बीजेपी के लिए अभी नीतीश कुमार के आगे बिहार और भी है

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि बीजेपी आलाकमान को नीतीश कुमार के साथ छोड़ देने की तैयारी का इल्म तक नहीं था. सोचने वाली बात तो यही है कि आखिर जो बात बिहार का बच्चा बच्चा जानता था उसके बारे में भला बीजेपी आलाकमान को जानकारी क्यों नहीं होती? बीजेपी के लिए आगे संभावनाएं कम नहीं हुई हैं. राहें और भी हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: August 13, 2022, 9:12 am IST
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बीजेपी के लिए अभी नीतीश कुमार के आगे बिहार और भी है
बिहार में नई सरकार और बीजेपी की राजनीति

दो-तीन दिनों से मंथन चल ही रहा है कि नीतीश कुमार ने एक बार फिर बीजेपी को पटखनी दे दी. मंथन इस बात पर होने लगा है कि अब विपक्ष को 2024 के लिए एक साझा पीएम इन वेटिंग भी मिल गया है. लोगों को ये चर्चा करने में अच्छा लगने लगा है कि नीतीश कुमार तेजस्वी यादव के साथ मिल कर बीजेपी को फलां तारीख को झटक दे देंगे इसका बीजेपी आलाकमान को इल्म तक नहीं था.नीतीश का दिल्ली के कार्यक्रमों में नहीं आना, कई मुद्दों पर मोदी सरकार से अलग राय रखना, बिहार में बीजेपी का बड़े भाई की भूमिका में रह कर नीतीश कुमार को मनमानी करने नहीं देना. कई संकेत थे जिसके बारे में लगातार बीजेपी में मंथन चल रहा था.


सोचने वाली बात तो यही है कि आखिर जो बात बिहार का बच्चा बच्चा जानता था उसके बारे में भला बीजेपी आलाकमान को जानकारी क्यों नहीं होती? पीएम मोदी भी जानते है कि उनकी राजनीति को नीतीश कुमार पसंद नहीं करते लेकिन उन्होंने बड़ा दिल दिखाते हुए 2020 मे नीतीश कुमार को सीएम बनाने का एलान कर दिया था. 2020 से अब तक दो सालों में टकराव के कई पल आए और ये साफ होता जा रहा था कि नीतिश कुमार अब पलटी मारेंगे.


बीजेपी आलाकमान नीतीश को यह मौका नहीं देना  चाहता था

2013 में नीतीश कुमार के पलटी मारने के बाद जो तल्खी उभरी थी, वैसी तल्ख तू-तू, मैं-मैं पर बीजेपी आलाकमान उतरना नहीं चाहता था. तभी तो जेडीयू नेता और मंत्री 2020 से अब तक बीजपी को आंखे तरेरते रहे लेकिन बीजेपी आलाकमान ने इसे राज्य स्तर पर ही सीमित रहने दिया था. बीजेपी आलाकमान यही संदेश देता रहा कि जब तक नीतीश कुमार खुद नही बोलते, दसरे नेताओं की बयानबाजी में नहीं फंसना है. इसलिए ये तमाम राजनीतिक पंडितों को समझना होगा कि महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश से लेकर कई राज्यों में तख्ता पलट हो गया और विपक्ष को पता भी नहीं चला, ऐसे में बिहार में नीतीश कुमार पलटेंगे और वो बीजेपी आलाकमान को पता नही था, ये समझ के परे है.


पिछले हफ्ते ही अमित शाह औऱ बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पटना का दौरा किया था. उसके बाद बीजेपी महासचिव अरुण सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस कर एलान किया था कि नीतिश कुमार गठबंधन के मुख्यमंत्री हैं और 2025 का चुनाव भी बीजेपी-जेडीयू मिल कर लडेंगे और नीतीश ही नेता होंगे. अब इससे ज्यादा आश्वासन बीजेपी क्या दे सकती थी? बीजेपी आलाकमान नहीं चाहता था कि सरकार गिरने का पूरा ठीकरा नीतीश कुमार उनके सर फोड दें. इसलिए जानते-समझते हुए ही नीतीश कुमार को शांति से पलटी मारने के लिए एक बार फिर छोड दिया गया.


