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OPINION: द्रविड़ अस्मिता के सवाल से कैसे निपटेंगे 'तलैवा' रजनीकांत

जयललिता 2016 और करूणानिधि 2018 में दुनिया छोड़ चुके. रजनीकांत ने मैदान खाली देख नया दल बनाने और 2021 का विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की है. रजनीकांत की लोकप्रियता के मद्देनजर इसे उनके लिए सुनहरा मौका माना जा सकता है मगर द्रविड़ दलों द्वारा सत्ता की प्रबल दावेदारी के बीच द्रविड़ अस्मिता की रक्षा में उनके योगदान पर सवाल उठना लाजिमी है.

Source: News18Hindi Last updated on: December 4, 2020, 5:04 PM IST
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OPINION: द्रविड़ अस्मिता के सवाल से कैसे निपटेंगे 'तलैवा' रजनीकांत
सुपरस्टार रजनीकांत.
तमिल फिल्मों में अपने प्रशंसकों के तलैवा यानी रजनीकांत ने राजनीतिक दल बनाकर निरीश्वरवादी द्रविड़ राजनीति की प्रयोगशाला तमिलनाडु में अगला विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा तो कर दी, मगर उनका वैचारिक रूझान क्या है? यह सवाल इसलिए उभरा कि तमिलनाडु की राजनीति पिछले करीब छह दशक से ई वी रामास्वामी पेरियार के द्रविड़ अस्मिता आंदोलन की देन द्रविड़ार कषगम से प्रभावित है. खुद को उसका वारिस बताने वाले दो प्रमुख दल अन्ना द्रमुक और द्रमुक ही बारी—बारी राजसत्ता भोग रहे हैं. इनके नेताओं कलैनर एम करूणानिधि और एमजीआर यानी एम जी रामचंद्रन को द्रविड़ राजनीति के स्तंभ एवं मुख्यमंत्री रहे सी एम अन्नादुरै का उत्तराधिकारी माना जाता रहा. अन्नादुरै की मृत्यु के बाद करूणानिधि ही द्रविड़ आंदोलन के अगुआ और मुख्यमंत्री बने. एमजीआर फिल्मों के साथ-साथ राजनीति में भी करूणानिधि के घनिष्ठ सहयोगी थे मगर सत्ता की चाहत में उन्होंने 1972 में अलग अन्ना द्रमुक बनाया और 1977 से 1987 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे. एमजीआर की मृत्यु के बाद उनकी अभिन्न साथी जे जयललिता संघर्ष करके अन्ना द्रमुक मुखिया बनीं. वे 1991 से 2016 के बीच 14 साल तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं. करुणानिधि इन सबसे अधिक करीब दो दशक राज्य के मुख्यमंत्री, 13 बार विधायक और पांच दशक द्रमुक अध्यक्ष रहे.

जयललिता 2016 और करूणानिधि 2018 में दुनिया छोड़ चुके. रजनीकांत ने मैदान खाली देख नया दल बनाने और 2021 का विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की है. रजनीकांत की लोकप्रियता के मद्देनजर इसे उनके लिए सुनहरा मौका माना जा सकता है मगर द्रविड़ दलों द्वारा सत्ता की प्रबल दावेदारी के बीच द्रविड़ अस्मिता की रक्षा में उनके योगदान पर सवाल उठना लाजिमी है. द्रविड़ अस्मिता की राजनीति उनके और सत्ता के बीच क्या सबसे बड़ी बाधा साबित होगी? रजनीकांत उसकी कैसे काट करेंगे? क्या रजनीकांत को आगे करके बीजेपी तमिलनाडु की राजनीति को पेरियार—अन्नादुरै और करूणानिधि द्वारा पोषित द्रविड़ विचारधारा से मुक्त करना चाहती है? सवाल यह भी है कि 70 साल के रजनीकांत कौन से राजनीतिक धरातल पर अपने दल की बुनियाद रखेंगे? क्या उनका निजी करिश्मा तमिलनाडु में दशकों से पैठी द्रविड़ अस्मिता की भावना से पार पाने के लिए काफी होगा? वे सिर्फ अपने करिश्मे के बूते चले तो भी क्या उन्हें नया जातीय रसायन तैयार नहीं करना पड़ेगा? वे एकला चलेंगे अथवा राज्य में जारी गठबंधन की राजनीति करेंगे?

