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News18 हिंदी | Last Updated:September 27, 2022, 13:09 IST

Churu: चूरू का तिरुपति बालाजी मंदिर है बेहद खूबसूरत, देखें तो कह उठेंगे वाह क्‍या बात है!

Tirupati Balaji Temple Churu: दक्षिण भारत के तिरुपति बालाजी मंदिर की तर्ज पर बना उत्‍तर भारत का पहला मंदिर राजस्थान के चूरू जिले के सुजानगढ़ में स्थित है. इस मंदिर के निर्माण के लिए दक्षिण भारत से कारीगर आए, तो इसे बनाने में सोने, चांदी और लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है. (रिपोर्ट-नरेश पारीक)

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चूरू. दक्षिण भारत में बने तिरुपति बालाजी मंदिर तक अगर आप लंबी दूरी की वजह से नहीं जा पा रहे हैं, तो आप उत्तर भारत में राजस्थान के चूरू जिले की सुजानगढ़ तहसील में बने तिरुपति बालाजी को देख सकते हैं. यह मंदिर दक्षिण भारत के तिरुपति बालाजी मंदिर की तर्ज पर बना है.

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दक्षिण भारत के तिरुपति बालाजी मंदिर की तर्ज पर बने उत्तर भारत के इस मंदिर निर्माण के लिए दक्षिण भारत से कारीगरों को बुलाया गया था. मंदिर निर्माण कार्य में सोने, चांदी और लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है. सभी मूर्तियां हस्त निर्मित है. मंदिर निर्माण में करीब सात वर्ष का समय लगा. मंदिर में सभी अनुष्ठान और समारोह दक्षिण भारतीय रीति-रिवाजों के अनुसार होते हैं.

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भगवान विष्णु के प्रतिरूप भगवान वेंकटेश्वर की विशाल प्रतिमा वही है, जो तिरूपति मंदिर में है. मन्दिर की भीतरी दीवारों पर रामायण व भगवान विष्णु के दशावतारों के मूर्ति शिल्प ऐसे उकेरे गए हैं, मानो अभी बोल पड़ेंगे. भगवान वेंकटेश्वर की भव्य प्रतिमा के समक्ष उनके वाहन गरूड़ की काले पत्थर से निर्मित प्रतिमा यहां आने वाले श्रद्धालुओं को अपनी और आर्कषित करती है. गरूड़ प्रतिमा के निकट ही 51 किलो का स्वर्ण मण्डित गरूड स्तम्भ जो आने वाले श्रद्धालुओं का मन मोह लेता है.

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मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर के उतर में गोदम्बा जी हैं, जो कि भगवान की अनन्य भक्त थीं. दक्षिण में गोदम्बा जी की वही मान्यता है, जो राजस्थान में मीरा की है. वेंकटेश्वर भगवान के बराबर में दक्षिण की और उनकी पत्नि पदमावती जी अर्थात लक्ष्मी जी की प्रतिमा है. मन्दिर के ऊंचे गुंबद मीलों दूर से ही मन्दिर की भव्यता की कहानी बया करते हैं.

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मंदिर में प्रतिवर्ष ब्रह्मोत्सव व पवित्रोत्सव का आयोजन ट्रस्टी मंजू देवी जाजोदिया की देख-रेख में किया जाता है. विश्व कल्याण के लिए होने वाले इन आयोजनों में दक्षिण भारतीय वेदपाठी विद्वान पण्डितों द्वारा मंत्रोच्चारण पूर्वक हवन में आहूतियां दी जाती है. प्रतिवर्ष बसन्तपंचमी से प्रारम्भ होने वाले ब्रह्मोत्सव में अनुज्ञा, मृतिका, संग्रहण, अंकु रारोपण, विष्वक्सेन, वेद प्रबन्ध पाठ, प्रात: पूजा, हवन, ध्वजारोहण, उत्सव, तिरूमंजन, अभिषेक, वेद पाठ, भोगादि-प्रसाद वितरण, भेरी पूजा, कुम्भ स्थापना, यज्ञशाला होम, सवारी, कल्याणोत्सव, भगवान का विवाह, चक्रस्नान, अवभ्सृतोत्सव आयोजित होते हैं तथा अंतिम दिन भगवान की गरूड़ सवारी नगर भ्रमण के लिए निकलती हैं.

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मंदिर का निर्माण उधोगपति स्व सोहनलाल जाजोदिया के परिवार द्वारा करवाया गया. चूरू जिले की सुजानगढ़ तहसील में बने इस मंदिर को 21 फरवरी 1994 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैंरोंसिंह शेखावत ने आमजन के दर्शनार्थ खोला था.मंदिर में हर रोज बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं.

First Published:September 27, 2022, 13:09 IST

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