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this is the story of such a business which was run by 300 families now we do not know about food for two times nodss

ये कहानी है ऐसे कारोबार की जिसको चलाते थे 300 परिवार, अब दो वक्त की रोटी का नहीं हो रहा जुगाड़

आगरा के तीन बड़े माहौल्लों में रहने वाले लगभग हर परिवार में जिल्दसाजी का काम किया जाता था लेकिन समय के साथ अब हाथ के कारीगरों की जगह मशीनों ने ले ली. अब उनके सामने रोजी रोटी का भी संकट आ खड़ा हो गया है.

हरीकांत शर्मा

आगरा. समय बदलता है ये शायद हम सभी ने सुना होगा. लेकिन बदलता समय कभी कभी कुछ अच्छा लाता है तो कभी कभी एक टीस भी छोड़ जाता है. ये कहानी ऐसी ही एक टीस की है जिसे आगरा सैकड़ाें परिवार झेल रहे हैं. कई के सामने तो रोजी रोटी का संकट भी है. कभी अपने नाम के साथ कारोबारी शब्द जोड़ने वाले इन लोगों को मशीनों ने रिप्लेस कर दिया. हालात इतने खराब हो गए कि कोई रेड़ी धकेल रहा है तो कोई कहीं पर नौकरी कर रहा है. फिर एक बार कहानी शब्द का प्रयोग यहां पर इसलिए क्योंकि उम्मीद है कि एक कहानी की तरह ही इन परिवारों की तकलीफों का भी अंत हो. यहां पर बात की जा रही है बुक बाइंडिंग यानी जिल्दसाजी के कारोबार की. समय के पहिए ने 20 साल में ही ऐसी करवट बदली कि हाथ के कारीगरों की जगह बड़ी-बड़ी मशीनों ने ले ली.

जानकारी के अनुसार 20 साल पहले आगरा के राजा मंडी, गोकुलपुरा और वल्का बस्ती में शायद ही ऐसा कोई घर रहा होगा जिसमें बुक बाइंडिंग यानी कि जिल्दसाजी का काम नहीं किया जाता हो. किताबों पर जिल्दसाजी, कवर बनाना, डायरी, रजिस्टर, बिल बुक जैसे तमाम काम थे जो यहां हर घर में किए जाते थे. लगभग 200 से 300 परिवार ऐसे थे जिनकी रोजी-रोटी बुक बाइंडिंग से संबंधित काम से ही चलती थी. इस काम में महिलाओं के साथ-साथ बच्चे भी हाथ बंटाते थे. शहर की अर्थव्यवस्‍था का एक बड़ा हिस्सा इस कारोबार से आता था. लेकिन समय का चक्र ऐसा चला कि तकनीक ने इन मजदूरों की रोजी रोटी छीन ली.


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मशीनों ने छीन लिया कामगारों का काम
वल्का बस्ती के रहने वाले रमेश चंद्र की उम्र 68 साल है. आंखों से धुंधला दिखाई देता है. लेकिन अब भी किताबों की जिल्दसाजी का काम करते हैं. पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि 10 से 20 साल पहले यहां घर-घर में बुक बाइंडिंग करने वालों का अच्छा खासा काम था. हर घर में कारीगर थे. लेकिन अब बड़ी-बड़ी मशीनें आ गई हैं, जो काम कारीगर करते हैं वह काम अब मशीन करने लग गई हैं. अब कोई भी इस काम में अपने बच्चों को लाना नहीं चाहता है. इसके साथ ही बहुत सारे पब्लिकेशन ने खुद के कारखाने खोल लिए हैं.

नए कारीगर नहीं आना चाहते इस धंधे में
स्थानीय कारीगर दीपक 20 साल से इस काम में है. दीपक के दूसरे साथी अब इस काम को छोड़कर चांदी की पायल, रेड़ी धकेली या अपना स्टार्टअप शुरू कर चुके हैं. दीपक भी दूसरे काम धंधे की तलाश में हैं. उनका कहना है कि अब जिल्दसाजी में इतना पैसा नहीं है. कागज पर भी जीएसटी लागू होने की वजह से बचा कुचा काम खत्म हो गया है. बुक बाइंडिंग का काम आखिरी सांसें गिन रहा है. दीपक भी इस धंधे से किनारा करने वाले हैं. जब आर्डर मिलते हैं तो वह खाली समय में इस कारखाने में काम करने चले आते हैं.

क्या करें अब दूसरा काम भी तो नहीं?
दौलतराम जो कि स्थानीय कारीगर हैं जो कि 50 सालों से ये काम कर रहे हैं. इस काम से उनके घर की रोजी रोटी चलती है. पहले ज्यादातर बुक बाइंडिंग का काम हाथों से किया जाता था. लेकिन अब एडवांस मशीनें आ गई हैं. जिस पर काम करना दौलतराम जैसे लोगों के बस की बात नहीं है. मशीन बहुत तेजी से काम करती हैं. उन्हें केवल एक किताब पर बाइंडिंग करने पर चार से पांच रुपये मिलते हैं. बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी नहीं निकल पाता है. लेकिन करें भी तो क्या उनके पास कोइ दूसरा काम भी नहीं है, जिसे वह कर सकें.