इंदिरा गांधी जैसे दांवपेच के बावजूद भिन्न है मोदी की राजनीति

इंदिरा गांधी तो दो बार कांग्रेस से निकाले जाने के बावजूद अदम्य गतिशीलता के बूते अपने इर्दगिर्द नया संगठन खड़ा करके सत्ता पाने में कामयाब रहीं, मगर उनके वंशज खोई राजनीतिक जमीन वापस पाने में नाकाम हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: November 19, 2020, 2:53 PM IST
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इंदिरा गांधी जैसे दांवपेच के बावजूद भिन्न है मोदी की राजनीति
इंदिरा गांधी ने दिसंबर 1971 के य़ुद्ध में पाकिस्तान को नाकों चने चबवाये
लगातार जन समर्थन खोकर अपने ही लोगों से अदूरदर्शी नेतृत्व के आरोप झेल रही कांग्रेस क्या इंदिरा गांधी से कोई सबक लेने लायक भी नहीं बची? आश्चर्य है कि कांग्रेस इतनी निस्तेज तब हो रही है जब पिछले 95 साल से उसका प्रतिद्वंद्वी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और 1980 से उसकी राजनीतिक शाखा बीजेपी यानी भारतीय जनता पार्टी लगातार देश में अपना वैचारिक एवं राजनीतिक प्रभाव बढ़ा रही है. कायदे से तो बीजेपी की दक्षिणपंथी सोच का दायरा बढ़ने के साथ ही कांग्रेस की मध्यमार्गी विचारधारा को भी मजबूत होना चाहिए था, मगर कांग्रेस में परिवारवाद हावी होने से उसका वैचारिक आधार दरक गया है. इसी वजह से कांग्रेस और बीजेपी के बीच होड़ धीरे-धीरे एकतरफा होती जा रही है.

इंदिरा गांधी तो दो बार कांग्रेस से निकाले जाने के बावजूद अदम्य गतिशीलता के बूते अपने इर्दगिर्द नया संगठन खड़ा करके सत्ता पाने में कामयाब रहीं, मगर उनके वंशज खोई राजनीतिक जमीन वापस पाने में नाकाम हैं. इंदिरा गांधी की जन्म शताब्दी के बाद भी दो साल बीत चुके मगर भारतीय राजनीति पर उनकी छाप इतनी गहरी है कि सामयिक परिस्थितियों में उनकी याद स्वाभाविक है. राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी के बाद बीजेपी के सबसे लोकप्रिय नेता और दो बार प्रधानमंत्री निर्वाचित हो चुके नरेंद्र मोदी के राजनीतिक दावपेचों पर भी इंदिरा गांधी की छाप साफ दिखाई पड़ती है.

इंदिरा गांधी ने आजादी के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे पहले परमाणु विस्फोट करके जहां अमेरिका को अंगूठा दिखाया, वहीं चीन और पाकिस्तान जैसे देशों को भारत की सामरिक ताकत के प्रति खबरदार भी किया. उन्हीं की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मिसाइलों के आधुनिक संस्करणों के निर्माण एवं परीक्षण, लड़ाकू विमानों, नई पनडुब्बियों और युद्धपोतों की खरीद आदि पर ध्यान दे रहे हैं.

इंदिरा गांधी की तरह अपने चुनाव प्रबंधन, भाषणों और विभिन्न वर्गों को दी गई सरकारी मदद की बदौलत नरेंद्र मोदी भी 2019 का आम चुनाव जीत कर दोबारा प्रधानमंत्री बनने में कामयाब रहे. इंदिरा गांधी की तरह ही मोदी का मुख्य नैरेटिव देश की सुरक्षा, सीमापार से चुनौती और विदेशी षडयंत्रों की चेतावनी देना है.
इंदिरा गांधी ने दिसंबर 1971 के य़ुद्ध में पाकिस्तान को नाकों चने चबवाये और बांग्लादेश को आजाद करवाया. उससे पहले ही उन्होंने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम को समर्थन देकर देश में उपजे पाकिस्तान विरोधी माहौल का फायदा उठाने के लिए मार्च 1971 में मध्यावधि चुनाव कराया और अपने बूते बहुमत की सरकार बनाई. उसके बाद ही इंदिरा ने सिक्किम का भारत में अहिंसक विलय करके देश के मानचित्र का विस्तार किया.

