OPINION: बिहार में जातिगत चुनावी व्यूह रचना पर विकास और रोजगार की चाशनी

Bihar assembly election 2020: चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में तो मुख्यमंत्री के लिए लोगों की पसंद में नीतीश और तेजस्वी के बीच महज चार फीसद फासला बचा है. नीतीश को ज 31 फीहांसद मतदाता सातवीं बार मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं, वहीं तेजस्वी को 27 फीसद पहली बार सदरे रियासत चुनना चाहते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: October 26, 2020, 7:55 PM IST
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OPINION: बिहार में जातिगत चुनावी व्यूह रचना पर विकास और रोजगार की चाशनी
बिहार चुनाव तीन चरणों में हो रहा है.
सामाजिक न्याय और जाति तोड़ो आंदोलन की जीवंत प्रयोगशाला माने जाने वाले बिहार की जमीनी हकीकत आज भी जाति, धर्म और ऊंच-नीच ही है. तभी तो राज्य में 21वीं सदी के पांचवें विधानसभा चुनाव में जातीय और जीतने की क्षमता के आधार पर उम्मीदवार खड़े करने के बाद सभी दल चुनावी विमर्श पर रोजगार, शिक्षा, शहरी विकास, महिला स्वावलंबन जैसे तरक्कीयाफ्ता मुद्दों की चाशनी चढ़ाने में जुटे हैं. तो क्या आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी द्वारा बिहार की गरीबी, छुआछूत और सांप्रदायिक वैमनस्य से लड़ने की मुहिम, उपवास एवं पदयात्राओं पर देश के कथित लोकतांत्रिक दलों ने पानी फेर दिया?

बीजेपी, कांग्रेस, आरजेडी, जेडीयू सहित देशव्यापी और प्रादेशिक दलों ने अपने उम्मीदवार इलाकावार जातीय समीकरणों के आधार पर खड़े किए हैं. दूसरा आधार उम्मीदवारों की जिताऊ क्षमता है फिर भले ही वो जघन्य अपराधी हों. इसके बावजूद अपने भाषणों एवं चुनावी वायदों से यह दल आम जनता की रोजमर्रा की जरूरतों, तकलीफों और असुरक्षा दूर करने के उपाय सुझाकर चुनावी विमर्श बदलने का भ्रम पैदा करना चाह रहे हैं.

चुनावी विमर्श बदलने की शुरुआत आरजेडी-कांग्रेस और वामदलों के महागठबंधन द्वारा दस लाख स्थाई नौकरियां और पांच लाख संविदा शिक्षकों को वेतनवृद्धि देने के चुनावी वायदे से हुई है. बीजेपी ने भी 19 लाख नौकरियां देने का जवाबी दांव चला है. उसमें सरकारी नौकरियों की संख्या पांच लाख है. बाकी नौकरियां निजी क्षेत्र एवं सामुदायिक कल्याण योजनाओं के बूते पैदा करने का वायदा है. नरेंद्र मोदी की साख भी राज्य में एनडीए के मुख्यमंत्री उम्मीदवार नीतीश कुमार के मुकाबले अभी तक मतदाताओं के मन में कई गुना ज्यादा है. चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के अनुसार नीतिश कुमार की लोकप्रियता का ग्राफ साल 2015 की तुलना में लगभग आधा रह गया है.

सीएसडीएस—लोकनीति के चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में तो मुख्यमंत्री के लिए लोगों की पसंद में नीतीश और तेजस्वी के बीच महज चार फीसद फासला बचा है. नीतीश को ज 31 फीहांसद मतदाता सातवीं बार मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं, वहीं तेजस्वी को 27 फीसद पहली बार सदरे रियासत चुनना चाहते हैं. इनसे कहीं अधिक 61 फीसद मतदाताओं ने प्रधानमंत्री मोदी की साख पर भरोसा जताया है. इसी सर्वेक्षण का और महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि राज्य के 20 फीसद मतदाता बेरोजगारी को महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा मान रहे हैं. बीते जून महीने में जारी सावधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में बेरोजगारी दर 2018—19 में 9.8 फीसद रही है, जिसमें लाखों प्रवासियों की घरवापसी के बाद कई गुना बढ़ोतरी होना स्वाभाविक है.
इसमें शक नहीं है कि प्रवासियों को देर से ही सही विभिन्न प्रदेशों से बिहार में उनके गांव पहुंचाने में केंद्र एवं राज्य सरकार ने मदद की, लोगों को छठ तक रियायती राशन तथा नकद सहायता भी सरकार ने दिए हैं. महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार योजना में मजदूरी दर बढ़ाकर घर लौटे कामगारों को रोजगार देने की भी कोशिश हुई. इसके बावजूद प्रधानमंत्री मोदी और तेजस्वी यादव की सभाओं में उमड़ती भीड़ जता रही है कि रोजगार के वायदे से मतदाता खासे आकर्षित हो रहे हैं. फिर भी नेताओं के चुनावी भाषणों में सांप्रदायिक एवं जातीय ध्रुवीकरण के संदेश तो खत्म नहीं हुए. बिहार में रोज़गार, बिहारी अस्मिता, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के मुद्दे महागठबंधन से जातीय पहचान की पार्टियों, 'हम', 'वीआईपी' और 'रालोसपा' की निकासी से उछल तो पाए हैं.

