अपना शहर चुनें

  • No filtered items

राज्य

बिहार चुनाव: युवा वोटरों की आकांक्षा का नैरेटिव क्या मिटा पाएगा आर्थिक विषमता

मौजूदा चुनाव को अंतिम पारी बताकर नीतीश कुमार ने अप्रत्याशित दाव चला है. इसे उनकी तरफ से बीजेपी के लिए चेतावनी भी माना जा सकता है और तीसरे एवं निर्णायक दौर में अल्पसंख्यकों, महिलाओं एवं अति पिछड़ों के सहानुभूति वोट बटोरने की कोशिश तो ये साफ तौर पर है ही.

Source: News18Hindi Last updated on: November 7, 2020, 2:57 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
बिहार चुनाव: युवा वोटरों की आकांक्षा का नैरेटिव क्या मिटा पाएगा आर्थिक विषमता
(सांकेतिक तस्वीर)
युवाओं में जागरूकता से पैदा हुई आर्थिक तरक्की की आकांक्षा और प्रौद्योगिकी दो प्रमुख कारक बिहार के इस विधानसभा चुनाव के नैरेटिव और पार्टियों के वायदों से उभर कर सामने आए है. कम से कम कस्बों और शहरों में तो युवा अब बिजली-सड़क-पानी से आगे बढ़कर शिक्षा और रोजगार मांग रहे हैं. यह आकांक्षा प्रदेश के 51 फीसद युवा वोटरों के भीतर स्मार्ट फोन प्रौद्योगिकी ने जगाई है. ताज्जुब यह कि डिजिटल इंडिया का सपना दिखाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिन तेजस्वी यादव को 'जंगलराज का युवराज' कहते रह गए उसी आठवीं पास ने राज्य के युवाओं को रोजगार के मुद्दे पर बिजली की तेजी से लामबंद कर दिया.

नौकरियों का मुद्दा युवाओं द्वारा हाथोंहाथ लपकने का कारण बिहार के युवाओं में बेरोजगारी की दर फरवरी 2019 से ही 55 फीसद होना है. राज्य के रोजगाररत 87 फीसद लोग अस्थाई रोजगार में फंसे हैं. उनके पास नियमित वेतन वाली नौकरी नहीं है. गरीबी का आलम यह है कि बिहार की प्रति व्यक्ति औसत आमदनी राष्ट्रीय औसत की महज एक-तिहाई है. जहां 2019-20 में भारत की कुल प्रति व्यक्ति आमदनी 1,34,226 रूपए सालाना थी वहीं बिहार की प्रति व्यक्ति आय 46,664 रूपए ही रही. महज 3,888 रूपए औसत मासिक आय के बूते बिहार का बाशिंदा अपने परिवार का पेट कैसे भरेगा? इसीलिए लोगों को दूसरे राज्यों में रोजगार करने जाना पड़ता है. नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए का 12 साल लंबा शासन उन्हें पेट भरने लायक रोजगार भी नहीं दे पाया! यह दर अन्य राज्यों के मुकाबले सबसे कम है.

इसीलिए खेत में जीतोड़ मेहनत के बावजूद राज्य के 42 फीसद सामान्य किसान और 86.7 फीसद सीमांत किसान कर्ज में डूबे हैं. सभी राज्यों में कृषि पर औसतन 7 फीसद खर्च के मुकाबले बिहार में कृषि बजट उससे आधा यानी 3.5 फीसद ही है. ताज्जुब ये कि फिर भी तेजस्वी को अनुभव से पैदल बताकर नीतीश और सुशील मोदी ने उनके 10 लाख नौकरी देने के वायदे को खारिज करने में कसर नहीं छोड़ी. हालांकि बीजेपी ने भी 19 लाख रोजगार देने का वायदा करके नहले पे दहला जड़ने की कोशिश की. महागठबंधन ने सीधे 10 लाख सरकारी नौकरियों की मंजूरी मंत्रिमंडल की पहली बैठक में देने का वायदा उछाल कर युवाओं के बीच रोजगार को ही मुख्य मुद्दा बनवा दिया. फिर पांच लाख से ज्यादा संविदा शिक्षकों को समान काम के लिए समान वेतन तथा अन्य जमीनी स्कीमों के कार्यकर्ताओं का मानदेय एवं विधवा एवं बुजुर्ग पेंशन बढ़ाने तथा किसानों का कर्ज माफ करने का वायदा भी महागठबंधन ने किया है. एनडीए को चुनाव में जोरशोर से उतरे दूसरे युवा चिराग पासवान की एलजेपी से भी नुक्सान होने की आशंका है.

