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World Largest Political Party: भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी कैसे बनी?

World Largest Political Party: भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी कैसे बनी?

भाजपा आज दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है. सदस्यता के मामले में यह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से भी बड़ी है.

भाजपा आज दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है. सदस्यता के मामले में यह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से भी बड़ी है.

World Largest Political Party: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आज दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है. आमतौर पर माना जाता है कि भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बनाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का अहम योगदान रहा है. लेकिन सच यह है कि भाजपा और आरएसएस दोनों काफी अलग हैं. इसी विषय पर पढ़ते हैं नलिन मेहता की किताब ‘द न्यू बीजेपी ; मोदी एंड द मेकिंग ऑफ वर्ल्ड लार्जेस्ट पॉलिटिकल पार्टी’ के कुछ संपादित अंश...

नलिन मेहता
भारतीय जनता पार्टी (BJP) तेजी से अपने संगठन का विस्तार करते हुए दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक दल बन गई. लेकिन इस तरफ किसी का ध्यान अधिक गया नहीं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को इसकी बड़ी वजह माना गया. क्योंकि अक्सर ही आरएसएस (RSS) चुनावों (Elections) के दौरान भाजपा (BJP) की मदद करता रहा है. इसीलिए ज्यादातर बुद्धिजीवी और पत्रकारों ने मान लिया कि भाजपा (BJP) संगठन का अगर विस्तार हुआ, तो उसके पीछे भी आरएसएस (RSS) की भूमिका होगी. जबकि सच ये है कि भाजपा (BJP) और आरएसएस दोनों काफी अलग हैं. इन दोनों संगठनों के बीच रिश्ता है, लेकिन प्रतीकात्मक. आरएसएस का कैडर भाजपा से सहानुभूति रखता है तो इसका भी कारण है. एक बार आरएसएस के संयुक्त संगठन महामंत्री मदन दास देवी ने ‘आउटलुक’ के लिए राजेश जोशी को दिए साक्षात्कार में ऐसे ही सवाल पर प्रतिप्रश्न किया था, ‘और कौन सी पार्टी है, जिसका हम समर्थन कर सकते हैं? क्या सोनिया गांधी?’

इसका मतलब ये हुआ कि भाजपा को आरएसएस (RSS Cadre) स्वयंसेवकों के कामों से राजनीतिक मदद तो मिली है. लेकिन भाजपा वास्तव में आरएसएस से नहीं है. सच्चाई यह है कि भाजपा ने स्थापना के पहले दिन से ही अपना समर्थक वर्ग तैयार करने के लिए मेहनत की है. इस पर ध्यान दिया है. हालांकि 2000 के दशक के शुरुआती सालों तक यह गली-गली, मोहल्लों-मोहल्लों तक विस्तारित पार्टी नहीं थी. इसीलिए, दशकों तक उसे चुनावों (Elections) के दौरान मतदाताओं को घरों से बाहर निकालने के लिए संघ के स्वयंसेवकों पर निर्भर रहना पड़ा. इस स्थिति के अपने नुकसान भी रहे.

भाजपा कैडर आधारित पार्टी 
इसी बात को भाजपा के राज्यसभा सदस्य स्वप्न दासगुप्ता ने 2009 में कुछ इन शब्दों में कहा था, ‘भारत के राजनीतिक गलियारों में यह गलतफहमी है कि भाजपा कैडर आधारित पार्टी है. ठीक वैसी ही, जैसी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) है.’ और यह गलतफहमी भी बड़ी मेहनत से फैलाई गई है. पहले तो मीडिया ने. और फिर अपनी प्राथमिक जानकारियों के लिए मीडिया पर ही आश्रित रहने वाले चुनिंदा बुद्धिजीवियों ने, जो भाजपा-आरएसएस पर नजर रखते हैं. इन मिले-जुले प्रयासों का नतीजा इस मान्यता के रूप में सामने आया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) वास्तव में भाजपा की समर्पित स्वयंसेवी सेना है.