रजनीकांत की राजनीतिक मंशा को बीजेपी की सहयोगी सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के उपमुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वन ने उनसे गठबंधन की पेशकश करके विवादास्पद बना दिया. पन्नीरसेल्वन ने रजनीकांत के राजनीतिक दल बनाने का स्वागत किया और दोनों दल के गठबंधन की पेशकश कर दी. इससे पहले आरएसएस से जुड़े चार्टर्ड अकाउंटेंट एस गुरूमूर्ति की उनसे मुलाकात और राजनीति में आने के आग्रह संबंधी कयासों पर भी उंगलियां उठ चुकी हैं. यूं भी द्रविड़ राजनीति तो निरीश्वरवाद पर आधारित है मगर रजनीकांत अपना धार्मिक एवं आध्यात्मिक रूझान किसी से छुपाते नहीं हैं. आगामी जनवरी में नया राजनीतिक दल चालू करने की घोषणा में भी उन्होंने ईमानदार,पंथनिरपेक्ष मगर आध्यात्मिक राजनीति की मंशा जताई है.

द्रविड़ दलों के अलावा उनके सामने कमला हासन की मक्कल नीधी मैयम, कैप्टन विजयकांत की डीएमडीके, डॉ रामदॉस की पीएमके, वाइको की एमडीएमके जैसे लोकप्रिय नेताओं और दलों की चुनौती भी है. कमला हासन ने पिछले दिनों अपनी पार्टी मक्कल नीधी मैयम का जनाधार बढ़ाने के गंभीर प्रयास किए हैं. उन्होंने पंथ निरपेक्ष राजनीति के जरिए सत्ता पाकर जनता को उसके हुकूक दिलाने की मंशा जताई है. साल 2018 में बना यह दल 2019 में 37 सीट पर संसदीय चुनाव लड़कर 3.72 फीसद वोट पा चुका है. उसके बाद से कमला ने लोकप्रिय पूर्व आईएएस अफसर डॉ संतोष बाबू सहित कुछ नेताओं को पार्टी में शामिल करके जनाधार बढ़ाने पर ध्यान दिया है.
संतोष बाबू गरीबों एवं वंचितों के कल्याण के कामों की बदौलत अपनी जमीनी साख के बूते पार्टी का संगठन मजबूत कर रहे हैं. एमबीबीएस डॉक्टर बाबू सार्वजनिक प्रबंध में सिंगापुर नैशनल यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर डिग्रीधारी हैं. स्वयं सहायता समूहों की एक लाख से अधिक प्रति वाली पत्रिका, बच्चों की पत्रिका और प्रशासनिक अधिकारियों की पत्रिका के वे संपादक रहे हैं. कृष्णागिरि जिले में कलेक्टरी के दौरान बाल मजदूरी उन्मूलन तथा शिक्षा के प्रसार में उनके योगदान की प्रशंसा तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम अपने भाषण में कर चुके हैं. उन्हें तमिलनाडु सरकार से सर्वश्रेष्ठ कलेक्टर और इंडियन एक्सप्रेस अखबार द्वारा 'प्राइड आॅव तमिलनाडु' के खिताब से भी नवाजा जा चुका है.

द्रविड़ दलों की कमान द्रमुक में करूणानिधि के बेटे एम के स्टालिन के हाथ में और अन्ना द्रमुक की मुख्यमंत्री एडापड्डी पलानिसामी के पास है. पलानिसामी तो खुद को मई—2021 विधानसभा चुनाव के लिए अन्नाद्रमुक का मुख्यमंत्री चेहरा भी घोषित करवा चुके. बीजेपी के अन्ना द्रमुक से गठबंधन की पुष्टि खुद गृहमंत्री अमित शाह चेन्नई में पलानिसामी की मौजूदगी में उनकी सहमति से कर चुके. द्रमुक का पिछले विधानसभा चुनाव से ही कांग्रेस सहित अन्य दलों से गठबंधन है. साल 2019 में द्रमुक गठबंधन राज्य की 39 में से 38 सीट जीत चुका है. अन्ना द्रमुक पर जहां लगातार दस साल सत्तारूढ़ होने से जनता की नाराजगी का बोझ है वहीं उसके पास जयललिता जैसा लोकप्रिय चेहरा भी नहीं है.