बीजेपी ने हथियार नहीं डाले हैं

ऐसा नहीं है कि बीजेपी के लिए रास्ते बंद गए हैं. 2005 में जब आरजेड़ी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के गढ़ को जब बीजेपी ने नीतीश कुमार को आगे कर के भेदा था, तब से बिहार में बहार है का नारा 2013 तक चला था. लेकिन 2013 मे एक बार नीतीश ने जो पलटी मारी, उसके बाद से ही तो बिहार में सुशासन पटरी से उतर गया. हर वर्ग, हर जाति के नेता बन चुके नीतीश कुमार फिर अपना जनाधार खोते चल गए. 2014 लोकसभा चुनावों में जेडीयू का जो हाल हुआ वो किसी से भी छुपा नहीं है. आलम ये था कि बीजेपी के सहारे 2017 में मुख्यमंत्री बनने तक वे उनकी छवि से लेकर जनाधार तक को झटका लग चुका था. उनकी यात्राओ में काले झंडे तक दिखाए गए, उनके खिलाफ नारे लगे. साफ था कि उनकी मुश्किले बढ रहीं थीं. 2020 तक जेडीयू 45 सीटों तक सिमट गयीं और बीजेपी 75 तक जा पहुंची. आलाकमान जानता है कि पीएम मोदी की नीतियों और योजनाओं का लाभ बिहार में भी जबरदस्त पहुंचा है और पीएम मोदी की लोकप्रियता भी किसी अन्य नेता से कहीं ज्यादा है. इसलिए बीजेपी आलाकमान को भरोसा है कि सही रणनीति के साथ चले तो अकेले दम पर भी सरकार बनाना असंभव नहीं है.


बीजेपी का मिशन 2024

लडाई अब मुद्दों से भटक कर जाति और संप्रदाय पर आने वाली है. आरजेडी की लडाई यादव और अल्पसंख्यकों की मदद से है, नीतिश कुमार के पास एक जाति विशेष का वोट हैं. दो विपरित धुरी की पार्टियां के बीच बीजेपी का सबका साथ सबका विकास के फार्मुले की अग्नि परीक्षा बिहार मे ही होने वाली है. अब दोनो गठबंधनों का असली टकराव 2024 में 40 लोकसभा सीटों के लिए होगा. नीतीश और तेजस्वी अलग अलग चुनाव लड़ कर अपने हाथ जला चुके हैं. लेकिन बीजेपी आलाकमान जानता है कि एक बार फिर जिला स्तर पर छोटे छोटे दलों को साथ लेकर इस चक्रव्यूह को भेदना होगा. अमित शाह का यूपी फार्मूला जिसमें गैर यादव पिछड़े और गैर जाटव दलित समाज को जोडना शामिल था कितना सफल रहा है ये पूरी दुनिया से छिपा नहीं है.