इसके नतीजे में भाजपा से यह उम्मीदें की जाने लगीं कि उसमें आरएसएस की तरह अनुशासन की झलक दिखेगी. लेकिन जब यह झलक नहीं दिखी, तो पार्टी को बेहद कठोर पैमानों पर आंका जाने लगा. विशेष तौर पर कांग्रेस की तुलना में जो अब पूरी तरह से एक परिवार पर आश्रित पार्टी हो चुकी है. दासगुप्ता ने असल में जो बताना चाहा वह ये कि भाजपा के कार्यकर्ता आरएसएस की विचारधारा के समर्थक तो हैं, उसके स्वयंसेवकों जैसे नहीं है. आरएसएस से नियंत्रित नहीं हैं. इसीलिए पार्टी का सांगठनिक ढांचा आरएसएस के संगठन जितना सक्षम भी नहीं है. यही नहीं, चुनावों के लिहाज कई जगहों पर भाजपा की रणनीति भी काफी कुछ वैसी ही होती है, जैसी अन्य दलों की रहती है. यानी स्थानीय व्यावहारिकता के अनुरूप न कि वैचारिकता के.

हालांकि नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भाजपा ने न सिर्फ लगातार दो बार अपने दम पर केंद्र में बहुमत हासिल किया, बल्कि अपने संगठन का भी जबर्दस्त विस्तार किया है. यह विस्तार तो ऐसा है, जिसकी संघ और यहां तक भाजपा में भी किसी ने कल्पना नहीं की थी.

भाजपा चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से भी बड़ी कैसे हो गई

साल 2014 से 2020 के बीच भाजपा ने जमीनी स्तर पर अपने संगठन का जबर्दस्त विस्तार किया है. इतना कि यह सदस्य संख्या के मामले में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से भी आगे निकल गई है. यह विस्तार वास्तव में यूं ही नहीं हुआ. इसके लिए आरएसएस में आजमाई जा चुकीं तमाम तकनीकों का इस्तेमाल किया गया. यहां ये ध्यान रखना जरूरी है कि चीन में सिर्फ एक ही पार्टी है, ‘कम्युनिस्ट पार्टी’. वहां अपने किसी भी किस्म के पेशे में आगे बढ़ने के लिए पहली शर्त होती है सीसीपी की सदस्यता. लेकिन भारत में ऐसा नहीं है. यहां बहु-दलीय लोकतंत्र है. इसीलिए अपने लोकतांत्रिक ढांचे में रहते भाजपा की यह उपलब्धि कहीं अधिक मायने रखती है.

भाजपाई अक्सर बढ़-चढ़कर बताते हैं कि भाजपा अब दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी हो चुकी है. वहीं आलोचक भाजपा की सदस्य संख्या पर भरोसा नहीं करते या फिर उसके विस्तार को कोई उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं मानते. उनका मानना है कि यह विस्तारित सदस्य संख्या असल में, सिर्फ वोट जुटाने का मशीनी अभियान है, जो चुनावों के समय ही नजर आता है. इसके बावजूद यह मानना होगा कि भाजपा ने जिस तरह से अपना सांगठनिक कलेवर बदला है, उसने उसे सत्ता तक पहुंचाने और उस पर कायम रखने में अहम भूमिका निभाई है. भाजपा ने न सिर्फ जिला और उससे नीचे के स्तरों पर अपने संगठन का विस्तार किया है, बल्कि पार्टी संगठन और आरएसएस के बीच का पलड़ा भी अपनी तरफ झुका लिया है.

आरएसएस से भी बड़ा हो गया भाजपा संगठन

साल 2020 तक तो स्थिति यह हो चुकी है कि भाजपा संगठन आरएसएस से भी बड़ा हो चुका है. हालांकि भाजपा अब भी वैचारिक कारणों से आरएसएस से संबद्ध है. लेकिन सांगठनिक रूप से स्थिति यह है कि अब उसे चुनावों के दौरान मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक लाने के लिए आरएसएस पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. उल्टा अब तो कई मायनों में आरएसएस ही भाजपा पर निर्भर दिखने लगा है.