चिराग ने उसी एनडीए के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोले रखा जिसके वे केंद्र में हिस्सेदार हैं. उनके द्वारा अपने अधिकतर उम्मीदवार जेडीयू के विरूद्ध खड़े करने से उनकी कमर पर बीजेपी का हाथ होने का संदेश भी नीतीश समर्थकों के बीच गया. इसलिए जेडीयू समर्थकों द्वारा भी बीजेपी उम्मीदवारों से चुप्पा भितरघात की आशंका के बीच अंतिम दौर में सात अक्टूबर को राज्य की 78 विधानसभा साटों पर मतदान है. इनमें जेडीयू 37 सीट पर, आरजेडी 46, कांग्रेस 25, बीजेपी 35, सीपीआईएमएलएल 5, सीपीआई 2, वीआईपी 5 एआईएमआईएम 20 और हम एक सीट पर चुनाव लड़ रही हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतिम दौर के लिए चिट्ठी लिखकर मतदाताओं से जिस तरह नीतीश के  नेतृत्व में फिर से सरकार बनाने की अपील की है उससे साफ है कि एनडीए में मतदाताओं के रूख पर चिंता है. उपर से नीतीश ने भी अपना आखिरी चुनाव बताकर इसी चिंता का इजहार किया है. हालांकि चिराग पासवान ने लोगों से ऐसे नेता को खारिज करने को कहा जो पांच साल बाद हिसाब देने से अभी से ही भाग रहा है. इसी तरह तेजस्वी ने अपना मुकाबला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से होने का बयान दिया है जिसे अल्पसंख्यकों को महागठबंधन के पीछे लामबंद किया जा सके.

देखना यह है कि तेजस्वी का युवाओं के लिए 10 लाख नौकरियों और अन्य वर्गों के लिए आर्थिक स्वावलंबन का एजंडा बिहार में आगामी चुनावों की रंगत बदल पाएगा? इससे पिछड़ों के आर्थिक उन्नयन की शुरूआत हो पाएगी? क्या महागठबंधन को चुनाव से पहले ही यह अहसास हो गया था कि चुनाव में अपनी अहमियत जता चुके पिछड़ों की आर्थिक स्थिति आज भी अगड़ों के मुकाबले बेहद खराब है? खेती की जमीन से लेकर राज्य की नौकरशाही तक अगड़ों का दबदबा 30 साल पिछड़ी जाति का मुख्यमंत्री रहने के बावजूद कायम है.

सरकारी नौकरियों में आरक्षण से उनमें पिछड़ों को संख्या बढ़ने का लाभ तो हुआ है. भारत के मानव विकास सर्वेक्षण 2011-12 के अनुसार वेतनभोगी नौकरियों में यादवों की भागीदारी 10 फीसद, कुर्मियों की नौ फीसद, पासवानों की 8.9 फीसद और जाटवों की 7.7 फीसद है. अलबत्ता आला नौकरशाही में 70 फीसद से अधिक अफसर अगड़ी जातियों के ही हैं. साल 2009 के एक सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में भूमिहारों के पास यादवों के मुकाबले दोगुनी और अति पिछड़ी जातियों के मुकाबले चार गुना अधिक जमीन है. जमीन की अहमियत बिहार में अधिक इसलिए है क्योंकि राज्य में करीब 89 फीसद ग्रामीण क्षेत्र है.ऐसे में महागठबंधन द्वारा खोले गए रोजगार के पिटारे में दरअसल पिछड़े, अति पिछड़े और दलित युवाओं को बिहार के वास्तविक एवं त्वरित विकास की नई कुंजी दिखाई दे रही है. यूं भी राज्य में 18 से 39 वर्ष के वोटरों की संख्या 50 फीसद से अधिक है. इनमें वो मेहनती युवतियां भी शामिल हैं जो साल दर साल राज्य और केद्र के विभिन्न शैक्षिक और प्रतियोगी परीक्षा बोर्डों की परीक्षाओं में युवकों से लगातार बेहतर नतीजा पा रही हैं.

