भारत में वेश्यावृत्ति पर कानूनन रोक नहीं, तो फिर धरपकड़ क्यों?

पेचीदा कानून के कारण भारत में वेश्यावृत्ति से जुड़े लोगों को परेशानी झेलनी पड़ती है. रेड लाइट एरिया में आए दिन पुलिस की छापेमारी से वेश्या परेशान होती हैं लेकिन लड़कियों की तस्करी और मुक्त कराने की फरियाद कार्रवाई का आधार होती हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: September 30, 2020, 2:32 PM IST
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भारत में वेश्यावृत्ति पर कानूनन रोक नहीं, तो फिर धरपकड़ क्यों?
पेचीदा कानून के कारण भारत में वेश्यावृत्ति से जुड़े लोगों को परेशानी झेलनी पड़ती है. रेड लाइट एरिया में आए दिन पुलिस की छापेमारी से वेश्या परेशान होती हैं लेकिन लड़कियों की तस्करी और मुक्त कराने की फरियाद कार्रवाई का आधार होती हैं.
मुंबई हाई कोर्ट ने वेश्यावृत्ति को निरपराध पेशा घोषित किया है. अदालत का कहना है कि हरेक बालिग़ औरत को अपना पेशा चुनने, आने-जाने का अधिकार है और संविधान प्रदत्त बुनियादी अधिकार अन्य सभी अधिकारों के उपर हैं. मुंबई हाई कोर्ट के न्यायाधीश ने यह भी साफ किया कि अनैतिक आवागमन (रोकथाम) अधिनियम 1956 (पीटा) के तहत वेश्यावृत्ति का पेशा अपराध की श्रेणी में कतई नहीं आता. तो फिर सवाल उठता है कि सेक्स रैकेट के भंडाफोड़ के नाम पर आए दिन धरपकड़ क्यों होती है.

न्यायमूर्ति ने और भी महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण यह दिया कि पीटा का मकसद स्त्रियों का दैहिक शोषण रोकना है, मगर उसकी मंशा ऐच्छिक वेश्यावृत्ति उन्मूलन की बिल्कुल नहीं है. मुंबई हाई कोर्ट ने यह स्पष्टीकरण वेश्यावृत्ति के आरोप में पकड़ी गई तीन औरतों को सरकारी हॉस्टल की हिरासत से छोड़ने का आदेश देते हुए किया है. इन औरतों को पीटा के तहत पकड़ने के बाद इसलिए रिहा नहीं किया गया कि ये उत्तर प्रदेश में ऐसे समुदाय से हैं जिसमें औरतों से वेश्यावृत्ति कराने की परंपरा है. इसलिए रिहा होने पर इनके फिर उसी पेशे में फंसने की आशंका है, मगर महिलाओं ने मजिस्ट्रेट के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देकर रिहाई पा ली.

मुंबई हाई कोर्ट के मुताबिक किसी व्यक्ति का व्यावसायिक मकसद के लिए शोषण अथवा दुरूपयोग तथा सार्वजनिक स्थानों पर यौन संबंध के लिए आग्रह करना अवश्य आपराधिक गतिविधि है. बहरहाल स्वत: वेश्यावृत्ति को अपराध मुक्त परिभाषित करने की बात इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में भी हो चुकी है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित पैनल ने भी साफ कहा कि वेश्यावृत्ति और स्वेच्छा से देह व्यापार करने वालों पर पुलिस कोई भी न्यायिक कार्रवाई नहीं कर सकती. कोर्ट ने 2011 में पैनल बनाया था. पैनल की संस्तुति थी कि स्वेच्छा से वेश्यावृत्ति के पेशे को चुनने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का पुलिस को कोई अधिकार नहीं है. वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप घोष की अगुआई में गठित पैनल ने वेश्यावृत्ति का पेशा छोड़ने वालों के पुर्नवास की व्यवस्था करने की भी सिफ़ारिश की ताकि वे आत्मसम्मान से बाकी ज़िंदगी जी सकें.