नरेंद्र मोदी ने भी कश्मीर में सैन्य ठिकानों पर आतंकी हमले होने पर सीमापार 'सर्जिकल स्ट्राइक' कराया, जिसके लिए मीडिया ने उनकी पीठ ठोकी. इसके बाद 2019 के आम चुनाव से ऐन पहले 26 फरवरी को तड़के नियंत्रण रेखा पार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में बालाकोट सेक्टर में अपने हल्के लड़ाकू विमान से हमला करवाया. भारत ने उसे असैन्य एवं निषेधात्मक कार्रवाई बताया. इसे 14 फरवरी को पुलवामा के लेथपुरा में अर्धसैनिक बल की बस पर आतंकी हमले में मारे गए 40 जवानों का बदला बताया गया. इसका मोदी को मई 2019 के आम चुनाव में खासा फायदा हुआ.

इंदिरा गांधी की लोकप्रियता जवाहर लाल नेहरू से अधिक रहीइंदिरा गांधी के नेतृत्व में 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध और सर्जिकल स्ट्राइक एवं बालाकोट हवाई हमले के श्रेय के प्रचार में मूल अंतर प्रौद्योगिकी का है. इसी वजह से जल-थल और नभ तीनों मोर्चों पर लड़े गए 13 दिन लंबे भारत-पाकिस्तान युद्ध के मुकाबले सीमित छापेमारी को बीजेपी की ट्रोल सेना ने व्हाट्सऐप एवं सोशल मीडिया पर खूब प्रचारित किया. इसके मुकाबले इंदिरा गांधी की उपलब्धियां तो रेडियो और अखबारों के जरिए ही आम जनता तक पहुंचती थीं. फिर भी इंदिरा गांधी की लोकप्रियता एक समय में अपने पिता और आजादी की लड़ाई के जननायक जवाहर लाल नेहरू से भी अधिक रही.

इंदिरा गांधी ने काफी आर्थिक और कृषि सुधार किए
चीन और पाकिस्तान को उनकी औकात में रखने के लिए इंदिरा गांधी ने जिस प्रकार सोवियत संघ से एकीकृत सहयोग समझौता किया उसी तरह चीन से बढ़ते खतरे के मद्देनजर मोदी सरकार अमेरिका से रणनीतिक समझौता कर रही है. इंदिरा ने आर्थिक और कृषि सुधार किए. किसानों को क्योंकि फसल पर लागत एवं मेहनत का अमूमन मुनासिब दाम नहीं मिलता था इसलिए इंदिरा सरकार ने 1969 से रबी और खरीफ की फसलों की बिक्री एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया. भारतीय खाद्य निगम द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए अनाज खरीदने को प्राप्ति मूल्य यानी प्रोक्योरमेंट प्राइस भी रखा गया.

साल 1974 से सरकार सिर्फ एमएसपी पर अनाज खरीदती है. यह 23 कृषि उत्पादों पर लागू है. संशोधित कृषि कानूनों में मंडी प्रणाली समाप्त होने के बाद किसान एमएसपी पर खरीद को अनिवार्य करने के लिए ही आंदोलन कर रहे हैं.


