना तहखाना था. इसी तहखाने से रामपाल दौड़कर दूसरी तरफ भागता था. इसे एक चमत्कार में बदलने के लिए उसने अपनी सारी इंजीनियरिंग भिड़ा दी थी.

बाबा रामपाल ने भक्तों को बेवकूफ बनाने के लिए विज्ञान का सहारा लिया और लोगों को ये चमत्कार लगता था

ये सिंहासन दरअसल एक हाइड्रोलिक मशीन पर टंगा हुआ होता था. इस सिंहासन में बटन लगे होते थे. बटन दबाते ही बाबा तहखाने से सीधे प्रवचन के डिब्बे में पहुंच जाता था. प्रवचन खत्म तो बटन दबाया सिंहासन नीचे. इसी तरह की कई ऐसी चीजें उसके आश्रम में थीं, जिसे लोग चमत्कार समझते थे लेकिन दरअसल वो इंजीनियरिंग या विज्ञान के हल्के फुल्के आविष्कार थे.

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सतलोक आश्रम में भी ऐसा ही खेल 

लेकिन जब रोहतक के आश्रम में विवाद हुआ तो रामपाल को यहां से भी भागना पड़ा. बरवाला में उसने सतलोक आश्रम की स्थापना कर डाली. यहां भी इसी इंजीनियरिंग के दम पर वह लोगों को बेवकूफ बनाता गया, लेकिन जब पंजाब तथा हरियाणा उच्च न्यायालय ने उसके खिलाफ गैरजमानती वारंट निकाला और वो पुलिस की बड़ी कार्रवाई के बाद गिरफ्तार हुआ तो उसकी इंजीनियरिंग कोई काम नहीं आ सकी.

बाबा को एक नहीं बल्कि कई जगह से भागना पड़ा

कई जगहों से भागना पड़ा

रामपाल ने सबसे पहले अपने गांव धनाना से सत्संग शुरू किया, लेकिन जल्द ही सारा गांव उसके खिलाफ हो गया. वहां से उसे भागना पड़ा. उसने 1997 में जींद की एंप्लाइज कॉलोनी में डेरा जमाया. यहां 500 गज में एक आश्रम बनाया और इसमें एक गुफा बना डाली. यहां भी उसने खूब अंधविश्वास फैलाया, लेकिन यहां से भी उसे भागना पड़ा. 2003 में रामपाल यमुनानगर पहुंचा जहां उसकी दाल नहीं गली.

फिर वो रोहतक गया. जहां भी कुछ समय बाद उसका विरोध हुआ. अंत में उसने बरवाला में सतलोक आश्रम बनाकर यहां पुख्ता तरीके से डेरा जमाया.

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