ज़ाहिर है कि मुंबई हाईकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के पैनल की बात से वेश्यावृत्ति को सम्मानजनक पेशे का दर्जा देने की मांग वाले समूहों को बल मिलेगा. जर्मनी और नीदरलैंड्स जैसे देशों में वेश्यावृत्ति को अन्य पेशों की तरह कानूनी मान्यता प्राप्त है. इसी तरह कुछ देशों में तो वेश्यावृत्ति करने वाले समूहों ने अपनी पब्लिक लिमिटेड कंपनी बनाकर उसके शेयर भी जारी किए हुए हैं. दूसरी तरफ अनेक अरब देशों में परस्त्रीगमन पर मौत की सज़ा मुकर्रर है.
ग़ौरतलब है कि पेचीदा कानून के कारण भारत में वेश्यावृत्ति से जुड़े लोगों को परेशानी झेलनी पड़ती है. रेड लाइट एरिया में आए दिन पुलिस की छापेमारी से वेश्या परेशान होती हैं लेकिन लड़कियों की तस्करी और मुक्त कराने की फरियाद कार्रवाई का आधार होती हैं. पैनल के मुताबिक, 'देश में वेश्यालयों का संचालन करना गैरकानूनी है लेकिन स्वेच्छा से वेश्यावृत्ति करना अपराध मुक्त पेशा है. इसलिए वेश्यावृत्ति करने वाले लोगों को गिरफ्त़ार करना या सजा देना गैरकानूनी है. उनके साथ दुर्व्यवहार भी सर्वथा ग़ैरकानूनी है. समिति के अनुसार ऐसे मामलों में पुलिस मानव तस्करी निवारण नियमों के अधिकारों का दुरुपयोग करती है.

पैनल की संस्तुति है कि अनैतिक तस्करी निवारण अधिनियम (आईटीपीए), 1956 की धारा 8 को समाप्त करना चाहिए. वेश्यावृत्ति के लिए बहकाना या जबरदस्ती करना अपराध है जिसके लिए छह महीने तक जेल और 500 रुपए हर्ज़ाने की सज़ा का प्रावधान है. भारत में भी वेश्यावृत्ति के हालांकि पौराणिक प्रसंग मौजूद हैं मगर इसे सामाजिक मान्यता देने की मांग हमेशा विवादास्पद रही है. महात्मा बुद्ध के प्रसंगों में वैशाली की नगरवधू का ज़िक्र लाज़िमी है. ताज्जुब ये है कि दुर्गा की उस मूर्ति की पूजा करने वालों के देश में जिसका निर्माण वेश्याओं के मुहल्ले की मिट्टी मिलाकर होता है वेश्याओं को हेय दृष्टि से देखने तथा उनके शोषण का सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी जारी है. देश के हरेक प्रमुख नगर में रेडलाइट एरिया यानी व्यापारिक सेक्सकर्मियों का मुहल्ला पीढ़ियों से आबाद है मगर वेश्याओं की सामाजिक आर्थिक हालत बदतर ही है.