पार्टी की पूर्व महासचिव ससिकला नटराजन के सजा काट कर चार साल बाद अगली जनवरी में बाहर आने का भी अन्ना द्रमुक और राज्य की राजनीति पर असर पड़ना लाजिमी है. पन्नीरसेल्वम को खदेड़ कर पलानिसामी दरअसल ससिकला की कृपा से ही मुख्यमंत्री बने थे. ससिकला ने पांच दिसंबर, 2016 को जयललिता की मृत्यु के बाद अन्नाद्रमुक की साधारण सभा से खुद को कार्यकारी महासचिव घोषित करवाया और पलानिसामी की आड़ में सरकार की कमान भी संभाल ली. फिर आय से अधिक संपत्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट से सजा मिली और उन्हें चार साल जेल की हवा खानी पड़ी. मुख्यमंत्री पलानिसामी ने पन्नीरसेल्वम को उपमुख्यमंत्री बनाया और मौका देखकर पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली. अन्नाद्रमुक से निष्कासित ससिकला के लिए उनके भतीजे टीटीवी दिनकरन ने अम्मा मक्कल मुनेत्र कषगम नाम से नया राजनीतिक दल बना ही रखा है. राजनीतिक पर्यवेक्षकों की मानें तो ससिकला के बाहर आने पर अन्ना द्रमुक में उठापटक से भी इंकार नहीं किया जा सकता. मुख्यमंत्री पलानिसामी को अपदस्थ करने की उनके द्वारा हरचंद कोशिश की भी आशंका है. यह दीगर है कि खुद को पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करवा के और बीजेपी को साथ रखकर पलानिसामी ने अपनी मजबूत घेरेबंदी की हुई है.देखना यही है कि ऐसे पेचीदा राजनीतिक समीकरणों के बीच रजनीकांत कौन सी राजनीतिक लाइन अपना कर तमिलनाडु की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचेंगे. देश के दूसरे सर्वोच्च सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित रजनीकांत के प्रशंसक हालांकि उन्हें पहले से ही 'तलैवा' यानी अपना 'नेता' पुकारते हैं मगर लोकप्रियता की असली परीक्षा अब जनता की अदालत में होगी. रजनीकांत हिंदी एवं तमिल सहित देश की अनेक भाषाओं में करीब 160 फिल्मों में अभिनय कर चुके. बेंगलुरू में बस कंडक्टर से तमिल फिल्मों के महानायक बने रजनीकांत उर्फ शिवाजीराव गायकवाड़ मैसूर रियासत, अब कर्नाटक, के मध्यवर्गीय मराठी परिवार में 1950 में पैदा हुए थे. तमिल सिनेमा और राजनीति में लोकप्रिय एम करूणानिधि एवं एमजीआर द्वारा लिखी और अभिनीत सामाजिक परिवर्तन वाली मशहूर फिल्मों के विपरीत रजनीकांत माफिया सरगना बाश्शा जैसे आधुनिक किरदार फिल्मों में निभा कर लोकप्रिय हुए हैं. इसलिए वे किसी विचारधारा से नहीं बंधे और बीजेपी एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी नजदीकी की भी यही मुख्य वजह मानी जाती है.

वे तिरूपति बालाजी मंदिर और सत्यसाईं बाबा सहित मंत्रालयम के राघवेंद्र स्वामी के भक्त हैं. उन्होंने 1981 में लता से शादी भी तिरूपति बालाजी मंदिर में ही की थी. अपनी असल कमाई छुपाने के जुर्म में उन्हें आयकर विभाग को जुर्माना भी चुकाना पड़ चुका है. साथ ही वे अपना पैसा 18 फीसद ब्याज दर पर देने की बात भी आयकर विभाग से कबूल चुके हैं. उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके रजिस्टर्ड फैन क्लबों की संख्या ही 50,000 है. इनमें से हरेक फैन क्लब में कम से कम 25 और अधिकतम सैकड़ों सदस्य हैं. इनमें अधिकतर युवा प्रशंसकों ने ही रजनीकांत को राजनीति करने के लिए प्रेरित किया है. इससे साफ है कि चुनावी राजनीति में उन्हें मतदान बूथ पर कार्यकर्ताओं की कोई किल्लत नहीं होने वाली. चुनावी राजनीति में बूथस्तरीय प्रबंध ही सबसे जरूरी है. देखना यही है कि नाम—दाम और अनुभव की विशद पूंजी थामे रजनीकांत अपने प्रशंसकों के बाद अब तमिलनाडु की राजनीति के भी तलैवा साबित हो पाएंगे.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
अनंत मित्तल

अनंत मित्तलवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार,लेखक,अनुवादक हैं. प्रिंट, रेडियो, टीवी एवं डिजिटल पत्रकारिता का लंबा अनुभव. जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, पीटीआई भाषा, दूरदर्शन आदि समूहों में संपादन, रिपोर्टिंग,प्रोडक्शन संबंधी कार्य किया है.

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First published: December 4, 2020, 4:47 PM IST
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