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संकट में भारतीय गिद्ध: सरकार ने संसद को बताया - तीन दशक में 99.95 फीसदी हो गए खत्म

वन व पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने संसद में दी जानकारी, 2017 तक भारत में 19,000 गिद्ध रह गए हैं. 80 के दशक तक देश में तीन प्रजातियों के 4 करोड़ गिद्ध थे.

संकट में भारतीय गिद्ध: सरकार ने संसद को बताया - तीन दशक में 99.95 फीसदी हो गए खत्म
बॉम्बे नेचुरल सोसाइटी (BNS) ने सफेद पूंछ वाले गिद्ध, लंबी गर्दन वाले गिद्ध और सिलेंडर गर्दन वाले गिद्ध को लेकर सर्वेक्षण किया था.

Uday Singh Rana

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भारत में गिद्धों की तीनों प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं. गिद्धों की संख्या तीन दशक में घटकर इतनी कम रह गई है कि मामला संसद तक पहुंच गया है. वन व पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने शुक्रवार को लोकसभा में चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए. आंकड़ों के मुताबिक, 80 के दशक से अब तक देश में गिद्धों की संख्या में 99.95 फीसदी कमी आई है.

बीजेपी और शिवसेना सांसद ने उठाया मामला 

साल 1980 तक देश में तीन प्रजातियों वाले चार करोड़ गिद्ध थे. इनमें सफेद पूंछ वाले, लंबी गर्दन वाले और बेलनाकार गर्दन वाले गिद्ध शामिल थे. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2017 तक देश में महज 19,000 गिद्ध बचे हैं. जमशेदपुर से बीजेपी सांसद बिद्युत बरन महतो और उत्तर-पश्चिम मुंबई से शिवसेना सांसद गजानन कृतकर ने पूछा था कि क्या सरकार ने गिद्धों की प्रजातियों पर कोई सर्वेक्षण कराया है. अगर कराया है तो उसकी पूरी जानकारी उपलब्ध कराई जाए.

बॉम्बे नेचुरल सोसाइटी ने किया था सर्वेक्षण

जावड़ेकर ने लोकसभा को बताया कि बॉम्बे नेचुरल सोसाइटी (BNS) ने सफेद पूंछ वाले गिद्ध, लंबी गर्दन वाले गिद्ध और बेलनाकार गर्दन वाले गिद्ध को लेकर सर्वेक्षण किया था. इस सर्वे को पर्यावरण, वन व पर्यावरण परिवर्तन मंत्रालय ने प्रायोजित किया था. जावड़ेकर ने निचले सदन में दिए लिखित जवाब में बताया कि 80 के दशक की शुरुआत तक देश में इन तीन प्रजातियों के 4 करोड़ गिद्ध मौजूद थे.

साल 2015 में पाया गया कि सफेद पूंछ वाले गिद्धों की संख्या घटनी थम गई है, लेकिन लंबी गर्दन वाले गिद्ध लगातार घट रहे हैं.

सबसे पहले 90 के दशक में दिया गया ध्यान

साल 2015 में किए गए और 2017 में प्रकाशित सर्वे के मुताबिक, देश में 6,000 सफेद पूंछ वाले, 12,000 लंबी गर्दन वाले और 1,000 बेलनाकार गर्दन वाले गिद्ध बचे थे. जावड़ेकर ने सदन में कहा कि गिद्धों की संख्या में बहुत तेजी से कमी आई है. इस तरफ सबसे पहले 90 के दशक के मध्य में ध्यान दिया गया. साल 2007 तक इनकी संख्या में 99 फीसदी कमी आ चुकी थी. साल 2015 में पाया गया कि सफेद पूंछ वाले गिद्धों की संख्या घटनी थम गई है, लेकिन लंबी गर्दन वाले गिद्ध लगातार घट रहे हैं.

पशुओं की दवाएं बनी गिद्धों की मौत का कारण

सरकार ने पाया कि पशुओं को जोड़ों के दर्द से निजात दिलाने वाली दवा डाइक्लोफिनॅक (diclofenac) गिद्धों की संख्या घटने के लिए जिम्मेदार है. दरअसल, जब इस दवाई को खाने वाला पशु मर जाता है या उसको मरने से थोड़े समय पहले यह दवा दी गई होती है और उसको भारतीय गिद्ध खाता है तो उसके गुर्दे काम करना बंद कर देते हैं. इससे गिद्ध की मौत हो जाती है. अब नई दवाई मॅलॉक्सिकॅम meloxicam आ गई है. यह गिद्धों के लिये हानिकारक नहीं है.

गिद्धों को बचाने के लिए बनाए 8 संरक्षण केंद्र

गिद्धों को बचाने के लिए देश के अलग-अलग राज्यों में 8 वल्चर कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर्स बनाए गए हैं. जावड़ेकर ने बताया कि हरियाणा में पिंजौर (2004 में), पश्चिम बंगाल में राजभटख्वा (2006 में), असम में रानी (2009 में) और भोपाल के नजदीक केरवा (2008 में) सेंटर बनाए गए हैं. संबंधित राज्य वन विभाग बीएनएस और वन व पर्यावरण मंत्रालय की मदद से इन केंद्रों का प्रबंधन करते हैं. इनके अलावा गुजरात के जूनागढ़, ओडिशा के नंदनकानन, तेलंगाना के हैदराबाद और रांची के मुता में एक-एक केंद्र बनाया गया है.

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