वो गांधी जिसने अंग्रेजों से आजादी के बाद भी 15 साल जेल काटी

खान अब्दुल गफ्फार खां पेशावर से कोलकाता तक फैले तत्कालीन भारत के सीमांत प्रांत और अब खैबर पख्तूनख्वा से आते थे. इन्हें लोग प्यार से बादशाह खान, पख्तूनजन बाचा खान और आजादी के तमाम सिपाही सरहदी या सीमांत गांधी पुकारते थे.

Source: News18Hindi Last updated on: October 2, 2020, 11:54 AM IST
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वो गांधी जिसने अंग्रेजों से आजादी के बाद भी 15 साल जेल काटी
महात्मा गांधी के साथ खान अब्दुल गफ्फर खां ऊर्फ सीमांत गांधी
अंग्रेजों की कुल 15 साल जेल काटने वाले एक गांधी ऐसे भी थे, जिन्होंने उनसे आजादी मिलने के बाद भी पूरे 15 साल कैद भुगती. यह अनूठे स्वतंत्रता सेनानी थे सरहदी गांधी जिनकी अहिंसा से डर कर पाकिस्तान सरकार ने पूरे 15 साल कैद करके रखा. पाकिस्तान के बारे में सरहदी गांधी की राय स्पष्ट थी कि उससे मित्रता संभव ही नहीं थी. उनके अनुसार अंग्रेजों की कृपा से पाकिस्तान की बुनियाद ही घृणा पर रखी गई है. वे कहते थे कि पाकिस्तान की घुट्टी में घृणा, ईर्ष्या,द्वेष, वैमनस्य आदि दुर्भाव मिले हुए हैं. इसलिए उससे भाईचारे की उम्मीद कैसे की जाए. उनकी राय में अंग्रेजों ने पाकिस्तान इसलिए बनाया ताकि हिंदू—मुसलमानों के बीच हमेशा दंगे होते रहे.

इनका नाम हालांकि खान अब्दुल गफ्फार खां था. यह पेशावर से कोलकाता तक फैले तत्कालीन भारत के सीमांत प्रांत और अब खैबर पख्तूनख्वा से आते थे. इन्हें लोग प्यार से बादशाह खान, पख्तूनजन बाचा खान और आजादी के तमाम सिपाही सरहदी या सीमांत गांधी पुकारते थे. इन्होंने महात्मा गांधी से आजादी और अहिंसा का ऐसा सबक सीखा कि पख्तूनों को जमा करके खुदाई खिदमतगार आंदोलन छेड़ दिया. वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की सैन्य टुकड़ी ने पेशावर में इन्हीं पख्तूनों की अहिंसक टोली पर गोलीबारी के अपने अंग्रेज अफसर की हुक्म उदूली करके आजादी के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया था.

इन्होंने पठानों को अहिंसा की ऐसी शपथ दिलाई कि उन्होंने अंग्रेजों द्वारा दो राउंड गोलीबारी में अपने दर्जनों साथी स्वतंत्रता सेनानियों की हत्या के बावजूद हथयार नहीं उठाया. अंतत: गढ़वाली सिपाहियों की आत्मा ने उन्हें कचोटा, तो उन्होंने निहत्थे पठानों पर और गोलियां चलाने से इनकार करके सजा भुगती. बादशाह खान ने इन्हें खुदाई खिदमतगार बना कर पठानों के बीच व्याप्त समाजिक बुराइयों और अंग्रेज शासन विरोधी गतिविधियों से जोड़ा. खुदाई खिदमतगारों के अहिंसक दस्ते ने ही साल 1946 में अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को सीमांत प्रांत के दौरे में अंग्रेज लाटसाब और मुस्लिम लीग की मिलीभगत से हुए सशस्त्र हमले में सुरक्षित बचाया था. हमले के दौरान पंडित नेहरू की ढाल बने सात फुटिए बादशाह खान पर बरसे पत्थरों से उनका हाथ टूट गया था. इसके बावजूद उन्होंने और साथी खुदाई खिदमतगारों ने लाखों लोगों के जलसे में पंडित नेहरू का भाषण करवाया.

सरहदी गांधी का ही प्रभाव था कि 1946 के अंतरिम चुनावों में बंगाल का चुनाव मुस्लिम लीग के हाथों हारने वाली कांग्रेस सुदूर मुस्लिम बहुल उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांत में बहुमत पाकर सरकार चला रही थी. वहां अंग्रेज सरकार द्वारा अनियमितताओं और मंदिर—मसजिद पर पृथकतावादी प्रचार करने के बावजूद मुस्लिम लीग बुरी तरह चुनाव हारी थी. बादशाह खान ने देश के बटवारे को मंजूरी देने वाली जून 1947 की दिल्ली में कांग्रेस कार्यसमिति बैठक में भी हिंदुस्तान को तोड़ कर पाकिस्तान बनाने का पुरजोर विरोध किया था.
गांधी का कहना था कि नफरत तथा दिलों और साझा विरासत के बंटवारे पर बनने वाला देश पठानों को कभी कबूल नहीं करेगा. उनकी मांग थी कि जबान और ईमान के पक्के तथा दिल के साफ पठानों के लिए अलग पख्तूनिस्तान बनाया जाए. उन्होंने पृथक पख्तूनिस्तान के गठन के लिए कांग्रेस का समर्थन मांगा मगर उनकी बात पर किसी ने कान नहीं धरा.

