पांच राज्यों के चुनावी नतीजों का अनुमान सही, लेकिन बंगाल का मंथन क्या कहता है ?

West Bengal Elections 2021: लोकतंत्र है और चुनावों मे हार जीत तो चलती ही रहती है लेकिन 2017 में विधानसभा की 3 सीटें और फिर 2019 मे लोकसभा की 18 सीटों से बढ़ते हुए बीजेपी का आंकड़ा 2021 के विधानसभा चुनावों में 80 के पार कर गया है. इसलिए ये तो साफ है कि बंगाल में खेल अभी खत्म नहीं हुआ है. बीजेपी ने बंगाल में अपनी जड़े मजबूत कर लीं हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: May 2, 2021, 5:45 PM IST
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पांच राज्यों के चुनावी नतीजों का अनुमान सही, लेकिन बंगाल का मंथन क्या कहता है ?
ममता बनर्जी की जीत तो यही बताती है कि बूथ मैनेजमेंट और चुनावी प्रबंधन में वो बाजी मार ले गयीं.
बंगाल छोड़ बाकी सभी राज्यों के नतीजे क्या कहते हैं, ये बेमानी हो गया है. क्योंकि बाकी सभी के नतीजे लोगों के जुबान पर थे. लेकिन बंगाल के नतीजों का पोस्टमार्टम जरुरी है क्योंकि केन्द्र की सत्तारुढ़ पार्टी बीजेपी ने पूरी ताकत झोंक दी थी और उन्हें भरोसा भी था कि वो सत्ता की दहलीज तक पहुंच ही जाएंगे. लेकिन हुआ ठीक इससे पलट. ममता दीदी की जड़ें कितनी मजबूत हैं इसका अंदाजा शायद बीजेपी आलाकमान नहीं लगा पाया या फिर कहीं को रणनीति मे चूक हो गयी. जीत का सेहरा बांधने के लिए तमाम दावेदार तैयार खड़े होते हैं लेकिन हार का कोई नामलेवा नहीं मिलता. इसलिए सिलसिलेवार ये जानना जरुरी है कि आखिर नतीजे बीजेपी आलाकमान के मन मुताबिक क्यों नहीं आए.

लोकतंत्र है और चुनावों मे हार जीत तो चलती ही रहती है लेकिन 2017 में विधानसभा की 3 सीटें और फिर 2019 मे लोकसभा की 18 सीटों से बढ़ते हुए बीजेपी का आंकड़ा 2021 के विधानसभा चुनावों में 80 के पार कर गया है. इसलिए ये तो साफ है कि बंगाल में खेल अभी खत्म नहीं हुआ है. बीजेपी ने बंगाल में अपनी जड़े मजबूत कर लीं हैं. ऐसे में जब कांग्रेस-लेफ्ट का नामलेवा तक नहीं बचा, तब बीजेपी ही बंगाल में ममता बनर्जी का एकमात्र विकल्प है. बीजेपी अब मुख्य विपक्षी दल के रुप में अब नए सिरे से जंग जारी रखेगी और यही रास्ता उन्हे 2024 लोकसभा चुनावो में 2019 के नतीजों को दोहराने में मदद करेगा. आलाकमान जानता है कि नतीजे ऐसे क्यों आए इसलिए हार स्वीकार कर विपक्ष के तौर पर सरकार पर निगरानी रखने का ऐलान कर बीजेपी जितनी जल्दी काम में जुट जाए उतना ही बेहतर.

इस हार में भी बीजेपी के लिए संदेश छुपा है वो ये कि तृणमूल कांग्रेस की हिंसा, भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने में बंगाल की जनता पीछे नहीं हटेगी. आखिर इसी हिंसा के डर से 2019 का लोकसभा चुनाव चुपचाप कमल छाप के नारे के साथ आगे बढा था. लेकिन अब बंगाल का आम आदमी भी जयश्रीराम का नारा लगाने से पीछे नहीं हट रहा है. यानि लोगों का डर मिटा है कि कोई पार्टी इस हिंसा का मुकाबला कर सकती है. इसी जज्बे को अगर बीजेपी बरकरार रख पाती है तो बंगाल की सत्ता के केन्द्र में भी वो बरकरार रह पाएंगे. आखिर जिन्होंने उन्हें वोट दिया है उन्हें भी तो बचा कर रखना है.

अब हार पर मंथन शुरु करें तो चंद बातें उभर कर सामने आतीं है
क्या बंगाली बनाम बाहरी का नारा पड़ा बीजेपी पर भारी

ममता बनर्जी ने बहुत सोच समझ कर इस नारे का सहारा लिया था. तभी तो पहले चार चरणों में बंगाल के चारों तरफ से सीटें जीतते जीतते भी बीजेपी जब आखिरी तीन चरणों में पहुंची तो यही मुद्दा भारी पड़ने लगा. बंगाली अस्मिता का जवाब शायद सोनार बांग्ला नहीं बन पाया. एक अनुमान के मुताबिक आखिरी तीन चरणों में ग्रेटर कोलकाता कहे जाने वाले इलाके में 90 से ज्यादा सीटें तृणमूल कांग्रेस ने जीत लीं. जहां भी अल्पसंख्यक और बंगाली वोटर थे वहां तृणमूल कांग्रेस का उम्मीदवार जीता. सवाल तो ये भी उठता है कि क्या माता को पूजने वाले बंगाली समाज को ध्रूवीकरण बांट नहीं पाया. लेकिन जवाब तो यही है कि ऐसा नहीं होता तो ममता बनर्जी को अपना गोत्र नहीं बताना पड़ता और न ही उन्हें मंत्रों का जाप करना पड़ता. कुल मिलाकर बीजेपी की पूरी कहानी वहीं आ फंसती है कि इतनी अच्छी शुरुआत के बाद उन्हें कौन सा करंट मार गया.

