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हिलजात्रा में लखिया भूत को देखने उमड़ी भारी भीड़

उत्तराखंड में लोकपर्व आज भी आस्था, विश्वास, रहस्य और रोमांच का प्रतीक हैं. ये पर्व जहां पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं, वहीं लोगों को एकता के सूत्र में भी बांधते हैं. सोरघाटी पिथौरागढ़ का ऐतिहासित हिलजात्रा पर्व यहां पिछले पांच सौ सालों से बदस्तूर मनाया जा रहा है. हिलजात्रा में लखिया भूत को देखने और आशीर्वाद लेने वालों की भारी भीड़ उमड़ी.

Vijay Vardhan | ETV UP/Uttarakhand |

उत्तराखंड में लोकपर्व आज भी आस्था, विश्वास, रहस्य और रोमांच का प्रतीक हैं. ये पर्व जहां पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं, वहीं लोगों को एकता के सूत्र में भी बांधते हैं. सोरघाटी पिथौरागढ़ का ऐतिहासित हिलजात्रा पर्व यहां पिछले पांच सौ सालों से बदस्तूर मनाया जा रहा है. हिलजात्रा में लखिया भूत को देखने और आशीर्वाद लेने वालों की भारी भीड़ उमड़ी.


पहाड़ों में इस पर्व को कृषि पर्व के रूप में मनाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है. सातू-आंठू से शुरू होने वाली कृषि पर्व का समापन में पिथौरागढ़ में हिलजात्रा के रूप में होता है. इस अनोखे पर्व में बैल, हिरन, लखिया भूत जैसे दर्जनों पात्र मुखौटों के साथ मैदान में उतरकर देखने वालों को रोमांचित कर देते हैं.


हिलजात्रा पर्व सोर, अस्कोट और सीरा परगना में ही मनाया जाता है, लेकिन इस कुमौड़ की हिलजात्रा ने सर्वाधिक ख्याती बटोरी है.


कुमौड़ की हिलजात्रा के बारे में कहा जाता है कि यहां के चार महर भाइयों की वीरता से खुश हो कर नेपाल नरेश ने मुखौटों के साथ हिलजात्रा पर्व भेंट किया था. तभी से ये पर्व यहां मनाया जाता है.


इस पर्व का आगाज भले ही महरों के बहादूरी से हुआ हो, लेकिन अब इसे कृषि पर्व के रूप में मनाये जाने लगा है. हिलजात्रा में बैल, हिरन, चित्तल और धान रोपती महिलाएं, यहां के कृषि जीवन के साथ ही पशु प्रेम को भी दर्शाती हैं. समय के साथ आज इस पर्व की लोकप्रियता इस कदर बढ़ गई है कि हजारों की तादात में लोग इसे देखने आते हैं.


घंटों तक चलने वाले हिलजात्रा पर्व का समापन उस लखिया भूत के आगमन के साथ होता है, जिसे भगवान शिव का गण माना जाता है. लखिया भूत अपनी डरावनी आकृति के बावजूद पर्व के सबसे बड़ा आकर्षण है. जो लोगों को सुख, समृद्दि और खुशहाली का आशीर्वाद देने के साथ अगले साल आने का वादा कर चला जाता है.

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