नेपाल में संसद की बहाली से गहराएगी सत्ता की रस्साकशी

ओली को सत्तारूढ़ नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा बर्खास्त किया जा चुका है. हालांकि, नेपाल के चुनाव आयोग ने ओली को पद से हटाने और पार्टी से निकाले जाने के नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के फैसले पर भी रोक लगा रखी है.

Source: News18Hindi Last updated on: February 26, 2021, 9:59 PM IST
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नेपाल में संसद की बहाली से गहराएगी सत्ता की रस्साकशी
ओली की अवैधानिक हरकत से देश का गणतांत्रिक ढांचा कमजोर हुआ और राजशाही समर्थकों को राजतंत्र की बहाली के लिए आंदोलन छेड़ने का मौका मिला है. (फोटो साभार-News18 English)

नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने संसद का निचला सदन भंग करने को अवैधानिक बताते हुए उसकी बहाली का आदेश देकर कार्यवाहक प्रधानमंत्री खड़ग प्रसाद शर्मा ओली के सियासी मंसूबों पर पानी फैर दिया है. कोर्ट द्वारा मंगलवार को मध्यावधि चुनाव रद्द करके मार्च के दूसरे सप्ताह तक संसद के निचले सदन की बैठक बुलाने का आदेश देने से सत्ता की खीेचतान तेज होगी. ओली द्वारा 20 दिसंबर, 2020 को अचानक 275 सदस्यीय निचला सदन भंग करके मध्यावधि चुनाव कराने की सिफारिश को राष्ट्रपति बिद्यादेवी भंडारी ने मंजूरी दे दी थी. मध्यावधि चुनाव की तिथियां 30 अप्रैल एवं 10 मई घोषित की गई थीं. ओली तो चुनाव प्रचार में जुटे थे.


सुप्रीम कोर्ट के आदेश से नेपाल में जारी राजनीतिक अस्थिरता का नया दौर थमने के आसार हैं. गौरतलब है कि भारत के दूसरे पड़ोसी देश म्यांमार में आंग सान सू ची की निर्वाचित सरकार को अपदस्थ करके सेना द्वारा सत्ता हथियाने के विरोध से अस्थिरता फैली हुई है. नेपाल के कार्यवाहक प्रधानमंत्री ओली ने एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में अपने प्रतिद्वंद्वी पुष्प कमल दहाल उर्फ प्रचंड एवं माधब कुमार नेपाल को राजनीतिक शिकस्त देने के लिए निचला सदन भंग किया था. अब प्रचंड ने ओली के इस्तीफे की मांग की है. उनके अनुसार यदि ओली में जरा सी भी गैरत बाकी है तो उन्हें इस्तीफा देना चाहिए.


राष्ट्रपति के फैसले को नेपाल के चीफ जस्टिस चौलेंद्र शमशेर राणा की अगुआई वाली पांच सदस्यीय पीठ ने अवैधानिक करार दिया है. राष्ट्रपति के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कुल 13 याचिका दायर थीं. इनमें नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्य सचेतक देव गुरुंग की याचिका भी है. कोर्ट ने मंगलवार को सभी याचिकाओं पर साथ सुनवाई की. संविधान पीठ ने एकमत से निचले सदन की बहाली का आदेश दिया क्योंकि नेपाल के संविधान के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा वैकल्पिक सरकार बनाने के लिए सभी विकल्प आजमाए बिना संसद को भंग करके मध्यावधि चुनाव की घोषणा नहीं की जा सकती. इस प्रावधान का नेपाल के संविधान में विशेष उल्लेख है.


ओली को सत्तारूढ़ नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा बर्खास्त किया जा चुका है. हालांकि, नेपाल के चुनाव आयोग ने ओली को पद से हटाने और पार्टी से निकाले जाने के नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के फैसले पर भी रोक लगा रखी  है. नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के कार्यकारी अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड ने ओली की हरकत को पार्टी के नियम—प्रक्रियाओं के साथ ही देश के संविधान का भी उल्लंघन बताया है. मध्यावधि चुनाव की घोषणा के बावजूद ओली द्वारा नियुक्त किए गए 32 संवैधानिक पदाधिकारियों के भविष्य पर भी ताजा हालात में सवालिया निशान लग गया है. इन 32 लोगों को कार्यवाहक प्रधानमंत्री ओली ने नियमानुसार संसद के अनुमोदन के बगैर ही पद की शपथ दिला दी थी. प्रचंड गुट और विपक्ष इन नियुक्तियों को अवैध ठहराता आ रहा है.


ओली की अवैधानिक हरकत से देश का गणतांत्रिक ढांचा कमजोर हुआ और राजशाही समर्थकों को राजतंत्र की बहाली के लिए आंदोलन छेड़ने का मौका मिला है. प्रचंड—नेपाल धड़े के साथ निर्वाचित सांसदों की संख्या, ओली के प्रति निष्ठावान सांसदों से कहीं अधिक है. पूर्व प्रधानमंत्री माधब नेपाल अब पार्टी के चेयरमैन हैं. ओली भी अपने द्वारा नीत धड़े के चेयरमैन और प्रधानमंत्री के नाते सरकार के मुखिया हैं. प्रचंड गुट को पार्टी के केंद्रीय सचिवालय, संचालन समिति एवं केंद्रीय समिति में भी बहुमत हासिल है. संसद की बहाली के आदेश की खुशी प्रचंड गुट ने जुलूस निकाल कर मनाई.