दिल्ली के जीबी रोड, मुंबई के कामाठीपुरा तथा कोलकाता के सोनागाछी जैसे बड़े रेडलाइट एरिया सहित देश में, यूएनएड्स के अनुसार, 2016 में 6,57,829 सेक्सकर्मी थीं. ऑनलाइन डेटिंग, एस्कॉर्ट सर्विस, होटलों में तथा स्थानीय स्तर पर सक्रिय सेक्सकर्मियों की संख्या इससे अलग है. इस प्रकार भारत में कुल करीब 10 लाख औरतों के वेश्यावृत्ति का पेशा करने का अनुमान है जिनमें हर पांचवी लड़की नाबालिग है. इतनी बड़ी संख्या में औरतों के वेश्यावृत्ति करने से साफ है कि वे पैसे कमाने अथवा किसी की धौंस की मजबूरी में यह धंधा कर रही हैं. दुनिया की आबादी जहां 7.7 अरब है वहीं उसमें करीब 4.2 करोड़ सेक्सकर्मी होने का अनुमान है जो करीब 2,75,000 चकलों में कार्यरत हैं.लड़कियों की अन्य देशों में तस्करी 
वेश्यावृत्ति में आठ अरब डॉलर मूल्य का सालाना कारोबार अनुमानित है. दुनिया में न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, जर्मनी, बांग्लादेश, बेल्जियम, ब्राजील, कनाडा, मेक्सिको, कोलंबिया, डेनमार्क, फ्रांस, इक्वाडोर, ग्रीस, इंडोनेशिया, नीदरलैंड्स, डोमिनिकन रिपब्लिक, जापान, यूके, स्पेन, केन्या, फिलीपींंस सहित 53 देशों में वेश्यावृत्ति कानूनन् मान्य है. भारत सहित अन्य 12 देशों में सीमित वेश्यावृत्ति की इजाजत है जबकि 35 देशों में इस पर कड़ी बंदिशें लागू हैं. जर्मनी में तो 2016 से वेश्या संरक्षण कानून लागू है जिसके तहत उनके सरकारी रजिस्ट्रेशन, सुरक्षा तथा स्वास्थ्य जांच आदि प्रावधान हैं. वहां अन्य पेशों की तरह इस धंधे में रोजगार के लिए विज्ञापन निकालने तथा नियुक्ति पत्र जारी करने का नियम है. भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में ही एक लाख औरतों के वेश्यावृत्ति में लिप्त होने का अनुमान है. मुंबई को समूचे एशिया में वेश्यावृत्ति का सबसे बड़ा अड्डा आंका गया है जहां से वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों की अन्य देशों में तस्करी की जाती है.

इस पेशे को देश में इसीलिए निरूत्साहित किया जाता है कि इसमें ज्यादातर औरतें अपनी मर्जी के खिलाफ धकेली जाती हैं. हालांकि देश के लगभग हरेक राज्य में ऐसी एकाधिक जाति अवश्य मौजूद है जिसमें औरतों से वेश्यावृत्ति कराना पारंपरिक पेशा रहा है. इसके अलावा अनेक लड़कियों तथा औरतों द्वारा अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए भी वेश्यावृत्ति अपनाने के सबूत अदालतों के सामने आते रहे हैं. शहरों में स्पा, एस्कॉर्ट सेवा, डेटिंग साइटों और आए दिन उजागर होने जाने वाले सेक्स रैकेटों में पकड़ी जाने वाली औरतों में से अधिकतर स्वेच्छा से वेश्यावृत्ति करती पाई गई हैं. अलबत्ता रेडलाइट एरिया में कोठों और चकलों में पेशा करती पाई गई ज्यादातर औरतें खरीद-फरोख्त अथवा धोखे की शिकार बनाकर वेश्यावृत्ति में धकेली गई हैं.

समय के साथ मजबूरन उसी माहौल को अपनाना इन औरतों एवं लड़कियों की मजबूरी बन जाता है क्योंकि इनके पुनर्वास का समुचित कार्यक्रम न तो निर्वाचित सरकारों के पास है और न ही परिवारों के पास. ये लौटकर अपने घर इसलिए नहीं जा पातीं क्योंकि वहां समाज के ताने इनके साथ-साथ रिश्तेदारों का भी जीना मुहाल कर देते हैं. रेडलाइट एरिया में धंधे के पीछे पुलिस की जांच में बाकायदा दलालों से लेकर कोठा चालकों तक मुकम्मिल नेटवर्क उजागर हुआ है. सर्वेक्षण के अनुसार एक तिहाई लड़कियां घरवालों की आर्थिक जरूरत पूरी करने को वेश्यावृत्ति करती हैं.