उन दलों को एनडीए और दीगर गठबंधनों ने भी जोड़ लिया मगर महागठबंधन में तीनों कम्युनिस्ट पार्टियों एवं कांग्रेस को जो ज़्यादा सीट मिलीं उनका उन्होंने क्या सार्थक उपयोग किया? उनके जरिए आरजेडी और कांग्रेस ने बीजेपी और जेडीयू के जातीय समीकरणों की बराबरी करने भर की कोशिश की! अलबत्ता बीजेपी के मानस पुत्र समझे जा रहे एलजेपी अध्यक्ष विराग पासवान जरूर जातिमुक्त बिहार और बिहार फर्स्ट—बिहारी फर्स्ट का नारा बुलंद कर रहे हैं. यह दीगर है कि उन्होंने भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुकाबले के लिए जेडीयू उम्मीदवारों की जातीय काट वाले उम्मीदवार ही दिए हैं.

बिहार विधान सभा चुनाव में जाति की प्रधानता के दो प्रमुख सबूत इस बार सभी दलों द्वारा अगड़ों और अति पिछड़े उम्मीदवारों पर भी खुल कर दाव लगाने से स्पष्ट हो रही है. अपने मूल जनाधार जैसे बीजेपी के सवर्ण और आरजेडी के यादव उम्मीदवारों को थोक टिकट देने के बावजूद चारों प्रमुख दलों ने अगड़ों और सर्वाधिक पिछड़ों के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए उन्हें पहले से अधिक संख्या में प्रत्याशी बनाया हैं. आरजेडी ने अपने मूल जनाधार एम—वाय यानी मुस्लिम—यादव समीकरण के बावजूद अति पिछड़ों को अल्पसंख्यकों से अधिक संख्या में 24 सीट पर उम्मीदवार बनाया है. कांग्रेस के आठ उम्मीदवार अति पिछड़े हैं.जेडीयू के कुल 122 उम्मीदवारों में 19 अति पिछड़े हैं. बीजेपी ने भी पांच अति पिछड़े उम्मीदवारों के साथ ही मल्लाह बहुल वीआईपी पार्टी को भी 11 सीट अपनी कुल 121 सीटों में से दी हैं. अति पिछड़ी जातियों के वोट बैंक में 114 जाति शामिल है. इनमें 86 हिंदू और 30 मुस्लिम जातीय समूह हैं. इनकी आबादी राज्य भर में फैली होने के बावजूद कुल मिलाकर 25 प्रतिशत है. इनमें मल्लाह अथवा निषाद एवं धानुक जातियां अपेक्षाकृत अधिक संख्या में तथा संगठित हैं. अनेक सीट पर अति पिछड़े निर्णायक वोटर हैं. इसी तरह आरजेडी के कुल 144 प्रत्याशियों में 58 यादव उम्मीदवार हैं. कुल 15 फीसद मतदाता समूह यादवों पर डोरे डालने में इस बार बार बीजेपी भी 14 और जेडीयू 17 उम्मीदवारों के साथ पीछे नहीं हैं. बीजेपी के कुल 121 उम्मीदवारों में 50 प्रत्याशी सवर्ण हैं. कांग्रेस ने भी अपनी 70 सीटों में से 32 सीट और आरजेडी ने एक दर्जन सीट पर सवर्णों को उम्मीदवार बनाया है.

