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Subhas Chandra Bose Birth Anniversary: नेताजी सुभाष को भी दिया था हिटलर ने धोखा

देशभक्ति से लबरेज नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Subhas Chandra Bose) को जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर (Adolf Hitler) के इरादों की कोई भनक ही नहीं थी. उसके लिए तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय सामरिक रणनीति में भारत का महत्व नहीं था. इसीलिए हिटलर ने युद्धबंदियों सैनिकों की टोली बना रहे सुभाष से मिलना भी गवारा नहीं किया.

Source: News18Hindi Last updated on: January 23, 2021, 6:32 PM IST
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Subhas Chandra Bose Birth Anniversary: नेताजी सुभाष को भी दिया था हिटलर ने धोखा
Subhas Chandra Bose Birth Anniversary: नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को हुआ था.
देश को ‘भारत माता की जय’ एवं ‘जयहिंद’ जैसे नारे देने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी नाजी जर्मन तानाशाह हिटलर के धोखे के शिकार हुए थे. भारत सहित पूरी दुनिया में नेताजी समर्थक 23 जनवरी को उनकी सवा सौवीं जयंती मना रहे हैं. पश्चिम बंगाल में इसी साल विधानसभा चुनाव है. देश की एकता व आजादी के लिए कुर्बान हुए नेताजी की याद में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसे देशनायक दिवस के रूप में तथा सत्ता की दावेदार बीजेपी पराक्रम दिवस कह कर मना रही हैं. नेताजी को महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन की रणनीति कतई असरदार नहीं लगती थी. उनका मत था कि दूसरे विश्व युद्ध में फंसी बरतानवी हुकूमत को उसके दुश्मनों की मदद से भारत से खदेड़ा जा सकता है.

सुभाष चंद्र बोस और मोहनदास करमचंद गांधी की पहली मुलाकात जुलाई,1921 में सुभाष के इंग्लैंड से लौटने के बाद हुई. सुभाष दरअसल गांधी से तो नहीं, मगर जवाहरलाल नेहरू से बहुत प्रभावित हुए. जवाहरलाल विचारधारात्मक अंतरराष्ट्रवाद के हामी तथा फासिज्म विरोधी थे. सुभाष का नजरिया भूराजनैतिक था. अपनी इसी धारणा के तहत सुभाष को आजादी के लिए फासिस्ट हिटलर एवं मुसोलिनी तथा कम्युनिस्ट रूस की मदद लेने से भी गुरेज नहीं था. जवाहरलाल के विचार भी अंतरराष्ट्रीय घटनाओं से प्रभावित थे मगर उन्हें अहिंसक संघर्ष में पूरा भरोसा था.



नेताजी ने पहले जर्मनी में हिटलर की मदद से बरतानवी राजतंत्र को अफगानिस्तान की ओर से घुस कर चुनौती देने की ठानी. उन्हें लगता था कि हिटलर और रूस की मदद से वे भारत से अंग्रेजों को निकाल बाहर करने के बाद यहां भी वामपंथी-फासिस्ट सरकार बनाने में सफल रहेंगे. बीसवीं सदी के चौथे दशक में यही दो वाद पूरी दुनिया पर हावी होने को उतावले थे. हिटलर के प्रचार मंत्री जोसफ गोयबल्स के अनुसार शार्टवेव रेडियो पर सुभाष की अपील का दुनिया पर गहरा असर पड़ा. अपने पहले अंतरराष्ट्रीय संबोधन में नेताजी ने कहा, ‘बरतानवी राजतंत्र के दुश्मन आज भारत के स्वाभाविक सहयोगी हैं. हम उन सभी ताकतों से तहेदिल से सहयोग करेंगे जो हमारे साझा़ बैरी की जड़ उखाड़ने में मदद करेंगे..’
देशभक्ति, जोश और जवानी से लबरेज नेताजी को दरअसल हिटलर के भूराजनैतिक इरादों की कोई भनक ही नहीं थी. तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय सामरिक रणनीति में भारत का उसके लिए कोई महत्व नहीं था. इसीलिए हिटलर ने सशस्त्र क्रांति का सपना पूरा करने को जर्मनी में मौजूद 15 हजार युद्धबंदियों में से सैनिकों की टोली बना रहे सुभाष से मिलना भी गवारा नहीं किया. हिटलर ने भारत की आजादी के लिए हथियारबंद संघर्ष को समर्थन की घोषणा के बजाए जून,1941 में उल्टे सुभाष की क्रांति के दूसरे संभावित समर्थक रूस पर हमला कर दिया. जाहिर है कि इससे नेताजी का दिल टूट गया क्योंकि उन्हें पता था कि भारत की जनता हिटलर के बजाए अपनी आर्थिक दुर्दशा के मद्देनजर सर्वहारा क्रांति वाले रूसी निजाम को समर्थन देना अधिक पसंद करेगी.