करीब इतनी ही संख्या जबरन वेश्यावृत्ति में धकेली जाने वाली लड़कियों तथा औरतों की आंकी गई है. इनमें ज्यादातर नेपाल, उत्तराखंड एवं पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाकों से तथा अब ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों से भगाई गई लड़कियां हैं.


करीब ढाई लाख नेपाली औरतें वेश्यावृत्ति में लिप्त !
देश भर में करीब ढाई लाख नेपाली औरतों के वेश्यावृत्ति में लिप्त होने का अनुमान है. नेपाल से संगठित गिरोहों के मार्फत 10 से 20 साल उम्र की सालाना पांच से छह हजार लड़कियां तथा औरतें उनकी आर्थिक मजबूरी के कारण भगा कर या खरीद कर वेश्यावृत्ति के लिए लाई जाती हैं. बांग्लादेश से भी बड़ी तादाद में वेश्यावृत्ति के लिए बच्चों-बच्चियों और लड़कियों की तस्करी जारी है. इन बच्चों को अरब शेखों तथा गोरी चमड़ी वाले पश्चिमी अपराधियों की हवस मिटाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. बाल वेश्यावृत्ति के अधिकतर मामले गोवा, कोवलम, पुद्दुचेरी तथा जगन्नाथ पुरी के तटीय इलाकों में पकड़े गए हैं. गोवा में तो आजीवन कारावास की सजा पा चुके अंग्रेज ने बाकायदा अनाथालय खोल कर बच्चों का 17 बरस यौन शोषण किया. उसके पकड़े जाने पर छापे में उसके घर से तीन बरस की बच्चियों सहित 2500 निर्वस्त्र तस्वीरें और बच्चों से सेक्स के कुत्सित वीडियो भी बरामद हुए थे.

दुर्भाग्य यह है कि आए दिन पुलिस द्वारा उजागर सेक्स रैकेटों में दलालों के पास नेताओं, अफसरों और सेठों के फोन नंबर पकड़े जाने के दावे होते हैं जिससे साफ है कि इस पेशे को खत्म करने में किसी की दिलचस्पी नहीं है. इसीलिए अनेक महिला समूह वेश्यावृत्ति को अन्य धंधों की तरह मान्यता देने की मांग कर रहे हैं जिससे सेक्सकर्मी समाज में बराबरी की जिंदगी जी सकें. वरना दलालों और पुलिस के दो पाटों के बीच पिसते हुए अधिकतर सेक्सकर्मी तरह-तरह की बीमारियों की शिकार हो रही हैं. उनके बच्चों के पुनर्वास एवं समान्य परवरिश के लिए भी ठोस पहल किसी सरकारी अथवा स्वयंसेवी निकाय द्वारा नहीं की जाती. एड्स की बीमारी के फैलने का ज़रिया चूंकि अधिकतर सेक्स को माना गया इसलिए वेश्याओं के स्वास्थ्य आदि पर कुछ स्वयंसेवी संगठनों ने ध्यान दिया मगर उनके व्यापक कल्याण अथवा पुनर्वास पर कोई सरकार ध्यान नहीं देती. ऐसे में समान लिंग वाले व्यक्तियों को आपस में प्यार/शादी करने तथा किन्नरों को नागरिक अधिकार देने की तरह क्या वेश्याओं के अधिकारों एवं समाजिक सुरक्षा का प्रबंध करना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है? (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.) 
ब्लॉगर के बारे में
अनंत मित्तल

अनंत मित्तलवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार,लेखक,अनुवादक हैं. प्रिंट, रेडियो, टीवी एवं डिजिटल पत्रकारिता का लंबा अनुभव. जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, पीटीआई भाषा, दूरदर्शन आदि समूहों में संपादन, रिपोर्टिंग,प्रोडक्शन संबंधी कार्य किया है.

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First published: September 30, 2020, 2:29 PM IST
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