राज्य के कुल मतदाताओं में 16 फीसद अनुसूचित जातियों के मत पाने के लिए आरजेडी ने 15 और कांग्रेस एवं बीजेपी ने 12—12 दलित प्रत्याशी उतारे हैं. ज्यादती में मारे जाने वाले दलित के परिवार से एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी और मुआवजा तथा बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने की घोषणा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा चुनाव अधिसूचना से ऐन पहले की गई है. इससे आजादी के 73 साल बाद भी बिहार में फैले जातीय वैमनस्य और भेदभाव का सहज अंदाजा लगता है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक 2014 में अनुसूचित जातियों पर अपराध के मामले में बिहार देश में तीसरे नंबर पर था. आबादी की तुलना में दलितों के प्रति सर्वाधिक अपराध बिहार में ही दर्ज हैं. देश में अनुसूचित जातियों की कुल आबादी में से आठ फीसद लोग बिहार में रहते हैं, जबकि इन जातियों से ज्यादतियों के कुल मामलों में 25 फीसद अपराध भी इसी राज्य में हुए हैं. महिलाओं को राजद—कांग्रेस ने मिलकर दो दर्जन और जेडीयू—बीजेपी ने 35 सीट पर उतारा है. कांग्रेस—आरजेडी के 29 और जेडीयू के 11 अल्पसंख्यक उम्मीदवार हैं जबकि बीजेपी ने इस तबके से किसी को नहीं उतारा. कांग्रेस ने एक दर्जन उम्मीदवारों को पहली बार चुनाव मैदान में उतारा है तो बीजेपी ने 30 उम्मीदवारों को पहला मौका दिया है. आरजेडी और जेडीयू ने अधिकतर पुराने अखाड़ेबाजों पर दाव लगाया है. कांग्रेस के 20 उम्मीदवार 40 से 45 वर्ष उम्र के हैं जिसे पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का दखल माना जा रहा है.

आरजेडी और जेडीयू ने पिछड़ों को अधिक संख्या में उम्मीदवार बनाया है. आरजेडी के 58 यादव, आठ कुशवाहा और सात वैश्य उम्मीदवार हैं. जेडीयू ने 17 यादवों सहित अपनी कुल 122 सीटों में 77 प्रत्याशी पिछड़े,दलित और अल्पसंख्यकों जैसे वंचित वर्गों से उतारे हैं. बीजेपी ने 15 वैश्य एवं 14 यादव सहित करीब 40 पिछड़ों को उम्मीदवारी दी है.
जातिवाद से सबसे बुलंद आलोचक बाबासाहेब आंबेडकर और डॉ. राममनोहर लोहिया, दोनों ही भारतीय समाज की आर्थिक गतिहीनता, सांस्कृतिक अधःपतन और बाहरी शक्तियों के मुकाबला करने में असमर्थता जैसी कमजोरियों के लिए जाति व्यवस्था को जिम्मेदार मानते थे. दोनों ही यह मानते थे कि जातिवाद ही प्रगति, नैतिकता, प्रजातांत्रिक सिद्धांतों और परिवर्तन का विरोधी है. आंबेडकर ने श्रम विभाजन,नस्लीय शुद्धता जैसी जातीय व्यवस्था को सही ठहराने वाली धारणा का खंडन किया. उनका तर्क था कि जाति से आर्थिक दक्षता में वृद्धि नहीं होती. जाति, नस्ल में सुधार नहीं कर सकती और ना ही उसने ऐसा किया है. जाति ने सिर्फ समाज का विघटन करके उनका मनोबल तोड़ा है.

इसके बावजूद बिहार में हरेक राजनीतिक दल द्वारा जातीय व्यूहरचना से साफ है कि विपक्षी महागठबंधन और सत्तारूढ़ एनडीए सहित विभिन्न दल बिहार चुनाव में खुलेआम जातिगत कार्ड खेल रहे हैं. इस कारण अबकी बार पहले से कहीं अधिक गहराई से मत विभाजन तथा चुनावी परदिृश्य धुंधला होने वाला है. ताज्जुब ये कि सभी चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों ने पक्ष—विपक्ष के लिए मत प्रतिशत एवं विजित सीटों का आंकलन करते समय इस महत्वपूर्ण तथ्य को सरासर नजरअंदाज कर दिया. इसी वजह से चुनाव विश्लेषकों को बिहार में इस बार जाति पर मतदाताओं की जरूरतों के हावी होने का भ्रम हो रहा है.
(ये लेखक के निजी विचार )
ब्लॉगर के बारे में
अनंत मित्तल

अनंत मित्तलवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार,लेखक,अनुवादक हैं. प्रिंट, रेडियो, टीवी एवं डिजिटल पत्रकारिता का लंबा अनुभव. जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, पीटीआई भाषा, दूरदर्शन आदि समूहों में संपादन, रिपोर्टिंग,प्रोडक्शन संबंधी कार्य किया है.

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First published: October 26, 2020, 7:55 PM IST
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