OPINION: दांव पर नेहरू-गांधी परिवार का अस्तित्व, मोदी को रोकने के लिए राहुल को अपनाने होंगे नए तरीके

राहुल गांधी हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैंठ सकते, क्योंकि इस चुनाव में न सिर्फ कांग्रेस का भविष्य, बल्कि नेहरू गांधी परिवार का अस्तित्व भी दांव पर लगा है.

news18 hindi , News18.com
(आशुतोष)
अगले साल लोकसभा चुनाव होने वाले हैं. हर किसी की ज़ुबान पर एक ही बात है कि क्या मोदी सरकार दोबारा सत्ता में वापस आएगी या नहीं. 2014 के लोकसभा चुनावों की बात और थी. तब लगभग स्पष्ट था कि मोदी को बढ़त मिलेगी और कांग्रेस को नुकसान होगा. लेकिन इस बार परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं. हालांकि बीजेपी को नुकसान होने से कांग्रेस को फायदा होगा ऐसी भी बात नहीं है. आगामी लोकसभा चुनाव दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण है.राहुल गांधी हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकते, क्योंकि न सिर्फ इस चुनाव में कांग्रेस का भविष्य बल्कि नेहरू गांधी परिवार का अस्तित्व भी दांव पर लगा है. माना जाता रहा है कि गांधी परिवार हमेशा से विभिन्न धड़ों को एकसाथ लेकर चलने का काम करता रहा है. कांग्रेस का हारना आरएसएस के लिए फायदेमंद होगा, क्योंकि कमज़ोर कांग्रेस ही अततः उसका लक्ष्य है.ये भी पढ़ेंः ...तो इस तरह राहुल गांधी पर 'दबाव' बना रही हैं बसपा सुप्रीमो मायावती!यह संयोग मात्र नहीं है कि प्रधानमंत्री बनने के पहले से ही मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आलोचना करते रहे हैं. घटना 29 अक्टूबर 2013 की है. नरेंद्र मोदी उस वक्त प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे. सरदार वल्लभ भाई पटेल स्मृति स्मारक के उद्घाटन का मौका था, जब उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उपस्थिति में नेहरू की आलोचना की थी. उन्होंने कहा था कि अगर नेहरू की जगह पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री बने होते तो आज का भारत कुछ और ही होता. हर भारतीय को इतिहास की इस घटना से दुख है. हालांकि मनमोहन सिंह ने इस बात का सिर्फ इतना कहकर उत्तर दिया कि सरदार पटेल सेक्युलर थे और भारत की अखंडता में उनको विश्वास था. ऐसा कह कर उन्होंने मोदी और आरएसएस की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा दिया.तब से करीब साढ़े चार साल बीत चुके हैं और आज भी ये दौर जारी है. इसी साल 7 फरवरी को संसद में राष्ट्रपति को धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए पीएम मोदी ने जवाहरलाल नेहरू पर भारत के बंटवारे का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि अगर पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री बने होते तो कश्मीर की समस्या नहीं होती.लेकिन पटेल और नेहरू का मुद्दा उठना नया नहीं है. इसके गहरे कारण हैं. पटले कांग्रेस के सदस्य थे. वह गांधी और कांग्रेस के प्रति हमेशा वफादार रहे. गांधी ने अपने उत्तराधिकारी और प्रधानमंत्री के रूप में गांधी की पहली पसंद नेहरू थे. हालांकि पार्टी पटेल के पक्ष में थी. फिर भी न ही पटेल ने इस पर सवाल उठाया और न ही कभी विरोध किया.गांधी की मृत्यु के बाद पटेल ने सार्वजनिक रूप से कहा कि नेहरू उनके नेता हैं. यह और बात है कि दोनों नेताओं के बीच चीन और कश्मीर सहित कई मुद्दों को लेकर वैचारिक मतभेद थे लेकिन पटेल की जो बात आरएसएस को सबसे ज़्यादा पसंद आती थी वह था मुसलमानों के प्रति उनकी सोच. पटेल का मानना था कि बंटवारे के बाद मुसलमानों पर ज़िम्मेदारी है कि वो अपनी देशभक्ति को सिद्ध करें लेकिन नेहरू इससे उलट मानते थे कि बहुसंख्यकों की ज़िम्मेदारी है कि वो अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करें. आरएसएस को पटेल के विचार ज़्यादा अच्छे लगे और उन्होंने नेहरू पर मुसलमानों के तुष्टीकरण का आरोप लगाया.आरएसएस का जिस भारत का सपना था उसमें मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं था. इसका उद्देश्य हिंदू राष्ट्र बनाना था. लेकिन बंटवारे के बाद भी आरएसएस को इसमें सफलता नहीं मिली, क्योंकि उसे नेहरू के सेक्युलरिज़म के विचारों से लड़ना पड़ा.ये भी पढ़ेंः सरकार को बैकफुट पर धकेलना या शक्ति प्रदर्शन, भारत बंद के पीछे राहुल का क्या था मकसद?इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के समय में कांग्रेस काफी मज़बूत थी. लेकिन 1990 के बाद बीजेपी के मज़बूत होने के साथ ही कांग्रेस के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं. 2014 के बाद से कांग्रेस के लिए स्थितियां और भी बदल गई हैं, क्योंकि अब राहुल के सामने मुकाबले के लिए मोदी जैसा मज़बूत चेहरा है.वर्तमान में राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस काफी कमज़ोर हो चुकी है. 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद खराब होती कांग्रेस की स्थिति फिर से बेहतर हो गई थी क्योंकि पार्टी चुनाव जीत गई थी. इस जीत से गांधी-नेहरू परिवार के नेतृत्व में लोगों का विश्वास बढ़ गया था. अब राहुल के कंधे पर बड़ी ज़िम्मेदारी आ गई है. अगर 2019 के लोकसभा में कांग्रेस चुनाव हार जाती है तो लगातार दो बार चुनाव हारने से परिवार के अस्तित्व पर बड़ा सवालिया निशान लग जाएगा.नेहरू गांधी परिवार में लगातार 71 सालों तक दूसरे नेताओं का विश्वास बना रह सका क्योंकि उस दौरान पार्टी लगातार चुनाव जीत सकी. लोगों का विश्वास पार्टी को इस कदर हासिल था कि पार्टी के नेता आसानी से चुनाव जीत जाते थे.ऐसा नहीं है कि चुनौतियां राहुल के सामने आई हैं. इससे पहले भी कांग्रेस के सामने मुश्किल घड़ी आई है. 1977 में कांग्रेस हार गई और पार्टी के अंदर भी विरोध के स्वर उभरने लगे. इस हालात से निपटने के लिए इंदिरा गांधी ने दूसरा तरीका अपनाया. उन्होंने जनता पार्टी के कुछ लोगों को तोड़ लिया और मोरारजी को पद से हटाकर दुबारा बहुमत से जीतकर वापस आ गईं.इसी तरह से राजीव गांधी के सामने भी पार्टी के अंदर कुछ लोगों ने विरोध की आवाज़ बुलंद की. पर बीपी सिंह सरकार में भी कई कमियां थी, जिसका राजीव गांधी ने फायदा उठाया. 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या हुई उस वक्त वह जीत की ओर बढ़ रहे थे. सोनिया गांधी के सामने भी इसी तरह की परेशानियों का मुकाबला किया. शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने उनका विरोध किया और पार्टी को तोड़ दिया. लेकिन पहले 2004 और फिर 2009 में सरकार बनाकर उन्होंने कांग्रेस गांधी परिवार के अस्तित्व को बचा लिया. हालांकि राहुल गांधी के सामने चुनौतियां इससे थोड़ा अलग हैं क्योंकि राहुल गांधी का मुकाबला जिनसे है उनके पास वैचारिक आधार है, पैसा है और सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने की कला है.आगामी लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के नेतृत्व की परीक्षा है. इसलिए राहुल को अगर कांग्रेस को बचाना है तो उन्हें अपना तरीका बदलना पड़ेगा. उन्हें लोगों को सपने बेचने पड़ेंगे, पार्टी कार्यकर्ताओं को प्रेरित करना होगा. अगर उन्हें लगता है कि उनकी उम्र अभी कम है इसलिए वो और भी पांच साल इंतज़ार कर सकते हैं तो ये उनकी भूल साबित होगी.(लेखक जाने-माने पत्रकार हैं और पहले आम आदमी पार्टी से जुड़े थे.)

Trending Now