OPINION: कृषि सुधारों के लिए मोदी सरकार का बिल और कांग्रेस का दोहरा मापदंड

विपक्ष इन कृषि बिल पर सवाल उठा रहा है. लेकिन पीएम मोदी ने बिहार की एक वर्चुअल रैली को संबोधित करते हुए ऐलान कर दिया कि न्यूनतम समर्थन मूल्य कभी नहींं हटने वाला और साथ ही ये अपील भी कर डाली कि किसान अफवाहों पर ध्यान नहीं दें.

Source: News18Hindi Last updated on: September 18, 2020, 9:22 PM IST
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OPINION: कृषि सुधारों के लिए मोदी सरकार का बिल और कांग्रेस का दोहरा मापदंड
कृषि बिल लोकसभा में पास हो गए. फाइल फोटो
भारत के गांवों में कृषि क्षेत्र में सुधारों को आगे बढाने वाले तीन बिलों को लेकर बवाल मचा हुआ है. कांग्रेस और उसको समर्थन देने वाली पार्टियां संसद के अंदर और बाहर इस बिल का पुरजोर विरोध कर रही हैं. इस पर चल रही राजनीति को हवा दे दी है बीजेपी के सबसे पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल ने. अकाली दल के कोटे से मत्री और पंजाब के पूर्व सीएम प्रकाश सिंह बादल की बहू हरसिमरत कौर बादल ने केन्दीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर सरकार के लिए मुश्किलें बढा तो दीं है, लेकिन पीएम मोदी ने आज बिहार की एक वर्चुअल रैली को संबोधित करते हुए ऐलान कर दिया कि न्यूनतम समर्थन मूल्य कभी नहींं हटने वाला और साथ ही ये अपील भी कर डाली कि किसान अफवाहों पर ध्यान नहीं दें. इससे पहले पीएम मोदी ने ट्वीट कर ये साफ भी कर दिया है कि ये कानून ऐतिहासिक है, जिससे किसानों को बिचौलियों और तमाम अवरोधों से मुक्त हो जाएगा. पीएम मोदी ने कहा कि इससे किसानों को उपज बेचने के नए नए अवसर मिलेंगे.

मोदी सरकार का दावा है कि The Farmers' Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Bill, 2020 और The Farmers (Empowerment and Protection) Agreement of Price Assurance and Farm Services Bill, 2020 के तहत किसानोंं को फसल और उससे जुडी चीजों की खरीद और बिक्री की आजादी होगी.  देश मेंं जहां भी उन्हे ज्यादा पैसा मिलेगा वहीं वो अपना सामन बेच सकेंगे. इसके लिए एक पारदर्शी बिना बाधा के अंतर्राज्यीय आवाजाही और बिक्री की सुविधा भी होगी. कुल मिला कर ई मंडियों और ई ट्रेडिंग के लिए एक ढांचा भी धीरे धीरे खड़ा हो जाएगा.उधर न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर लोकसभा मे पारित हुए बिल को लेकर गलत बाते फैलायी जा रहीं हैं. इस एमएसपी को रोकना तो दूर मोदी सरकार ने तो 2018 में ही किसानों की कुल लागत का डेढ गुना न्यूनतम समर्थन मूूल्य तय कर दिया था. साथ ही मोदी सरकार ने ये भी सुनिश्चित कर दिया था कि अच्छा मानसून हो या फिर कीमतों का चढना और गिरना या बाजार कि अनिश्चितताएं, एक निश्चित की गयी कीमत किसानों को मिल जाएगी.

सरकारी आंकडों के मुताबिक साल 2020 में ही खरीद केन्द्रों पर किसानों को मिल रही गेहूं, दाल, तिलहन की कीमतों में 1.5 फीसदी और 2.75 फीसदी बढोत्तरी हुई है. धान की कीमतों में 2014-15 के मुकाबले 2019 तक 59.2 फीसदी ज्यादा अनाज किसानों से खरीदा गया. पूर्व और पूर्वोत्तर के राज्यों से खरीफ की खऱीद 89.5 लाख मेट्रिक टन रही जिससे 18 लाखसे ज्यादा किसानों को फायदा हुआ. दाल का न्यूनतम समर्थन मूूल्य पिछले पांच सालों में 73 फीसदी बढा है ताकि हर रोज के खाने में दाल का इस्तेमाल हो सके और कुपोषण मुक्त भारत का मोदी सरकार का सपना साकार हो. गौरतलब है कि 2020 की किसानो से राबी फसलों की खरीद में गेहूं, धान, तिलहन और दाल को जोड दिया जाए तो कुल न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत किसानों को 113 करोड रुपये दिए गए. ये पिछले साल के मुकाबले 31 फीसदी ज्यादा हैं.

