Assembly Elections 2022: शहर में शासन और गांव में राशन- बीजेपी का 4 राज्यों में जीत का मंत्र

Assembly Elections 2022: आजादी के बाद 70 साल के चुनावी इतिहास मे ऐसा पहली बार हुआ कि कोई भी मुख्यमंत्री 5 साल सत्ता में रहने के बाद एक बार फिर चुनाव जीत कर सत्ता पर काबिज होने जा रहा है.

Source: News18Hindi Last updated on: March 10, 2022, 6:40 pm IST
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शहर में शासन और गांव में राशन- बीजेपी का 4 राज्यों में जीत का मंत्र
यूपी में बीजेपी की प्रचंड विजय के बाद कल दिल्ली में बैठक (AP)

आजादी के बाद 70 साल के चुनावी इतिहास मे ऐसा पहली बार हुआ कि कोई भी मुख्यमंत्री 5 साल सत्ता में रहने के बाद एक बार फिर चुनाव जीत कर सत्ता पर काबिज होने जा रहा है. 37 साल बाद यूपी में ऐसा हो रहा है कि कोई सरकार दोबारा चुना कर वापस आ रही है. कांग्रेस के कुछ दिग्गजों संपुर्णानंद, एनडी तिवारी जैसे उदाहरण तो हैं लेकिन मोदी- योगी की डबल इंजन की सरकार ने जो खेल दिखाया वो आने वाले चुनावों में सबके लिए एक सबक और मिसाल साबित होगा. सबक इस बात का कि जाति के नाम पर टिके रहे तो बाकी जातियां खिसक जाएंगी, और मिसाल ये कि योजनाओ का लाभ कतार मे खड़े आखिरी व्यक्ति तक पहुंच जाता है तो ये साइलेंट वोटर इतना शक्तिशाली बन जाता है कि झूठ और फरेब को ठिकाने लगा देता है.


उत्तर प्रदेश में रचा इतिहास

पीएम मोदी ने जब कहा कि यूपी और योगी बहुत उपयोगी तो वहां किसी को भरोसा नहीं हो रहा था कि गोल पोस्ट अब बदल चुका है. बीजेपी को जिताने के लिए तीन फैक्टर बड़े उत्तरदायी रहे. कोरोना काल में दो साल से मिल रहा गरीबों को मुफ्त राशन ने एक ऐसा वोट बैंक तैयार किया, जिसमें ग्रामीण इलाके का पूरा तबका शामिल था. ग्रामीण महिलाओं का वोट देने के लिए निकलना संदेश था कि सरकार की योजनाओं का जमीन पर सफलता से पहुंचने का. जब हम गांव में राशन की बात करते हैं तो मतलब यही होता है कि गरीब महिलाओं को राहत और उनका सशक्तिकरण. पीएम मोदी के शब्दों में यही साइलेंट वोटर उन्हे जीत दिला रही हैं. शहर में शासन का मतलब साफ है कि योगी राज की कानून और व्यवस्था इतनी सख्त की वसूली के धंधे बंद, माफिया और गुंडों पर गिरी गाज, अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग का व्यापार खत्म किया. शहरी वोटर को और क्या चाहिए. चैन और सुकुन. यही काम पीएम मोदीऔर सीएम योगी ने किया.


कानून व्यवस्था और मुफ्त राशन का जिक्र मैंने किया लेकिन बीजेपी का अपना कमिटेड वोट बैंक भी संतुष्ट था. आखिर अयोध्या में मंदिर निर्माण शुरू होना, काशी विश्वनाथ कॉरीडोर का कायाकल्प और चुनाव आते-आते मथुरा का मुद्दा गरमाया तो बीजेपी के अपने वोट बैंक में शिथिलता नहीं रही. वो वोट देने बाहर निकला. 2014 के बाद यूपी में वोट शेयर लगातार बढता चला गया है. 2017 की विधान सभा में 39.7 फीसदी वोट मिले तो 2019 की लोकसभा में 42.8 फीसदी वोट मिले. समाजवादी पार्टी यादव, मुसलमान वोटों के साथ जाट वोटों के सहारे जीत के सपने देखती रही तो बीजेपी ने गैर यादव ओबीसी, गैर जाटव दलितों के वोटों को अपना ओर करने में सफलता पायी. मायावती की लो प्रोफाइल जंग और अपने वोटरों को कहना कि वो समाजवादी पार्टी को वोट नही करें, एक बड़ी संख्या में जाटव वोट भी बीजेपी की ओर कर गया.