कोरोना के फेर में आखिरी तीन चरणों में अपनी योजना को मुकाम तक नहीं पहुंचा पाया बीजेपी आलाकमानबीजेपी ने जब कैंपेन शुरु किया था तब आदिवासी इलाकों, उत्तरी बंगाल, बिहार, झारखंड से लगी सीमा पर पूरा ध्यान देते हुए अपनी ताकत मजबूत करनी शुरू कर दी थी. चुनाव के पहले चार चरणों तक बीजेपी को अच्छा रिस्पांस मिला और नतीजा देश के सामने है कि उनके विधायकों की संख्या 80 के करीब हो गई. ग्रेटर कोलकाता इलाके में जहां बंगाल का भद्रलोक रहता है और विधानसभा सीटों की संख्या भी बाकी इलाकों से कहीं ज्यादा है, जब वहां घर घर प्रचार की योजना को अमली जामा पहुंचाया जाना शुरु करना था, तब कोरोना का कहर टूट पड़ा. एक तो कोरोना को लेकर लोगों में नाराजगी फैली तो दूसरी तरफ घर घर पहुंचने की योजना ही खटाई में पड़ गयी. तभी तो इन आखिरी तीन चरणों में बीजेपी को भारी नुकसान झेलना पड़ है.

कांग्रेस वोट कटुआ नहीं बनी

राहुल गांधी दूर केरल मे ही व्यस्त रहे. जहां एक बार फिर कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी. जब पांचवे चरण के बाद बंगाल जाने का मन बनाया तो कोरोना की मार पड़ गयी और मौका लगते कि उन्होने ऐलान कर दिया कि वो बंगाल में कोई रैली नहीं करेंगे. लेकिन जानकार बताते हैं कि अपनी हार से ज्यादा कांग्रेस की चाह थी कि पीएम मोदी हार का मुंह देखें. तभी तो कभी सत्ता में रही कांग्रस एक दो सीटों पर सिमट गयी क्योंकि उनके कार्यकर्ताओं ने बीजेपी को हराने के लिए अपने वोट तृणमूल की तरफ ट्रांसफर करा दिए. लेकिन पूरे कांग्रेस, वाम दलों और फुरफउराशरीफ के गठबंधन का सुपड़ा साफ होना बताता है कि इस बार वोटों का बंटवारा नहीं हुआ बल्कि वोटो के साथ खेला होबे.

तृणमूल कांग्रेस का चुनाव प्रबंधन बेहतर रहा

ममता बनर्जी की जीत तो यही बताती है कि बूथ मैनेजमेंट और चुनावी प्रबंधन में वो बाजी मार ले गयीं. तृणमूल कांग्रेस से बीजेपी जाने वाले नेताओं की कोई कमी नहीं थी लेकिन मंथन करें तो शायद यही सामने आएगा कि कार्यकर्ता के स्तर पर वो ट्रांसफर नहीं हो पाया. यहां तक ममता बनर्जी के विश्वस्त अधिकारियों की सही जगह पर नियुक्ति भी उनके पक्ष में गयी. चुनाव आयोग की तमाम सख्ती के बावजुद तृणमूल कांग्रेस के लिए रास्ता निकलता गया.

कांग्रेस का पतन जारी

वैसे हार का मंथन करने बैठे तो हजार बातें निकल कर सामने आ जाती हैं. बात बीजेपी की करने के बाद अब थोड़ा देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के हार की समीक्षा भी जरुरी है. तमिलनाडू में डीएमके की जीत पक्की थी और राहुल गांधी और कांग्रेस को वहां जाकर समय नहीं बिताना पड़ा. असमे में हारना तय था लिहाजा राहुल और प्रियंका इक्का दुक्का बार गए तो जरुर लेकिन छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री भूपेश बाघेल के हाथो में कमान छोड कर वापस निकल गए. लेकिन केरल का क्या हुआ. राहुल गांधी ने अपनी पूरी ताकत केरल में झोंक दी थी लेकिन लेफ्ट को रोक नही पाए.

केरल की बात

कायदे से तो केरल में तो कांग्रेस के लिए एक आसान जीत होनी चाहिए थी. आखिरकार दशकों से केरल लेफ्ट और कांग्रेस के बीच हर पांच साल के बाद सत्ता बदलता आया है. राहुल गांधी ने भी 2019 में वायनाड का एक आसान रास्ता ढूंढा था. दिल्ली आकर कोरोना पर मोदी सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले राहुल गांधी ने केरल मे दसियों रैलियां और रोड शो किए जिसमें कोरोना के तमाम प्रोटोकॉल को धता बताया गया. लेकिन केरल में नतीजा क्या निकला. कांग्रेस यहां भी लोगों का भरोसा जीतने में नाकाम रही. ये दर्शाता है कि वोटरों में भी कांग्रेस के स्टाइल का राजनीति रास नहीं आती है.

लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है. नतीजे आते ही अखिलेश यादव से लेकर तमाम विपक्षी नेताओं ने ममता बनर्जी को बधाई देनी शुरु कर दी है. ऐसा मौका जब भी आता है तो विपक्षी एकजुटता को बल मिलने लगता है. लेकिन मुश्किल वही कांग्रेस की है जो बीजेपी का विकल्प बन सकती है लेकिन अपनी धार खोती जा रही है. अगले साल यूपी समेत चार राज्यों में विधानसभा चुनाव है. इसलिए इस झटके से उबरते हुए बीजेपी आलाकमान यूपी फिर से के नारे पर आगे बढने की तैयारी में लग जाएगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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First published: May 2, 2021, 5:45 PM IST
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