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जर्मनी से अपने अंतिम रेडियो संदेश में उन्होंने हिटलर की आलोचना करते हुए कहा कि वे बिस्मार्क की सलाह कि रूस से कभी युद्ध नहीं करना से भटक गए. हिटलर द्वारा मित्र देशों की रणनीति के खिलाफ खुद के इस्तेमाल तथा उसकी छीजती ताकत से दुखी नेताजी ने हिम्मत नहीं हारी और जापान का रूख किया. उन्होंने जापान की मदद से आजाद हिंद फौज बनाई और मणिपुर में बरतानवी हुकूमत पर हमला भी किया मगर कामयाब नहीं हो पाए. प्रखर समाजवादी विचारक मधु लिमये के अनुसार नेताजी दरअसल जर्मन भूराजनैतिक विचारक हौषेफर से प्रभावित थे जो फासिस्ट समर्थक थे. उनके अनुसार इसका सबूत उन्हें एक जर्मन लेखक की पुस्तक के फुटनोट में मिला जिसके अनुसार नेताजी ने हौषेफर के साथ मुलाकात की थी. हौषेफर ने समुद्री शक्तियों के मुकाबले महाद्वीपीय ताकतों जर्मनी एवं रूस के बीच गठबंधन की वकालत की थी. नाजी-सोवियत समझौते से नेताजी को लगा कि उससे दुनिया में शक्ति संतुलन बदलेगा और उनकी संयुक्त ताकत के समर्थन से अंग्रेजों को भारत से खदेड़ना संभव हो पाएगा. उनके अनुसार सुभाष को यदि हिटलर के कुटिल इरादों की जरा सी भी भनक होती तो वे देश के बाहर कदम नहीं निकालते.बहरहाल 1921 में कांग्रेस में शामिल सुभाष ने गरमदल के नेताओं से रिश्ते बढ़ाए. उन्होंने 1928 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में फिर 1931 में कराची में महात्मा गांधी की डटकर मुखालफत की. कराची में तो उन्होंने कहा कि गांधी चुक गए हैं. सुभाष ने 1933 में कांग्रेस से तौबा कर ली. उन्होंने लिखा कि कांग्रेस अपने लिए नया नेता, नया सिद्धांत एवं एवं नई विधि अपना ले. यह दीगर है कि 1937 में जेल से छूटने पर गांधी ने उन्हें फिर से कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित करने का माहौल बनाया. कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित होते ही सुभाष ने कांग्रेस शासित सात प्रांतों में संप्रभु अधिकारों, औद्योगिकरण, भूमि सुधार, श्रम सुधार एवं आबादी नियंत्रण का एजेंडा लागू करने पर जोर दिया. इससे कई कांग्रेस समर्थक बिलबिला गए.

उन्होंने सुभाष के खिलाफ दबाव बनाना शुरू किया. उसके बावजूद नेताजी 1938 में फिर अध्यक्ष निर्वाचित हो गए. उनके बागी तेवरों के खिलाफ कांग्रेस में असंतोष बढ़ने पर महात्मा गांधी ने उनका इस्तीफा मांग लिया. उसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें फिर जेल में डाल दिया जिन्हें छका कर नेताजी मौलवी के वेश में 1941 में सीधे जर्मनी जा पहुंचे. उनसे इस्तीफा लेने के बावजूद उनके देशभक्ति के जज्बे के कारण गांधी जी उनकी इज्जत करते रहे लेकिन आजादी के आंदोलन के लंबे खेवनहार के गुण उनमें नहीं देखते थे. सुभाष के अनुसार उनके भीतर देशभक्ति की लौ स्वामी विवेकानंद के विचार पढ़कर जागी जिसे धार मिली महर्षि अरबिंदो के क्रांतिकारी विचारों से जो उन दिनों अंग्रेजों की नाक में दम किए हुए थे.

उसके बाद कलकत्ता के प्रेजिडेंसी कॉलेज में दाखिला लेने पर उन्होंने जर्मन आदर्शवाद के दर्शन से संबंधित पुस्तक पढ़ीं. हेनरी बर्गसन की स्वातंत्र्य चेतना की नई अवधारणा को पढ़ा. नेताजी ने कहा है कि उन्होंने अरबिंदो की वाणी में ही राजनीतिक स्वतंत्रता के संदेश को पहली बार ग्रहण किया. अंग्रेज प्रोफेसर द्वारा अपने सहपाठी पर हाथ उठाने का सामने आकर विरोध करने पर 1916 में सुभाष को कॉलेज से निकाल दिया गया. तब उन्होंने दूसरे कॉलेज में अपनी पढ़ाई पूरी की. उनके मन में किशोरावास्था से ही भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने का ख्याल घर करने लगा था. वे अपने कमरे की दीवारों पर देशी क्रांतिकारियों की तस्वीरें और उनके विचारों की अखबारी कतरनें चिपकाते थे जिन्हें उनके पिता डर के मारे फाड़ते रहते थे.