लोकसभा से पारित तीसरे विधेयक The Essential Commodities (Amendment) Bill, 2020[1]. से दाल, तिलहन, खाद्य़ तेल, प्याज, आलू जैसी की वस्तुओं को आवश्यक वस्तुओं की लिस्ट से हटा देगा ताकि निजी निवेशकों को व्यापार में अडचन नहीं आए. इस कानून से इन वस्तुओं के उत्पादन, जमा रखने, सप्लाई कों लेकर कारवाई नहीं हो पाएगी. सरकार का दावा है इससे कृषिक्षेत्र मे पूंजी  निवेश बढेगा. हालांकि इस बिल के संशोधन में ये कहा गया है कि बाढ, सूूखे, प्राकृतिक आपदा या फिर कीमते बहुत ज्यादा बढ जाने पर इन वस्तुओं को भी रेगुलेशन में लाया जा सकेगा. सरकार बार बार यही दावा कर रही है कि न तो न्यूनतम समर्थन मुल्य़ और ना ही एपीएमसी का प्रावधान हटाया गया है. ये सिर्फ किसानों को मजबूत करने और कृषि क्षेत्र में निजी निवेश बढाने में मदद करेगा.
लेकिन सरकार की नाराजगी इस बात को लेकर है कि कृषि सुधारों को लेकर कांग्रेस दोहरा मापदंड अपना रही है. कांग्रेस 2004 में यूपीए सरकार बनने से लेकर 2019 के लोकसभा चुनाव के घोषणा-पत्र तक में किसानों को खुला बाजार देने की वकालत करती रही. अब मोदी सरकार उन्हीं नीतियों को साकार कर रही है तो कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियां बिल विरोधी राग अलाप रही हैं. सरकार का दावा है कि 2004 मे यूपीए सरकार के सत्ता मे आने के बाद से ही उन्होंने ऐलान किया था कि फलों और सब्जियों को एपीएमसी मे संशोधन कर एक राज्य से दूसरे राज्य में भेजने वाली बाधाओं को दूर कर दिया जाएगा. 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस ने ऐलान किया था कि कांग्रेस शासित राज्य फलों और सब्जियों को एपीएमसी कानूनों से अलग नोटिफाई करेंगे. 2012 में यूपीए सरकार ने “Agricultural Produce Inter State Trade and Commerce (Development and Regulation) Bill 2012”, कृषि संबंधित वस्तुओं की आवाजाही के लिए एक बिल का ड्राफ्ट भी तैयार किया था लेकिन उस पर अमल नहीं कर पायी थी. सरकार का आरोप है कि जो कांग्रेस मुक्त व्यापार के लिए सभी बाधाएं दूर करना चाहती थी. उसी ने मोदी सरकार के किसान हित वाले बिल का विरोध कर अपनी दोहरी मानसिकता दिखा रही है.

सरकार ने दावा किया है कि किसानों की हितों की रक्षा के लिए इन बिलों में कई प्रावधान भी हैं.
*किसानों को वित्तिय सहायता देने वालों को जमीन का हक या फिर लीज का अधिकार नहीं मिलेगा और ना ही वो किसान की जमीन पर कोई बदलाव कर पाएगा.*किसानों के ऐसे समझौतों का बंटाई पर काम करे बंटाईदारों पर कोई असर नहीं होगा
*किसानों सिर्फ पेशगी में लिए पैसे और खेती मे हुए खर्च के लिए पैसा लगाने वालों के लिए जिम्मेदार होगा.
*किसानों की जमीन की कीमत पर कोई वसूली नहीं की जा सकेगी
*अगर स्पॉंसर अपने भुगतान में कोई गडबड़ी करता है तो उस पर 150 फीसदी का जुर्माना लगाया जा सकता है.

हो सकता है कि आढती व्यवस्था में फायदा उठा रहे व्यापारी या फिर बड़े किसानों को आने वाले दिन मुश्किल नजर आ रहे हों लेकिन सरकारी सूत्र बताते हैं कि ये बिल लाइसेंस, परमिट राज से मुक्ति पाने में किसानो की मदद करेगा. जिसमें न किसानों की फसलों की कीमतों से खेलने वाले बिचौलिये भी नहीं होंगे और किसानों को अपनी खेती और फसलों की बिक्री की स्वतंत्रता होगी. इसलिए पीएम मोदी समेंत पूरी मोदी सरकार की कोशिश यही है कि किसानों को इस बारे में फैलाए जा रहे दुष्प्रचार को रोका जाए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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First published: September 18, 2020, 3:55 PM IST
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