सरदार पटेल ने जब कार्यसमिति में भारत के बटवारे और प्रभुतासंपन्न पाकिस्तान के गठन के प्रस्ताव के समर्थन में जोरदार तकरीर की, तो उन्होंने रूंधे गले से उसे पख्तूनों के अंधकारमय भविष्य का प्रतीक बताया. बादशाह खान ने कार्यसमिति द्वारा सीमांत प्रांत में पाकिस्तान में शामिल होने के प्रश्न पर रायशुमारी स्वीकार करने के प्रस्ताव का भी पुरजोर विरोध किया. उनका कहना था कि सीमांत प्रांत की अवाम मुस्लिम लीग को चुनाव में निर्णायक शिकस्त और कांग्रेस को बहुमत देकर जब अपनी राय साफ कर चुकी तब जनमत संग्रह को स्वीकृति देना अंग्रेजों और लीग के शिकंजे में फंसना है. उनके अनुसार साल भर पहले हुए चुनाव में भारत—पाकिस्तान का ही प्रश्न था और उसमें मतदाता लीग को नकार चुके. इसके बावजूद सरदार पटेल और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के आग्रह पर कार्यसमिति ने बटवारे और जनमत संग्रह को मंजूर कर लिया.

इस पर उन्होंने कार्यसमिति और महात्मा गांधी से कहा,'' हम पठान आप लोगों के साथी हैं और हमने भारत की आजादी के लिए बहुत बलिदान किए हैं. लेकिन आप लोगों ने हमें मझधार में छोड़ कर भेड़ियों के हवाले कर दिया. चुनाव में हिंदुस्तान—पाकिस्तान के प्रश्न पर पख्तून हमें भारी बहुमत से जिताकर पूरी दुनिया को अपना अभिमत स्पष्ट सुना चुके. इसलिए हम जनमत संग्रह नहीं चाहते. दूसरी बात ये कि हमें तो भारत ने छोड़ दिया है तब हम हिंदुस्तान और पाकिस्तान के प्रश्न पर जनमत संग्रह क्यों करें? इसलिए यदि मुस्लिम लीग हमारे साथ जनमत संग्रह करना चाहती है तो 'पख्तूनिस्तान और पाकिस्तान के प्रश्न पर करे.'' इसे उन्होंने विश्वासघात तो नहीं कहा मगर पठानों को कांग्रेस द्वारा मझधार में छोड़ने का मलाल उन्हें जिंदगी भर रहा.
उनका कहना था कि यदि वे अंग्रेजों की बात मानकर पहले ही कांग्रेस छोड़ देते तो वो उन्होंने सब कुछ देकर जाते. उनका कहना था कि यदि गांधी जी की हत्या न होती तो उनके समर्थन से शायद पठानों को स्वतंत्र पख्तूनिस्तान मिल ही जाता. उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति के इन फैसलों को अपने लिए मृत्यु के फैसले बताया है. स्वतंत्र पाकिस्तान की सरकार ने खुदाई खिदमतगारों के कत्लेआम से लेकर बादशाह खान समेत तमाम नेताओं की जायदाद हड़पने जैसी दमनात्मक कार्रवाई करके उनकी आशंकाओं को सोलह आने सच साबित किया.

उनके आजीवन कांग्रेस का साथ देने और मुस्लिम लीग के विरोध तथा पख्तूनों के जज्बे से चिढ़ी पाकिस्तान सरकार ने इसीलिए फ्रंटियर गांधी को किसी न किसी बहाने पूरे डेढ़ दशक कैद में ही रखा. पख्तून आज भी पाकिस्तान में बराबरी की लड़ाई लड़ रहे हैं. आजादी से पहले भी बादशाह खान को महात्मा गांधी और कांग्रेस के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मुहिम में शामिल होने के आरोप में पूरे 15 साल फिरंगियों ने कैद में रखा था. बादशाह खान 1919 में रॉलेट ऐक्ट के विरोध में छिड़े आंदोलन में महात्मा गांधी के शिष्य बने थे और आजीवन अहिंसा, सत्याग्रह तथा सांप्रदायिक एकता के लिए समर्पित रहे.