ये बात औऱ है कि अखिलेश यादव के विधायकों की संख्या बहुत बढ़ी है लेकिन उन्हें ये सबक जरूर मिल गया होगा कि एक जाति और संप्रदाय के सहारे नैय्या पार नहीं लगेगी और दूसरा जीत की आहट पाते ही जो सड़कों पर गुंडागर्दी की तस्वीरें नजर आने लगी थीं, उससे निजात पानी पडेगी. बिहार में आरजेडी औऱ लालू राज के उदाहरण सामने हैं. तमाम कोशिशों के बावजूद वो सत्ता में नहीं आ पाए. गुंडागर्दी से गांव हो या शहर, अगड़ी जाति हो या फिर पिछड़ी, सबको डर लगता है. इसलिए इन चुनावों का सबसे बड़ा सबक यही है कि गुंडागर्दी को बाय-बाय करें.


उत्तराखंड मे ट्रेंड बदला

उत्तराखंड में हर चुनाव मे सरकार बदल जाती थी. वो सिलसिला खत्म हो गया है. राज्य बनने के बाद पहली बार उत्तराखंड के वोटरों ने दोबारा बीजेपी सरकार को चुना. बीजेपी ने अपना वोट प्रतिशत भी बरकरार रखा है. जो लडाई तीन महीने पहले हाथ से गई नजर आ रही थी. जहां तीन मुख्यमंत्री देने पर वोटरों का रुख नकारात्मक था. संगठन बिखरा पड़ा था. अपने परिजनों को टिकट नहीं मिलने की उम्मीद के कारण कांग्रेस से पिछले चुनावों मे आए नेता वापस जाने के लिए तैयार बैठे थे. रोजगार से लेकर नेतृत्व पर सवाल उठ रहे थे. ऐसे में बीजेपी आलाकमान ने बीड़ा उठाया. खुद पीएम मोदी ने कमान संभाली. एक के बाद एक ताबडतोड रैलियां कीं. मुख्यमंत्री पुष्कर धामी को कहा गया कि वो संगठन की चिंता छोड़ कर पूरे रज्य का दौरा करें. धामी ने यही किया. अपने पूरे कार्यकाल में वो देहरादून में नहीं रुके. हर दिन एक नए स्थान का दौरा कर जनता की नाराजगी खत्म करते रहे. राजनाथ सिंह और प्रदेश नेतृत्व को साथ लेकर शहीद सम्मान यात्रा निकाली गई. हर शहीद के घर जाकर वहां की मिट्टी जमा की गयी. एक बड़ा स्मारक बनाने की तैयारी शुरू हो चुकी है. पीएम मोदी के विकास के काम-चार धाम को जोड़ने वाली सड़क, मंदिरो के बोर्ड़ों को सरकारी नियंत्रण मे करने वाली योजना को खटाई में डाला गया, कार्यकर्ताओं की फौज काम पर लगाई गई.


एक बिखरी हुई कांग्रेस पर दांव लगाने से बेहतर वोटरों ने मोदी सरकार पर भरोसा करना बेहतर समझा. पिछले चुनावों में भी पीएम मोदी का नाम और काम सुपर हिट हुआ था. इस बार फिर उत्तराखंड में बीजेपी का अपने दम पर बहुमत लाना तो पीएम मोदी का करिश्मा और राज्य मे किए गए विकास के काम को ही जाता है.


गोवा में प्रदर्शन सुधारा—सत्ता में वापसी

गोवा की हालत ऐसी थी कि राजनीतिक पंडित वहां बीजेपी को दहाई के आंकड़े तक पहुंचाने को तैयार नहीं थे. सीएम सावंत से नाराजगी पूरी थी. विपक्ष एकजुट होने लगा था. ममता बनर्जी, केजरीवाल सब सरकार बनाने के बड़े बड़े दावे कर रहे थे. सत्ता के विरोध में लहर काफी थी. लेकिन एक बार फिर पीएम मोदी का करिश्माई नेतृत्व काम आया. कोरोना काल में शत प्रतिशत टीकाकरण करने वाला पहला राज्य बन कर एक मिसाल पेश की तो संकट रोजगार को लेकर उभरे. विदेशी पर्यटक दो साल से गायब थे तो स्थानीय लोगों को रोजगार का संकट था. खनन पर रोक के कारण भी रोजगार की समस्या थी. लेकिन पीएम मोदी पर भरोसा कायम रहा और जीत हाथ लगी.