क्या बिहार की बेटियों को राज्य के भीतर सरकारी अथवा अन्य सफेद कॉलर एवं नीले कॉलर वाली नौकरियां नहीं चाहिए? काश बेटियों को पढ़ने जाने के लिए नीतीश कुमार ने साइकिल का उपहार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा देते समय उनके करियर का भी सोचा होता. पढ़ाई ने उनके भीतर अपने पांवों पर खड़े होने, प्रतियोगी परीक्षा अथवा इंजीनियरिंग पढ़कर बेहतर नौकरी और जीवन शैली की चाहत पैदा कर दी है. बिहार की स्त्रियां भी अपने बच्चों को पढ़ाना-लिखाना चाहती हैं मगर आमदनी के अभाव में राज्य की आधी आबादी निरक्षर है.


नौकरियों में अब कोई लिंग देखकर तो भर्ती की नहीं जाती. यदि ऐसा होता तो आईपीएस से लेकर राफेल लड़ाकू विमान चलाने के लिए हमारी बेटियां आगे ही नहीं आतीं. सरकार ने जैसे ही महिलाओं के लिए नौकरियों का आकाश खोला वे तत्काल पर फैलाकर मनोयेाग से उडने लगीं. इससे साफ है कि आकांक्षाएं हमारी युवतियों में युवकों से कम नहीं हैं. प्रधानमंत्री ने अपने अंतिम भाषणों में बिहार में युवाओं की आंकाक्षाएं पूरी करने के लिए ही वोट मांगे हैं!

मौजूदा चुनाव को अंतिम पारी बताकर नीतीश कुमार ने अप्रत्याशित दाव चला है. इसे उनकी तरफ से बीजेपी के लिए चेतावनी भी माना जा सकता है और तीसरे एवं निर्णायक दौर में अल्पसंख्यकों, महिलाओं एवं अति पिछड़ों के सहानुभूति वोट बटोरने की कोशिश तो ये साफ तौर पर है ही. चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान पर भी नीतीश ने कड़ी प्रतिक्रिया जताकर बीजेपी को खबरदार किया है. उन्होंने अपनी सहयोगी पार्टी को जता दिया कि वे भितरघात से टूटने के बजाय अपनी नई राजनीतिक राह तलाशना पसंद करेंगे. उन्होंने पंथ निरपेक्षता और समावेशी नीयत के बूते वैकल्पिक राजनीति की डगर अपनाने का संदेश 'अंत भला, सो भला' कह कर भी दिया.

कुल मिलाकर अप्रत्याशित कोविड-19 महामारी के काले साये तले हो रहा बिहार का विधानसभा चुनाव उतने ही पेचीदा जातीय, आर्थिक एवं राजनीतिक समीकरणों और घात-प्रतिघात के मध्य लड़ा जा रहा है. चुनाव पूर्व हुए तीन प्रमुख सर्वेक्षणों में तो एनडीए को बहुमत मिलने और सरकार बनने के आसार जताए गए हैं मगर चुनावी वायदों और प्रचार का नतीजों पर निर्णायक असर पड़ना लाजिमी है. इसलिए इसका परिणाम भी अप्रत्याशित निकले तो ताज्जुब नहीं होगा.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
अनंत मित्तल

अनंत मित्तलवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार,लेखक,अनुवादक हैं. प्रिंट, रेडियो, टीवी एवं डिजिटल पत्रकारिता का लंबा अनुभव. जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, पीटीआई भाषा, दूरदर्शन आदि समूहों में संपादन, रिपोर्टिंग,प्रोडक्शन संबंधी कार्य किया है.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: November 7, 2020, 2:46 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर