'इंसानियत के लिहाज़ से सबसे बुरा साल रहा 2017'

अगर कोई आपसे पूछे कि कल पूरे दिन आपने गुस्सा ज़्यादा किया या आप खुश रहे. तो आपका जवाब क्या होगा, वो तो आप ही जानेंगे लेकिन दुनिया के 1.5 लाख लोगों ने क्या कहा, इसे आप नीचे पढ़िए.

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‘ज़रा संभलकर जाना – आजकल माहौल कुछ ठीक नहीं है.’‘रात को मत निकलना – माहौल ज़रा ऐसा ही है’‘बच्चों को अकेला मत छोड़ना – किसी का क्या भरोसा’दुनिया को लेकर इस किस्म का अविश्वास शायद आज से पहले कभी नहीं रहा. दिन की शुरुआत अख़बार पढ़ने से होती है जहां अच्छी ख़बरों का सूखा पड़ा दिखता है. कई अख़बारों को गुड न्यूज़ या पॉज़िटिव न्यूज़ का अलग से कॉलम शुरू करना पड़ा है. दुनिया को देखकर लगता है कि हम कहां जा रहे हैं, सब कुछ खत्म होता जा रहा है. एक नए सर्वे के मुताबिक 2017 इंसानियत के लिहाज़ से पिछले एक दशक में सबसे ख़राब साल रहा है. इस सर्वे में दुनिया भर के 1.5 लाख से ज्यादा लोगों की भावनात्मक ज़िंदगी को करीब से देखा गया था.न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक गैलप सर्वे की संपादक जूली रे ने कहा है – यह पहली बार है जब हमने नकारात्मक भावनाओं में बड़े स्तर पर इज़ाफा देखा है. दुनियाभर में लोगों के नकारात्मक अनुभव के पीछे चिंता, तनाव, दुख, शारीरिक पीड़ा और गुस्सा है. 145 देशों में व्यस्कों से की गई बातचीत में एक दिन पहले की उनके भावनाओं के बारे में पूछा गया. सामने आया कि इनमें से एक तिहाई ने सर्वे के एक दिन पहले ही अलग-अलग वजहों से बेहद तनाव और चिंता का सामना किया था. इसके अलावा एक तिहाई ने शारीरिक दर्द और पांचवे हिस्से ने एक दिन पहले ही गुस्सा और उदासी से डील किया था.
करीब 70 प्रतिशत लोगों ने यह भी माना कि वो एक दिन पहले मुस्कुराए
इस तरह के नकारात्मक अनुभव सबसे ज़्यादा सेंट्रल अफ्रीकी रिपब्लिक में देख गए जो सालों से अंदरूनी कलह का गवाह बना हुआ है. इस देश ने पिछले चार साल से पहले स्थान पर बैठे इराक़ को पीछे किया, बल्कि उसका नकारात्मक अनुभवों का स्कोर अभी तक का सबसे ऊंचा स्कोर था. हालांकि सर्वे में सब कुछ बुरा ही नहीं है. 70 प्रतिशत लोगों ने एक दिन पहले खुशी का अनुभव भी किया, वो मुस्कुराए, उन्होंने आराम किया और उन्हें इज़्जत भी मिली. वहीं 17% बांग्लादेशियों ने सर्वे से एक दिन पहले कुछ अच्छा और नया सीखा.वहीं इसके उलट कुछ और रिसर्च बता रहे हैं कि दुनिया भर में हिंसा और गरीबी में कमी आई है. एक तरफ जहां व्हॉट्सएप पर फैले फेक मैसेज से लोगों की जान जा रही हैं. वहां इस तरह की रिपोर्ट काफी विरोधाभासी है. तो सच क्या है. दुनिया ख़राब होती जा रही है या फिर हमारा नज़रिया बदल रहा है. ‘साइंस’ जर्नल में आई एक स्टडी, इसी पहलू की बात करती है. इस स्टडी में नीले रंग का सहारा लिया गया है.
साइंस जर्नल में ब्लू डॉट का सहारा लेकर बात समझाई गई है
तो एक प्रयोग के तहत प्रतिभागियों को बैंगनी से लेकर गहरे नीले रंग के अनगिनत बिंदू यानी डॉट दिखाए गए. उनसे पूछा गया कि कौन सा रंग नीला है और कौन सा नहीं. प्रतिभागी उन बिंदुओं पर उंगली रखते जो ज्यादा से ज्यादा गहरा नीला होता. लेकिन फिर रिसर्चर्स ने एक खेल किया. उन्होंने नीले बिंदुओं की तादाद कम करनी शुरू कर दी. जैसे-जैसे नीले रंग की तादाद कम होती गई, वैसे-वैसे प्रतिभागियों ने नीले रंग को लेकर अपने दायरे को बढ़ाना शुरू कर दिया. अभी तक जहां वो सिर्फ गहरे नीले बिंदु को ही नीला मान रहे थे, अब वो बैंगनी डॉट को भी धीरे से नीला मानने लगे. नीले रंग को लेकर उनकी सोच का दायरा बढ़ गया. इसे अंग्रेज़ी में ‘कॉन्सेप्ट क्रीप’ कहते हैं.कॉन्सेप्ट क्रीप जिसने हिंसा, दर्द, नुकसान जैसे शब्दों के दायरे को बढ़ा दिया गया है. इन शब्दों में वो बातें सिमट गई हैं, जिसके बारे में हमने पहले सोचा भी नहीं था. इसका उदाहरण आप हिन्दी फिल्मों के गानों से ले सकते हैं. ‘ओ लाल दुपट्टे वाली तेरा नाम तो बता’ - समीर ने यह गाना लिखते वक्त नहीं सोचा था कि 20 साल बाद इस गाने को महिलाओं के खिलाफ एक बुरी नीयत के तौर पर देखा जाएगा. या फिर किसी के रंग और पहनावे को लेकर चुटकुले के तौर पर देखा जाएगा. यह एक वक्त तक किसी को नहीं पता था कि ये रंगभेद श्रेणी में आते हैं (शायद अभी भी कईयों को नहीं पता). आज सार्वजनिक मंच पर कोई ऐसा चुटकुला सुना दे तो बवाल हो जाता है. यानी वो सब बातें जो हमारी पिछली पीढ़ी के लिए गौर करने लायक ही नहीं थी, आज वो गंभीर मुद्दे बन चुके हैं. हालांकि इसका मतलब यह कतई नहीं है कि समस्याएं हैं ही नहीं. या दुनिया बहुत अच्छी चल रही है. इंसानियत अपना परचम लहरा रही है. बहुत जरूरी है कि हम समझें कि समस्या क्या है और क्या नहीं.

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