गांधी जी से प्रभावित होकर ही उन्होंने 1928 में 'पश्तून' नाम से अखबार निकाला. पश्तो भाषा के अखबार पश्तून को पठानों के बीच वही दर्जा मिला जो कि गांधी के 'हरिजन' अखबार का था. अफसोस यह है कि आजादी की लड़ाई तेज होने पर अंग्रेजों ने जिस तरह पश्तून पर रोक लगाई ठीक उसी तरह आजादी के बाद पाकिस्तान सरकार ने भी उसे नहीं छपने दिया. पाकिस्तान बनने पर बादशाह खान ने हालांकि खुद को पाकिस्तानी कबूल करके पख्तूनों से शांतिपूर्वक अपने देश की तरक्की के लिए जुटने की अपील की मगर सरकार उनके पीछे पड़ी रही.उन्हें तो पूरे 15 साल बंदी बनाए ही रखा उनके बेटे वली खां को भी जेल में डाल दिया.

उनकी धर्मादा संस्थाओं और दल पर भी रोक लगा दी. उनके अनुसार पाकिस्तान की सरकार ने उन पर ऐसे जुल्म किए जो काफिर फिरंगियों ने भी नहीं किए थे. फिरंगियों ने पख्तूनों के घरों को नहीं लूटा था मगर आजाद मुल्क की सरकार ने उनके घरों को लूट लिया. अंग्रेजों के मुकाबले पाकिसतान सरकार ने उनके जलसों और समाचार पत्रों पर स्थाई रोक लगा दी. पख्तून महिलाओं पर हाथ डालने की फिरंगियों की कभी मजाल नहीं हुई मगर इसलामी सरकार ने उन्हें भी सरेआम अपमानित किया. आजाद सरकार ने कुरान सिर पर रखे मसजिद में नमाज पढ़ने जाते पठानों पे गोलियां चलवाईं.


बादशाह खान के अनुसार अंग्रेजों ने राजनीतिक कैदी होने के कारण उन्हें कभी सश्रम कारावास की सजा नहीं सुनाई और न ही उन पर जुर्माना किया. इसके उलट पाकिस्तानी निजाम ने उन्हें कैद बामशक्कत सजा दी और हमेशा जुर्माना भी लगाया. एक बार तो उनकी 50 हजार रुपये मूल्य की जायदाद पाकिस्तान सरकार ने 15 हजार रुपये जुर्माने के एवज में कुर्क कर ली. उनके अनुसार पाकिस्तानी जेलों में उनकी कोठरी में रात को हमेशा बत्ती गुल कर दी जाती था. जेल में बीमार पड़ने पर उनका इलाज ही नहीं कराया गया, जिससे उनके गुर्दे खराब हो गए. उनके अनुसार सिंध वाले हैदराबाद जेल में उन्हें तनहाई में बंद किया गया और वह अंधेरी कोठरी थी.

उसमें उनके गुर्दों में संक्रमण से पांव सूज जाने पर भी पंजाबी जेलर ने उनका समुचित इलाज नहीं होने दिया. उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्हें लाहौर जेल और फिर मिंटगुमरी जेल में कोठरी में बंद किया गया. उनके अनुसार इससे उनकी गुर्दों की तकलीफ और बढ़ गई मगर जेल प्रशासन ने कभी ठीक से इलाज नहीं होने दिया. वे कहा करते थे कि अंग्रेजों ने तो इसलिए बंदी बनाया, क्योंकि वे हिंदुस्तानियों के दुश्मन थे, लेकिन पाकिस्तानी सरकार तो उनकी अपनी इस्लामी सरकार थी. फिर क्यों उन्हें और हजारों खुदाई खिदमतगारों को बंदी बनाया गया इसे वे आजीवन समझ नहीं पाए.

वे पाकिस्तान की सरकारों को सुलह—सफाई का घोर विरोधी बताते हुए उन पर हड़बोंग मचाने और जिहाद के नकली नारों से जनता को काबू में रखने का आरोप लगाते थे. आजादी का यह मसीहा हिंदुस्तान और पख्तूनों की आजादी के लिए पूरे तीन दशक जेल की सलाखों के पीछे काटने के बावजूद अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करते हुए 20 जनवरी 1988 को 98 साल की उम्र में दुनिया से रूखसत हो गया.
ब्लॉगर के बारे में
अनंत मित्तल

अनंत मित्तलवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार,लेखक,अनुवादक हैं. प्रिंट, रेडियो, टीवी एवं डिजिटल पत्रकारिता का लंबा अनुभव. जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, पीटीआई भाषा, दूरदर्शन आदि समूहों में संपादन, रिपोर्टिंग,प्रोडक्शन संबंधी कार्य किया है.

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First published: October 2, 2020, 11:54 AM IST
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