इस लिहाज से इन तथ्यों पर गौर किया जा सकता है. जब अगस्त 2014 में अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, तब भाजपा की सदस्य संख्या 3.5 करोड़ थी, ऐसा दावा किया जाता है. उस समय तक सीसीपी दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी थी. उसकी सदस्य संख्या तब 8.78 करोड़ के आसपास थी. उस समय तक आरएसएस की दैनिक शाखाओं से जुड़े नियमित और सक्रिय स्वयंसेवक 44.9 लाख के करीब थे. इनमें हर 7वां स्वयंसेवक भाजपा का सदस्य था. यहां यह भी बताना जरूरी है कि आरएसएस आधिकारिक रूप से अपनी प्राथमिक सदस्य संख्या का खुलासा नहीं करता. वह हर साल ये बताता है कि दैनिक, साप्ताहिक और मासिक शाखाओं तथा प्रशिक्षण शिविरों में कितने स्वयंसेवक आए.

इन्हीं रिपोर्ट के आधार पर यहां आरएसएस की सदस्य संख्या का अनुमान लगाया गया है. इसके लिए सबसे पहले मासिक और साप्ताहिक शाखाओं की सदस्य संख्या को छोड़ ही दिया गया. यह मानते हुए कि जो लोग दैनिक शाखाओं में जा रहे हैं, वे साप्ताहिक और मासिक शाखाओं में भी जाते ही होंगे. इसके बाद आरएसएस की सालाना रपटों से दैनिक शाखाओं के स्वयंसेवकों की संख्या का औसत देखा कि ये कितने रहे, 15, 50 या 100. इस तरह की गणना से जो आरएसएस के सदस्यों का न्यूनतम और अधिकतम अनुमानित आंकड़ा देखा गया. यहां अधिकतम आंकड़ा लिया गया है. सिर्फ आरएसएस ही नहीं, भाजपा और सीसीपी की अनुमानित सदस्य संख्या का भी अधिकतम आंकड़ा लिया गया है. इस तरह 2014 में भाजपा जहां 3.5 करोड़ सदस्य संख्या पर थी तो आरएसएस के लिए यह आंकड़ा 44.9 लाख पर टिका हुआ था.

एक साल में सीसीपी से आगे निकल गई भाजपा

भाजपा महज एक साल में ही सीसीपी की सदस्य संख्या से आगे निकल गई. उसने 2015 में अपनी जो सदस्य संख्या बताई वह 11 करोड़ के करीब थी. जबकि उसी समय सीसीपी के प्राथमिक सदस्यों की संख्या 8.87 करोड़ थी. और आरएसएस के मुकाबले तो पार्टी अपना आकार 20 गुना बढ़ा चुकी थी. जबकि अभी 2019 में भाजपा का दावा है कि उसके प्राथमिक सदस्यों की संख्या 17.4 करोड़ हो चुकी है. यह आरएसएस की तुलना में 29 गुना ज्यादा है. जबकि सीसीपी के मुकाबले दोगुनी. (पहला ग्राफ देखिए)

भाजपा ने 2014 से 2019 के बीच अपने सदस्यों की संख्या में पांच गुना से भी अधिक की बढ़ोत्तरी की है. यानी वह दौर जब नरेंद्र मोदी पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री रहे और अमित शाह पार्टी अध्यक्ष.

केंद्र की सत्ता पर 2014 से काबिज

इसका परिणाम भी मिला. भाजपा न सिर्फ केंद्र की सत्ता में 2014 से लगातार बनी हुई है, बल्कि 2019 के अंत तक वह देश के 28 में 17 राज्यों में सत्ता का स्वाद चख चुकी थी. वैसे, देखा जाए तो किसी भी सत्ताधारी पार्टी की सदस्य संख्या बढ़ना बहुत असामान्य नहीं है. लेकिन भाजपा ने जिस तरह विस्तार किया, वह एकदम सामान्य भी नहीं है. इसी का परिणाम हुआ कि भाजपा ने 2014 से 2019 तक महाराष्ट्र में अच्छे से सरकार चलाई, मुख्य दल के रूप में. जबकि नागपुर में आरएसएस का मुख्यालय होने के बावजूद पार्टी इस राज्य में इससे पहले सिर्फ एक बार सत्ता में आ सकी थी, 1995-1999 के बीच. वह भी शिवसेना के सहयोगी दल के रूप में.