इंदिरा गांधी की तरह ही पीएम मोदी की सोच
मोदी ने भी आम लोगों तक राशन पहुंचाने, कृषि क्षेत्र का दायरा बढ़ाने और आम आदमी को बैंकों से जोड़ने के उपाय किए हैं. इंदिरा ने जहां आजादी और बंटवारे के बाद से अनाज की भीषण कमी और भुखमरीग्रस्त देश में हरित क्रांति लाई, वहीं मोदी ने कृषि उपज के भंडारण एवं व्यापार विस्तार के लिए ठोस मगर विवादास्पद पहल की है. इनमें किसान को अपनी उपज देश में निजी कंपनियों सहित कहीं भी बेचने की आजादी देना और गांवों-कस्बों से लगे उन महत्वपूर्ण शहरों से किसान ट्रेन शुरू करना शामिल है. उनमें किसानों से जमा कृषि उपज और दूध-फल लादकर महानगरों सहित उन शहरों तक पहुंचाया जा रहा है जहां उसकी भारी मांग है. इससे आजादी के बाद से ही घोर गरीबी के शिकार किसानों के जीवन में निर्णायक बदलाव आने के आसार हैं.

बैंकों के राष्ट्रीयकरण में इंदिरा ने निभाई बड़ी भूमिका
बैंकों में आम जनता की भागीदारी बढ़ाने के लिए इंदिरा गांधी ने 1969 और 1980 में उनका राष्ट्रीयकरण किया. इससे जहां बैंकों में भरोसा बढ़ने से अधिक ग्राहकों ने अपना पैसा जमा करना शुरू किया, वहीं उनकी बचत का देश की परियोजनाओं में निवेश होने लगा. नरेंद्र मोदी ने बिना कोई राशि जमा कराए करोड़ों जनधन खाते बैंकों में खुलवाए. इस परियोजना की शुरुआत यूपीए के वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने की थी मगर मोदी ने नए खातों को डीबीटी योजना से जोड़ा. यह खाते लॉकडाउन के दौरान गरीबों, बुजुर्गों और विधवाओं के खाते में पेंशन एवं किसानों आदि के लिए सबसीडी राशि जमा करने में काम आए. एनपीए बढ़ने से कमजोर सरकारी बैंकों के विलय पर भी मोदी सरकार जोर दे रही है।

बुजुर्ग कांग्रेसी नेताओं से करना पड़ा मुकाबला
जवाहर लाल नेहरू की बेटी होने के बावजूद इंदिरा गांधी को अपना वजूद जमाने के लिए पार्टी के भीतर बुजुर्ग नेताओं का मुकाबला करना पड़ा. तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की उज्बेकिस्तान के ताशकंद में मृत्यु के बाद 19 जनवरी, 1966 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इंदिरा गांधी को अपना नेता चुना और वे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की प्रधानमंत्री बन गईं. बुजुर्ग कांग्रेसियों के सिंडीकेट ने इंदिरा को उनकी गतिशीलता और लोकप्रियता के कारण सरकार तो सौंप दी मगर बात-बात पर उन्हें जलील करने से बाज नहीं आए.

पक्ष-विपक्ष के तमाम अनुभवी नेताओं के बीच संसद के भीतर बोलते हुए उनकी जुबान लड़खड़ाती अथवा हाथ कांपते तो उन्हें 'गूंगी गुड़िया' कह कर मजाक उड़ाया गया. उसी बीच 1967 का आम चुनाव आया तो इंदिरा गांधी ने जीतोड़ मेहनत करके देश भर में सभा कीं और कांग्रेस पर चीन से युद्ध में हार के कलंक के बावजूद सामान्य बहुमत से जीतने में कामयाब रहीं.