सुभाष के अनुसार उनका मन बचपन से ही अपनी उम्र के बच्चों से बहुत अलग बातें सोचता था. उन्होंने 15 बरस की उम्र में अपनी मां को लिखे पत्र में यह सवाल किया, 'क्या हमारे देश की हालत बद से बदतर होती जाएगी? क्या मुसीबत की शिकार भारत माता को उसका कोई भी पुत्र अपना भला भूल कर उसकी सेवा में अपना पूरा जीवन समर्पित नहीं करेगा?' उनके भीतर खदबदाते ये प्रश्न विवेकानंद के आह्वान, 'युवाओं उठो-जागो- देश की परवाह करो’ ने पैदा किए और महर्षि अरबिंदो के क्रांतिकारी विचारों ने प्रबल बना दिया. उनके इसी तेज और लगन को देखकर आजादी हासिल करने के उपायों पर उनसे मतभेद के बावजूद महात्मा गांधी ने कहा था, 'सुभाष की देशभक्ति अतुलनीय है.’


सुभाष को चूंकि हिटलर एवं मुसोलिनी की मदद से भारत को आजाद कराने से भी गुरेज नहीं था. इसलिए वे कभी भी महात्मा गांधी का भरोसा नहीं जीत पाए. आखिर सशस्त्र संघर्ष तो मूलतः अहिंसक संघर्ष के विपरीत था. बस 1937-38 का वकत ऐसा था जिसमें कांग्रेस की निर्वाचित सरकारें बनने के कारण सुभा कांग्रेस अध्यक्ष बनने की धुन में लगे रहे. सुभाष को पारंपरिक कांग्रेसी तिलक का अनुयायी मानते थे. तिलक का सिद्धांत था ‘षठम प्रति षाठ्यम’ अर्थात ईंट का जवाब पत्थर से दिया जाए. इसीलिए कांग्रेस के ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ प्रस्ताव से नेताजी बेहद उत्साहित थे. उन्हें लगा कि अंततः कांग्रेस आजादी पाने के लिए उनकी अवधारणा के करीब आ गई मगर महात्मा गांधी ने राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अच्युत राव पटवर्धन एवं अरुणा आसफ अली के अतिवाद पर रुष्ट होकर अपना अहिंसक मत स्पष्ट कर दिया.

नेताजी के शब्दों में उन्होंने सिविल सर्विस परीक्षा पास करके अंग्रेजों से अपने जूते साफ करवाने का खूब आनंद लिया मगर संघर्ष के बिना जीवन अधूरा है. यह बात उन्होंने अपने भाई शरत चंद्र बोस को लिखी जो आजादी के बाद लंबा अरसा विधायी पदों पर रहे. नेताजी स्वयं तो आजादी से पहले ही रूस जाते हुए हवाई दुर्घटना के शिकार हो गए थे मगर उनके परिवार के कुल छह सदस्य देश में विभिन्न विधायी पदों पर रहे हैं. सुभाष ने शरत को लिखा था कि बिना जोखिम जीवन नीरस है सो मैं नौकरी छोड़ कर वापस आ रहा हूं. वे 19921 में भारत लौट आए और कांग्रेस की राजनीति में मुब्तिला रहे.

नेताजी और जवाहरलाल ने मिलकर ही कांग्रेस को भारत के लिए पूर्ण स्वराज की मांग की राह पर प्रवृत्त किया. उसमें सैन्य मामलों पर नियंत्रण भी शामिल था. इसके बावजूद असहयोग के जरिए आजादी पा सकने में वे यकीन नहीं कर पाए. पहले विश्व युद्ध का उदाहरण देते हुए उन्होंने लिखा, 'युद्ध ने दिखा दिया कि जिस देश के पास सैन्य ताकत नहीं होती वह अपनी आजादी को अक्षुण्ण रखने की उम्मीद नहीं कर सकता.’ इसके बरअक्स महात्मा गांधी का साफ मत था कि भारत को आजाद करवाने के लिए किसी भी विदेशी शक्ति का सहयोग लेने पर फिर उसके शिकंजे से छूटने के लिए नए सिरे से जूझना पड़ सकता है. उन्हें भरोसा था कि भारत के नागरिक भले ही गरीब और वंचित हो मगर अहिंसक दृढ़ संकल्प में उनका कोई सानी नहीं था. अंततः उसी दबाव में अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना भी पड़ा. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
अनंत मित्तल

अनंत मित्तलवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार,लेखक,अनुवादक हैं. प्रिंट, रेडियो, टीवी एवं डिजिटल पत्रकारिता का लंबा अनुभव. जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, पीटीआई भाषा, दूरदर्शन आदि समूहों में संपादन, रिपोर्टिंग,प्रोडक्शन संबंधी कार्य किया है.

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First published: January 23, 2021, 11:05 AM IST
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