यहां अगर यह मान भी लिया जाए कि 2019 तक भाजपा की जितनी सदस्य संख्या थी, उसमें एक-तिहाई सत्ताधारी दलों के साथ रहने वाले लोग थे. भाजपा के सत्ता से हटते ही इस किस्म के सदस्यों के भी पार्टी छोड़ने का डर है. तब भी, आरएसएस की तुलना में भाजपा 9 गुना बड़ी ठहरती है. जबकि सीसीपी के मुकाबले 20% अधिक विस्तारित.

जबर्दस्त सदस्यता अभियान

आजाद भारत के इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता, जब किसी सत्ताधारी पार्टी ने इतना जबर्दस्त सदस्यता अभियान चलाया हो. ब्रिटिश भारत में जरूर ऐसा उदाहरण है, जब कांग्रेस पार्टी का गठन हुआ था. उस वक्त कांग्रेस की शाखाएं जिले-जिले में खोली गईं थीं. बड़ी संख्या में लोगों को कांग्रेस की सदस्यता दिलाई गई थी. ठीक उसी तरह आजाद भारत में भाजपा ने अपना सदस्यता अभियान चलाया. अपने अपने संगठन का पुनर्गठन किया. नतीजतन आज वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने है.

भाजपा ने इस विस्तार के लिए दो-तीन स्तरों पर काम किया. पहले तो उसने बाह्य संगठन को चुस्त और मुस्तैद किया. फिर दूसरा- तकनीक का भरपूर इस्तेमाल किया. तकनीक के इस्तेमाल से बड़े पैमाने पर सदस्यता अभियान और सदस्यों का पुष्टिकरण संभव हो सका, जो पहले भौतिक रूप से नहीं हो पाता था. तीसरा- पार्टी ने निचले स्तर पर संगठन के पुनर्गठन पर ध्यान दिया. जिला तो जिला मतदान केंद्र स्तर तक भी. तीन मूलभूत सिद्धांत तय किए. एक तो कामों और अधिकारों का विकेंद्रीकरण किया जाए तथा स्थानीय कार्यकर्ताओं का शक्तियां दी जाएं. दूसरा- एससी, एसटी, ओबीसी जैसे समुदायों को संगठन के हर स्तर पर अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए, जो अब तक इससे वंचित थे.

तीसरा- हर स्तर प्रबंधन और निगरानी का तंत्र स्थापित किया जाए. प्रबंधन क्षमता और उत्तरदायित्व बढ़ाने बढ़ाने के लिए भी बड़े पैमाने पर डिजिटल टूल इस्तेमाल किए गए. जैसे- अंदरूनी बैठकों के लिए जूम ऐप, बातचीत के लिए वॉट़्सऐप ग्रुप, हर नए-पुराने सदस्य के टेलीफोन नंबरों की लिस्टिंग आदि. सिर्फ इतना ही नहीं, तकनीकी प्रबंधन में भी भाजपा ने व्यवस्थित ढंग से बदलाव किया. क्योंकि ऐसा नहीं होता तो बिना सोचे-समझे डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल कोई बेहतर परिणाम नहीं दे पाता. लेकिन जैसे ही तकनीकी प्रबंधन बेहतर हुआ, नतीजे भी बेहतर आने लगे. हर पीढ़ी के नेता, कार्यकर्ता के लिए तकनीक का इस्तेमाल सहज हो गया. जिससे सबने मिलकर वह कारनामा कर दिखाया, जिसके बारे में दुनियाभर के राजनीतिक दल सपना ही देखते रहते हैं.

भाजपा को, स्वाभाविक तौर पर सबसे ज्यादा समर्थन हिंदी-पट्‌टी के राज्यों में मिला (दूसरा ग्राफ देखिए).

