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जानिए उपचुनाव में गठबंधन के जीत की कहानी, कैसे बढ़ा कारवां और जुड़ते गए दल

जानिए उपचुनाव में गठबंधन के जीत की कहानी, कैसे बढ़ा कारवां और जुड़ते गए दल

अगर उपचुनाव में वोटिंग प्रतिशत की करें तो कैराना और नूरपुर में गोरखपुर और फूलपुर से कहीं ज्यादा वोटर निकला. तो ऐसा क्या हुआ कि गठबंधन को जीत मिली?

कंवर हसन का समर्थन लेने के बाद जयंत चौधरी. File Photo

कंवर हसन का समर्थन लेने के बाद जयंत चौधरी. File Photo

गोरखपुर और फूलपुर में हार के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि बीजेपी का वोटर निकला नहीं. इसी बात पर अमल करते हुए कैराना और नूरपुर उपचुनाव में बीजेपी ने वोटर ​को पोलिंग बूथ तक पहुंचाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी. खुद सीएम योगी ने ताबड़तोड़ जनसभाएं कीं, यही नहीं बीजेपी सरकार के सांसद, मंत्री, विधायक और दर्जनों नेताओं ने रात दिन एक कर चुनाव में वोट मांगे. लेकिन नतीजा सिफर ही रहा. दोनों जगह बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा.

बात अगर उपचुनाव में वोटिंग प्रतिशत की करें तो कैराना और नूरपुर में गोरखपुर और फूलपुर से कहीं ज्यादा वोटर निकला. तो ऐसा क्या हुआ कि गठबंधन को जीत मिली? तो चलिए आपको कुछ दिन पीछे ले चलते हैं.  2017 के दिसंबर में समाजवादी पार्टी काफी कोशिश के बाद भी कानपुर की सिकंदरा सीट पर बीजेपी को हरा नहीं पाई. इस हार के बाद से ही समाजवादी पार्टी ने अपनी रणनीति पर दोबारा गौर किया और गोरखपुर व फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में छोटे-छोटे दलों के साथ गठबंधन कर प्रत्याशी मैदान में उतारा. इनमें निषाद पार्टी, एनसीपी, रालोद, वाम दल आदि शामिल थे. चुनाव शुरू हुआ तो ऐन वक्त बहुजन समाज पार्टी ने सपा प्रत्याशी को समर्थन दे दिया और नतीजा सबके सामने है.

गठबंधन ने जमीनी हकीकत को समझते हुए बनाई रणनीति 

इसके बाद आया कैराना और नूरपुर चुनाव. ये भी बीजेपी की ही सीट थी. लेकिन यहां गठबंधन ने जमीनी हकीकत को समझते हुए रणनीति बनाई. कैराना में पिछले काफी समय से राष्ट्रीय लोकदल के अजीत सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी जमीन पर काम कर रहे थे. इनमें पंचायत स्तर तक बैठक से लेकर मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाट और मुस्लिम समुदाय में बढ़ी दूरियों को पाटने का काम भी शामिल था. गठबंधन ने तय किया कि कैराना में चुनाव राष्ट्रीय लोकदल की अगुवाई में लड़ा जाएगा. इसके बाद समाजवादी पार्टी के विधायक नाहिद हसन की मां तबस्सुम हसन को ऐन चुनाव से पहले राष्ट्रीय लोकदल की सदस्यता दिलाई गई और प्रत्याशी घोषित कर दिया गया.

इमरान मसूद की हसन परिवार से चुनावी रंजिश बनी चुनौती

उधर कनार्टक चुनाव में गठबंधन सरकार बनाने के बाद कांग्रेस ने भी क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर बीजेपी को हराने की रणनीति पर हामी भर दी. इसका सीधा असर कैराना में देखने को मिला. कैराना की सियासत में कांग्रेस नेता इमरान मसूद का भी अच्छा रसूख माना जाता है. नकुड़ और गंगोह विधानसभा सीटों पर इमरान की अच्छी पकड़ है. लेकिन इमरान मसूद की तबस्सुम हसन के परिवार से चुनावी रंजिश भी किसी से छिपी नहीं थी. 2017 के विधानसभा चुनाव में माना जाता है कि इमरान और उनके भाई की हार में हसन परिवार का भी योगदान रहा.

इमरान और कंवर हसन का समर्थन बना टर्निंग प्वाइंट

बहरहाल, इमरान का विरोध गठबंधन प्रत्याशी तबस्सुम हसन के लिए बड़ी चुनौती दिख रहा था. वहीं तबस्सुम के देवर कंवर हसन ने भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उपचुनाव में ताल ठोक दी, जिसके कारण मुश्किलें और बढ़ गईं. इसके बाद सपा नेताओं ने कांग्रेस हाईकमान के साथ मिलकर इमरान मसूद को समझाया. जिसके बाद इमरान ने तबस्सुम हसन को समर्थन का ऐलान दे दिया.

उधर शामली के जसाला गांव में जयंत चौधरी ने भाभी और देवर के बीच चल रही तनातनी को शांत कराया. जयंत द्वारा बुलाई गई इस मीटिंग में नाहिद हसन के चाचा अनवर हसन व चाचा कंवर हसन सहित सैकड़ो की संख्या में कार्येकर्ता मौजूद रहे. तय हुआ कि अब कैराना में दोनों साथ मिलकर चुनाव प्रचार करेंगे और गठबंधन प्रत्याशी के लिए वोट मांगेंगे. इस कवायद के साथ साफ हो गया कि मुस्लिम वोट बंटने नहीं जा रहा है. बाकी नतीजा आपके सामने है.

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Tags: लखनऊ

FIRST PUBLISHED : May 31, 2018, 16:41 IST
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