ओली को उनके 70वें जन्मदिन के मौके पर सुप्रीम कोर्ट से लगे झटके के तहत उन्हें 13 दिन में संसद में अपना बहुमत साबित करना है. प्रधानमंत्री पद पर काबिज रहने के लिए ओली पार्टी के निर्वाचित सांसदों को साम दाम दंड भेद के जरिए अपने पाले में खींचने की अंतिम कोशिश कर सकते हैं. हालांकि प्रचंड गुट को सत्ता से महरूम रखने के लिए ओली पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व में नेपाली कांग्रेस की सरकार को समर्थन भी दे सकते हैं. इसका आधार सत्ता की रेवड़ियों की बंदरबांट हो सकता है. ओली के इस्तीफा नहीं देने पर राष्ट्रपति से उनकी सरकार बरखास्त करवाने की गुजारिश कर के प्रचंड—नेपाल गुट भी नेपाली कांग्रेस से गठबंधन करके सरकार बना सकता है.


निचले सदन को भंग करने की वजह ओली ने अपनी पार्टी में ही विरोधी गुट द्वारा सरकारी कामकाज में अड़ंगा लगाना तथा उन्हें संगठन के चेयरमैन पद से हटाने की साजिश बताया था. उनके अनुसार बहुमत की सरकार के मुखिया के नाते प्राप्त अधिकार के तहत ही उन्होंने संसद भंग करके नए जनादेश की घोषणा की सिफारिश राष्ट्रपति से की थी. इसके विरोध में नेपाल में कई दिन प्रदर्शन और धरने चले. साल 2018 में हुए आम चुनाव में एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी को मिले दो—तिहाई बहुमत के बूते करीब दो दशक बाद नेपाल में स्थिर सरकार बनने की आस जगी थी.


यह पार्टी नेपाल की दो अलग—अलग कम्युनिस्ट पार्टियों के विलय से बनी थी. एकीकृत पार्टी का पहला संयुक्त अधिवेशन आगामी अप्रैल में प्रस्तावित था मगर सत्ता की रस्सकशी में उससे पहले ही पार्टी दो धड़ों में बंट गई. मध्यावधि चुनाव की घोषणा के बाद पिछले दो महीने में चीन ने दोनों गुटों को साथ रखने के लिए पूरा जोर लगाया मगर बात नहीं बनी. चीन की राजदूत होउ यांकी के साथ ही वहां के उपमंत्री के नेतृत्व में आए पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने भी ओली तथा प्रचंड के बीच सुलह—सफाई की भरसक कोशिश की मगर कामयाब नहीं हुए.


प्रचंड ने नेपाल को राजनीतिक संकट से निकालने के लिए भारत  का सहयोग मांगा मगर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने उनके आंतरिक मामले में दखल से इंकार कर दिया. यह दीगर है कि दोनों देशों के राजनीतिक नेताओं के बीच अनौपचारिक बातचीत जारी है. अब दोनों ही गुटों ने खुद को असल नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी घोषित करवाने के लिए चुनाव आयोग में दरख्वास्त दी हुई है. देखना यही है कि सत्ता की मलाई की हांडी अब नेपाल में किसके हाथ लगेगी? संसद के निचले सदन की बहाली ने जहां ओली को कमजोर किया है वहीं उनके विरोधियों की बांछें खिला दी हैं. भारत तो यही चाहेगा कि नेपाल में जो भी सरकार बने वह अपने देश को राजनीतिक स्थिरता प्रदान करे ताकि कोविड—19 महामारी से पीड़ित अर्थव्यवस्था को उबार कर गरीबों को राहत दे सके. नेपाल की एक—तिहाई आबादी भारत में ही रोजगार करके अपने गांवों में बसे परिवारों का भरण पोषण करती है. महामारी ने नेपाल के अनेक प्रवासी कामगारों को भारत ही नहीं चीन, थाईलैंड, बांग्लादेश आदि से भी अपने गांव लौटने को मजबूर किया हुआ है जिससे नेपाल में गरीबी गहराने का अंदेशा है.


(ये लेखक के निजी विचार हैं.)


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
अनंत मित्तल

अनंत मित्तलवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार,लेखक,अनुवादक हैं. प्रिंट, रेडियो, टीवी एवं डिजिटल पत्रकारिता का लंबा अनुभव. जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, पीटीआई भाषा, दूरदर्शन आदि समूहों में संपादन, रिपोर्टिंग,प्रोडक्शन संबंधी कार्य किया है.

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First published: February 26, 2021, 9:55 PM IST
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