इतना तो साफ हो गया है कि उन पर जनता का भरोसा देश के किसी भी कोने में घटा नहीं है. दस साल से गोवा में सत्ता में रहने के बावजूद चुनावी नतीजों ने बीजेपी को और ताकत दी है. 2017 मे बीजेपी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थे. लेकिन 2022 में सबसे बड़ी पार्टी के रुप में उभरी. आलम ये है कि गोवा में 2017 के 32.5 फीसदी के मुकाबले 2022 में 33.6 फीसदी वोट शेयर मिला और अपने दम पर बहुमत की और बढ गई है बीजेपी.


मणिपुर में एंटी इनकंबेंसी को नकारा

बीजेपी सरकार ने एंटी इंकेंबेंसी को धता बताते हुए मणिपुर में अपना प्रदर्शन सुधार लिया है. 2017 में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रुप में उभरी बीजेपी अब सबसे बड़ी पार्टी बन गई है. 2017 में बीजेपी को 36.3 फासदी वोट मिले थे तो 2022 में ये आंकड़ा 37.6 फीसदी तक जा पहुंचा. यहां तो एक ही बात कही जा सकती है कि मुख्यमंत्री एन वीरेन सिंह सरकार ने केन्द्र सरकार की योजनाओं को हर घर तक पहुंचाने का काम बखूबी किया. पीएम मोदी खुद ही वहां जाकर जायजा लेते रहे और केन्द्र सरकार के मंत्रियों का लगातार आना जाना लगा रहा. महिला प्रधान समाज में खातों में सीधा पैसा डालना, कोरोना काल मे राशन मिलना, सड़कों का जाल बिछाना, मणिपुर का हवाई यातायात से जोरदार तरीके से जुड़ना, इंफाल में महिलाओं के लिए बने विशेष मार्केट का कायाकल्प किया गया. इसलिए चंद मुश्किलें तो आईं लेकिन मोदी मैजिक कायम रहा.


पंजाब में पहली बार लड़े

पंजाब में बीजेपी रेस में ही नहीं थी. चुनाव के तीन महीने पहले जब कोरोना के दिशानिर्देश थोडे़ ढीले पड़े तो पार्टी हरकत मे आई. आम आदमी पार्टी की जीत पर किसी को संदेह नहीं था लेकिन बीजेपी आलाकमान की राहत की बात ये कि 70 से ज्यादा सीटों पर वो पहली बार चुनाव लड़ी. इन विधानसभा सीटों पर उनके बूथ स्तर के कार्यकर्ता तैयार हो गए. अकाली दल के साथ 2017 मे बीजेपी ने 3 सीट जीती थी लेकिन उस आंकडे को भी पार नहीं कर पा रही है. लेकिन वोट शेयर बढा है. वहां काम पर लगाए गए नेताओं का मानना था कि जनता अकाली दल और कांग्रेस से ऊब चुकी थी. उन्हें विकल्प चाहिए था जो बीजेपी बनने की स्थिति में नहीं थी. इसका फायदा आम आदमी पार्टी को मिल गया. लेकिन अब तैयारी है 2024 की.


तय है कि 4-1 के इन नतीजों ने बीजेपी को भी काफी कुछ सिखाया है. लेकिन पीएम मोदी का पूरा ध्यान केन्द्रित है कि परफॉरमेंस पर. चाहे सांसद हों, विधायक हों, मंत्री हों, पार्टी के कार्यकर्ता हों, पीएम चाहते हैं कि सबको काम कर नतीजा देना ही होगा तभी 25 साल राज करने का सपना पूरा होगा. और नतीजे बता रहे हैं कि अब परफॉरमेंस जनता को भी भा रहा है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
अमिताभ सिन्हा

अमिताभ सिन्हाएक्जूक्यूटिव एडिटर, न्यूज 18 इंडिया.

अमिताभ सिन्हा News18 India के एक्जिक्यूटिव एडिटर हैं. प्रिंट और टीवी पत्रकारिता में पच्चीस साल से ज्यादा का अनुभव है. पटना 'टाइम्स ऑफ इंडिया' से करियर की शुरुआत की और 'आज तक' में तकरीबन 14 साल तक रिपोर्टिंग की. सात साल से नेटवर्क 18 से जुड़े हुए हैं. हिंदी और अंगरेजी भाषाओं में समान अधिकार से लिखने वाले अमिताभ सिंहा ने देश -विदेश के बहुत से महत्वपूर्ण आयोजनों और घटनाओं की रिपोर्टिंग की है. संसदीय पत्रकारिता का लंबा अनुभव है, साथ ही सरकार की नीतियों और योजनाओं पर खास पकड़ रखते हैं. News18 की हिंदी और अंगरेजी दोनों भाषाओं की वेबसाइट पर लगातार लिखते रहते हैं. उच्च शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय से प्राप्त की है.

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First published: March 10, 2022, 6:40 pm IST