522 जिलों में जमीन खरीदकर नए दफ्तरों का निर्माण कराया

भाजपा ने इसके साथ-साथ एक और बड़ा काम किया, पार्टी दफ्तर बनवाने का. भारत के करीब 522 जिलों में भाजपा ने जमीन खरीदकर अपने 500 से ज्यादा नए दफ्तरों का निर्माण कराया. और ये दफ्तर भी बस, यूं ही पार्टी की मौजूदगी दर्ज कराने के लिए बनवा नहीं दिए गए. बल्कि इन्हें भी सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध डिजिटल तकनीक से लैस किया गया. इससे पार्टी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार हुआ और प्रधानमंत्री मोदी ने नेतृत्व में नई तथा आधुनिक भाजपा का उदय हुआ.

भाजपा के इस कलेवर-परिवर्तन के राजनीतिक परिणाम भी सामने आए. पार्टी ने 2019 में जिस तरह केंद्र की सत्ता में जबर्दस्त वापसी की उससे स्पष्ट था कि ‘नई भाजपा-नए तेवर’ के साथ उभरी है. ऐसी जिसने सिर्फ चुनावी कारकों पर ध्यान नहीं दिया है, बल्कि अपने आप को भी आमूलचूल रूप से बदला है. यह मई 2019 की बात है. लोकसभा चुनाव का परिणाम आने में करीब एक सप्ताह का समय था. तब उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मीडिया बातचीत की थी. इसमें शाह ने दावा किया था, ‘पार्टी कम से कम 300 सीटें जीतेगी.’ और उनका यह दावा पूरी तरह सही साबित हुआ.

तस्वीर 6 फरवरी 2019 की है. उत्तर प्रदेश के सभी 51 जिलों में पार्टी दफ्तरों के शिलान्यास की श्रृंखला में आयोजित एक कार्यक्रम में राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ. साथ में पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह.

50% से अधिक सीटों पर तगड़ी टक्कर

शाह ने तब और भी कुछ कहा था. उनके मुताबिक, ‘गौर कीजिए, 2014 से लगातार हम 50% से अधिक सीटों पर तगड़ी टक्कर देते आ रहे हैं. नरेंद्र मोदी सरकार (पहले कार्यकाल में) ने जिस तरह का काम किया है, उसके मैं दो आंकड़े देता हूं. केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ देश के करीब 22 करोड़ लोगों को मिल रहा है. और पिछले चुनाव (2014) में हमें कुल 17 करोड़ वोट मिले थे. दूसरी बात, पिछले चुनाव (2014) में हमारी पार्टी के 2.5 करोड़ कार्यकर्ता थे. इस चुनाव (2019) हमारे पास 11 करोड़ कार्यकर्ता हैं. हम यह चुनाव 50% अभियान की शक्ल में लड़ रहे हैं. और आपको यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हिमाचल प्रदेश, गुजरात, त्रिपुरा जैसे कुछ राज्यों में तो हम 50% की सीमा भी पार कर चुके हैं.’

पार्टी कार्यकर्ताओं के लिहाज से यह तरक्की 4 गुना से भी अधिक थी. जिस प्रभावी तरीके से भाजपा ने अपना सदस्यता अभियान चलाया, उससे स्पष्ट समझ आता है कि पार्टी, सरकार का रिकॉर्ड और उसके कल्याणकारी कार्यक्रमों, सभी ने उसे मजबूती देने में अपनी भूमिका निभाई है.

अंत में एक बात और ध्यान देने लायक है. भाजपा ने दो बार बड़े साल-साल भर तक सदस्यता अभियान चलाए. इनमें एक 2014 में 1 नवंबर को शुरू किया गया. दूसरा 2019 की 6 जुलाई को. यानी दोनों ही लोकसभा चुनावों में मिली जीत के कुछ समय बाद ही. इससे स्पष्ट है कि पार्टी का मकसद अपने लिए सिर्फ वोट-छापने वाला तंत्र विकसित करने का नहीं है, बल्कि उससे आगे भी है.

(यह लेख नलिन मेहता की किताब के संपादित अंशों के आधार पर लिखा गया है. यह किताब ‘द न्यू बीजेपी ; मोदी एंड द मेकिंग ऑफ वर्ल्ड लार्जेस्ट पॉलिटिकल पार्टी’ शीर्षक से प्रकाशित हुई है.)

नोट: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है.

Tags:Amit shah, BJP, PM Modi