पिछड़ी जातियों पर ध्यान देने की जरुरत

अब जरुरत है बिहार में एक-दो ऐसे नेताओं को बड़ा करने की जिनकी जनता मे अपील हो. पुराने चेहरों पर कई बार दांव लगा दिया लेकिन जरुरत है युवा चेहरों की जो पिछड़े वर्ग के ही हों लेकिन विकास और बिहार को आगे ले जाने की बात करें. अगड़ी जातियां आम तौर पर बीजेपी के साथ ही खड़ी रहीं हैं. और ये 12 फीसदी वोट बीजेपी को मिलते रहे हैं. ये बीजेपी का कोर वोट बैंक हैं इसे साथ लेकर चलना होगा. इसलिए पूरा का पूरा ध्यान अगड़ी जातियों, गैर यादव ओबीसी और ईबीसी यानि आर्थिक रुप से पिछड़ी जातीयों को साथ मजबूती से जोड़ना होगा. महादलितों के वोट बीजेपी को मिले थे, उनके नुमाइंदों को भी आगे लाना होगा. बिहार में जाति और वर्ग संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है इसलिए ये ध्यान में रखते हुए बीजेपी को आगे बढ़ना होगा जिसमें कई पिछड़ी जातियां यादवों से दूरी बना कर रखती हैं और कुछ कुरमी जाति से. यहीं छुपा है बीजेपी का वोट बैंक. इसमें रविदास, निषाद, कुशवाहा, चंद्रवंशी, गंगोता जैसी जातियों पर अतिरिक्त ध्यान देना होगा.


पीएम मोदी रहेंगे ट्रंप कार्ड

बिहार में जाति के आधार पर वोटिंग होती है लेकिन बीजेपी के पास पीएम मोदी जैसा एक ऐसा ट्रंप कार्ड है जिसकी बिहार के हर वर्ग मे अपील है. साथ ही पीएम मोदी से बड़ा ओबीसी चेहरा बिहार क्या पूरे देश मे कोई भी नहीं. कोरोना काल में प्रवासी बिहार के निवासियों की वापसी और मुफ्त राशन की सुविधा ने गरीबों को जो राहत दी वो किसी से छुपा नहीं है. केन्द्र सरकार की योजनाओं का कितना फायदा बिहार को मिला है वो लाभान्वित जानते ही हैं. इसलिए बीजेपी को इन बातों को लेकर आगे बढ़ना है.


इसलिए बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि ले… बिहार की जनता ने सबको परखा है. कांग्रेस, आरजेडी. जेडीयू, गठबंधन मे बीजेपी लेकिन बीजेपी की अपील यही है कि अकेले सत्ता संभालने का मौका नहीं मिला है. बिहार में उद्योग-धंधे चौपट हैं, बाढ और सुखाड़ का प्रकोप है. आजादी के 70 साल बाद भी राजधानी पटना में एक पांच सितारा होटल तक नहीं. व्यवसायी, छात्र सब राज्य छोड़ कर निकलने का मौका तलाश रहे हैं. यहीं दिखाना है लोगों को मोदी मॉडल और पडोस मे यूपी का योगी मॉडल जहां गुंड़ागर्दी भी खत्म हो रही है और यूपी विकास की राह पर भी चल पड़ा है. जाति-धर्म की राजनीति तो बिहार में चलती रहेगी लेकिन बीजेपी आलाकमान को बिहार की जनता को यही भरोसा दिलाना है कि हम ही बदलेंगे बिहार.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
अमिताभ सिन्हा

अमिताभ सिन्हाएक्जूक्यूटिव एडिटर, न्यूज 18 इंडिया.

अमिताभ सिन्हा News18 India के एक्जिक्यूटिव एडिटर हैं. प्रिंट और टीवी पत्रकारिता में पच्चीस साल से ज्यादा का अनुभव है. पटना 'टाइम्स ऑफ इंडिया' से करियर की शुरुआत की और 'आज तक' में तकरीबन 14 साल तक रिपोर्टिंग की. सात साल से नेटवर्क 18 से जुड़े हुए हैं. हिंदी और अंगरेजी भाषाओं में समान अधिकार से लिखने वाले अमिताभ सिंहा ने देश -विदेश के बहुत से महत्वपूर्ण आयोजनों और घटनाओं की रिपोर्टिंग की है. संसदीय पत्रकारिता का लंबा अनुभव है, साथ ही सरकार की नीतियों और योजनाओं पर खास पकड़ रखते हैं. News18 की हिंदी और अंगरेजी दोनों भाषाओं की वेबसाइट पर लगातार लिखते रहते हैं. उच्च शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय से प्राप्त की है.

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First published: August 13, 2022, 9:12 am IST