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Ayodhya: पढ़िए श्रीरामचरितमानस के रचयिता तुलसीदास के 'गोस्वामी तुलसीदास' बनने की रोचक कहानी

आचार्य सत्येंद्र दास बताते हैं कि गोस्वामी एक जाति होती है जो मथुरा और वृंदावन में ज्यादातर पायी जाती है, वहां के लोग राधा और कृष्ण की पूजा करते हैं. हालांकि तुलसीदास को अपनी इंद्रियों को बस में करने के लिए गोस्वामी की उपाधि मिली थी.

रिपोर्ट- सर्वेश श्रीवास्तव

अयोध्या. रामचरितमानस का जिक्र आते ही हर आदमी की जुबान पर गोस्वामी तुलसीदास (Goswami Tulsidas) का नाम जरूर आता है. दरअसल वह रामचरितमानस के रचयिता हैं. आज हम आपको बताएंगे कि तुलसीदास का नाम गोस्वामी तुलसीदास कैसे पड़ा? आज से हजारों वर्ष पूर्व तुलसीदास का जन्म 1554 में बांदा जिले में हुआ था. जन्म लेते ही तुलसीदास के मुख से राम का नाम निकला था. इस नाते उनको रामबोला नाम से भी जाना जाने लगा. उसके बाद वह हरि नारायण दास के शिष्य बने. कहा जाता है कि तुलसीदास एक बार कुछ भी पढ़ लेते थे तो उनको सब कुछ याद हो जाता था.

रामलला के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास बताते हैं कि तुलसीदास की पत्नी बहुत खूबसूरत थीं. वह अपनी पत्नी से वह बेहद प्रेम करते थे. एक बार तुलसीदास की पत्नी अपने मायके चली गई थी. तुलसीदास से अपनी पत्नी की विरह सही नहीं गयी तो वे अपने ससुराल गए और वहां दरवाजा बंद होने के कारण तुलसीदास ने पेड़ पर लटके सांप को रस्सी समझकर आंगन में कूदे और कमरे में पहुंचे तो उनकी पत्नी उन्हें वहां देखकर आश्चर्यचकित हो गयीं. तब पत्नी ने कहा “हाड़ मांस का देह मम, तापर जितनी प्रीततिसु आधों जो राम प्रति, अवसि मिटिहि भवभीती” अर्थात जितना प्रेम तुम हाड़ मांस से बने मेरे शरीर से करते हो उसका आधा भी यदि भगवान से कर सको तो तुम्हारा कल्याण हो जाएगा.


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फिर यूं बदल गई राह
पत्नी की कटु किन्तु सत्य बात ने तुलसीदास को वैराग्य का पथ दिखाया. वह वहां से सीधे प्रयाग आए और विरक्त हो गए. उसके बाद उन्होंने तपस्या व साधना करनी शुरू की. तपस्या करते-करते तुलसीदास ने अपनी इंद्रियों को अपने बस में कर लिया या यूं कहें इंद्रियों को जीत लिया, तब उनको गोस्वामी की उपाधि मिली. तब से उनको गोस्वामी तुलसीदास के नाम से जाना जाता है.

आचार्य सत्येंद्र दास बताते हैं कि गोस्वामी एक जाति होती है जो मथुरा और वृंदावन में ज्यादातर पायी जाती है. वहां के लोग राधा और कृष्ण की पूजा करते हैं, लेकिन गोस्वामी तुलसीदास को गोस्वामी की उपाधि मिली थी. उन्हें यह उपाधि अपनी इंद्रियों को बस में करने के लिए मिली थी. वहीं, आचार्य सत्येंद्र दास के मुताबिक, गोस्वामी तुलसीदास दुबे ब्राम्हण परिवार से थे.

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