जब इंदिरा गांधी ने वीवी गिरि को दिया समर्थन
अनुभवी, जिद्दी और महत्वाकांक्षी मोरारजी देसाई उपप्रधानमंत्री और वित्तमंत्री बने तो इंदिरा को नौसिखिया साबित करने की मुहिम तेज कर दी. योजना आयोग जिसका अध्यक्ष ही प्रधानमंत्री होता है उसकी बैठकों में इंदिरा के दखल देने पर मोरारजी बड़ी ढिठाई से कह देते कि आपकी समझ में नहीं आएगा! उसी बीच राष्ट्रपति जाकिर हुसैन के निधन से 1969 में नए राष्ट्रपति का चुनाव हुआ, जिसमें सिंडीकेट ने नीलम संजीव रेड्डी को कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया. रेड्डी चूंकि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए इंदिरा से ओछी हरकत कर बैठे थे, इसलिए उन्होंने कार्यवाहक राष्ट्रपति का पद छोड़कर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे वीवी गिरि को समर्थन दे दिया. वीवी गिरि को जिताने के लिए अनेक विपक्षी सांसदों का जुगाड़ करने वाले रिपब्लिकन पार्टी के तत्कालीन सांसद बुद्धप्रिय मौर्य ने रेड्डी की उस हरकत का जिक्र अपने संस्मरणों में किया है. कांग्रेस के सांसदों से अपनी अंतरात्मा की आवाज पर मतदान करने की इंदिरा की अपील रंग लाई। रेड्डी की हार और गिरि के जीतने से बौखलाए सिंडीकेट नेताओं ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया. इंदिरा ने डटकर लोहा लिया, कांग्रेस के ज्यादातर सांसदों का विश्वास जीता तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थन से सरकार चलाई. नई कांग्रेस के नाम से चुनाव आयोग ने उनके दल को मान्यता दी.

इंदिरा गांधी भारतीय राजनीति में लगातार ताकतवर होती गईं
राज्यों की कांग्रेस कमेटियों ने भी उन्हें समर्थन दिया और इंदिरा गांधी भारतीय राजनीति में ताकतवर होती गईं. हालांकि इसकी परिणति 1975 में आपातकाल लगाने,विपक्षियों को कैद तथा अन्य ज्यादतियों में हुई मगर 1977 में इंदिरा ने आम चुनाव करवा कर खुद हारने के बावजूद लोकतंत्र बहाल किया. उसके बाद विपक्ष में रहते हुए बिहार के बेलछी में दलितों के नरसंहार का जायजा लेने वे जब हाथी की पीठ पर चढ़कर गईं तो फिर उनकी गतिशीलता की तारीफ हुई. अंतत: 1980 के मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस आई को जिता कर वे चौथी बार प्रधानमंत्री बनीं.

इंदिरा गांधी की जान देश की अखंडता की रक्षा करने में गई
इंदिरा और फिरोज गांधी के दो बच्चे हुए. साल 1960 में फिरोज की मृत्यु के बाद तो वे अकेली रह गईं. इंदिरा गांधी जहां आजाद भारत की पहली एवं अब तक एकमात्र महिला प्रधानमंत्री हैं, वहीं नरेंद्र मोदी, पिछड़ी जाति से आने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री हैं. लेकिन नरेंद्र मोदी को गुजरात में शासन के सवा दशक लंबे अनुभव तथा आरएसएस के समर्थन के कारण बीजेपी का प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनने में पापड़ नहीं बेलने पड़े. अलबत्ता प्रधानमंत्री बनने पर उन्होंने भी लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार आदि वरिष्ठ नेताओं को मार्गदर्शक मंडल के जरिए किनारे कर दिया. अनेक समानताओं के बावजूद यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि इंदिरा गांधी की जान देश की अखंडता की रक्षा करने के कारण गई जबकि वर्तमान प्रधानमंत्री पर ध्रुवीकरण की राजनीति के आरोप लगते हैं.
ब्लॉगर के बारे में
अनंत मित्तल

अनंत मित्तलवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार,लेखक,अनुवादक हैं. प्रिंट, रेडियो, टीवी एवं डिजिटल पत्रकारिता का लंबा अनुभव. जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, पीटीआई भाषा, दूरदर्शन आदि समूहों में संपादन, रिपोर्टिंग,प्रोडक्शन संबंधी कार्य किया है.

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First published: November 19, 2020, 2:51 PM IST
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