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‘घरेलू कार्य’ के लिए महिलाओं को वेतन देने का वादा क्रांतिकारी! राजनीति में ला सकता है तूफान

Wages for housewives: घरों में गृहिणियों के परिश्रम की तस्दीक आंकड़े भी कर रहे हैं. रोजाना 15 से 59 साल आयु की लड़कियों और स्त्रियों मे से 92 फीसद अवैतनिक घरेलू काम करती हैं. देश में औपचारिक रोजगार महज 23 फीसद स्त्रियों को नसीब है, जिसकी दर महामारी काल में और भी घटी है.

Source: News18Hindi Last updated on: January 18, 2021, 6:30 PM IST
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‘घरेलू कार्य’ के लिए महिलाओं को वेतन देने का वादा क्रांतिकारी! राजनीति में ला सकता है तूफान
स्त्रियों द्वारा घर-परिवार चलाने में खर्च परिश्रम को अदालतों ने ‘महिलाओं का अवैतनिक घरेलू एवं देखभाल कार्य’ परिभाषित किया है. फाइल फोटो
अभिनेता से राजनेता बने कमल हासन की पार्टी मक्कल नीधी मैयम ने अपनी सरकार बनने पर गृहलक्ष्मियों यानी चारदीवारी में महदूद घर-परिवार की साज-संभाल करने वाली गृहिणियों को भी मासिक वेतन देने की घोषणा करके चाय के प्याले में तूफान ला दिया है. कमल हासन के वायदे में महिला सशक्तिकरण की असीमित गुंजाइश के बावजूद अभिनेत्री कंगना रणौत ने उन पर महिलाओं के प्यार और समर्पण की बोली लगाने का आरोप मढ़ दिया. वे कहती हैं "अपने बच्चों की मां का जिम्मा निभाने का दाम मत लगाओ. भावनाओं की तिजारत मत करो." अलबत्ता कांग्रेस सांसद, लेखक एवं पूर्व राजनयिक शशि थरूर ने गृहिणियों को मासिक वेतन देने की कमल हासन की पेशकश का तहेदिल से स्वागत किया है. उनके अनुसार वेतन मिलने से महिलाओं की सेवा का मान बढ़ेगा, उसका वित्तीय दाय उन्हें मिलेगा और इससे वे सशक्त एवं स्वायत्त होंगी.

ऐसा कतई नहीं है कि घर-परिवार की देखभाल में अपना जीवन खपा देने वाली महिलाओं के परिश्रम की कीमत का मूल्यांकन पहली बार हो रहा है. परिश्रम की तकनीकी परिभाषा में महिलाओं द्वारा घर-परिवार चलाने में खर्च उनके परिश्रम का आर्थिक मूल्यांकन तलाक से लेकर मोटर दुर्घटना मुआवजा पंचाटों तक अदालतों में बखूबी हुआ है. हां, उसके लिए संस्थागत प्रत्यक्ष वित्तीय दाय चुकाने का वायदा किसी राजनीतिक दल ने पहली बार किया है.

अलबत्ता मुफ्त रसोई गैस उज्ज्वला कनेक्शन, विधवा एवं बुजुर्ग महिलाओं को राज्यों से पेंशन का भुगतान, मनरेगा में महिलाओं को साल में 100 दिन रोजगार, लड़कियों को मुफ्त शिक्षा तथा उनके विवाह के लिए नकद सहायता, सब्सिडी युक्त सस्ते रसोई गैस सिलेंडर की शक्ल में स्त्रियों की प्रत्यक्ष एवं परोक्ष आर्थिक सहायता सरकारों द्वारा लंबे समय से की जा रही है. स्त्रियों द्वारा घर-परिवार चलाने में खर्च परिश्रम को अदालतों ने ‘महिलाओं का अवैतनिक घरेलू एवं देखभाल कार्य’ परिभाषित किया है. सवेतन घरेलू सहायिकाओं, व्यावसायिक सेक्स, देखभाल कार्य एवं किराए की कोख आदि के चलन ने गृहिणियों द्वारा मुफ्त दी जाने वाली घरेलू कार्य, प्रजनन, संतान एवं बड़े-बुजुर्गों की देखभाल आदि सेवाओं की कीमतों का निर्धारण तो पहले से ही कर रखा है.

किंग्स कॉलेज लंदन में विधि एवं सामाजिक न्याय विषय की प्राध्यापक प्रभा कोटिस्वरन ने भी गृहिणियों को वेतन देने के प्रस्ताव का स्वागत किया है. उनके अनुसार घरेलू काम के लिए पारिश्रमिक आंदोलन के तहत तो हालांकि महिलाओं द्वारा घरेलू कामकाज बंद कर देने पर जोर दिया जा रहा है, मगर भारत में गृहिणियों को वेतन देकर इसकी शुरूआत करना बेहतर रहेगा. उनकी राय में स्त्रियों द्वारा अपनी मेहनत के रूप में घर, राज्य एवं पूंजी निर्माण के लिए दी जा रही आर्थिक सहायता का मूल्यांकन करना आवश्यक है. उससे पुरूषवादी भारतीय परिवारों को घर-परिवार में उनके वास्तविक एवं महत्वपूर्ण योगदान का सही मायनों में पता चलेगा.
उनके अध्ययन के अनुसार अदालतों द्वारा दुर्घटनाओं में स्त्रियों की मौत के हर्जाने की राशि के आंकलन के लिए पुरूषों के रोजगार की तर्ज पर ही महिलाओं के घरेलू कार्य एवं देखभाल के लिए पारिश्रमिक का निर्धारण करके उनके प्रजननशील वर्षों से उसको गुणा कर दिया जाता है. घर में स्त्रियों के परिश्रम के मूल्यांकन में अदालतों ने प्रगतिशील नजरिया अपनाते हुए घर से बाहर कामकाज करने वाली स्त्रियों के हवाले से गृहिणियों का समुचित वेतन तय करने पर जोर दिया है.

इसके लिए स्त्रियों के अधिकारों के संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र, मानवाधिकार कानून, श्रम कानून, संविधान प्रदत्त बुनियादी अधिकारों और बाजार में पारिश्रमिक की प्रचलित दरों का भी सहारा लिया गया है. उनका प्रश्न है कि पत्नी की मृत्यु के बाद जब अदालत पति को उसके आजीवन परिश्रम, समर्पण, ममता आदि से वंचत्व के आधार पर हर्जाना दे सकती हैं तो महिलाओं को जीते जी उनके परिश्रम एवं समर्पण का वित्तीय मेहनताना देना तो सरासर जायज है.

घरों में गृहिणियों के परिश्रम की तस्दीक आंकड़े भी कर रहे हैं. रोजाना 15 से 59 साल आयु की लड़कियों और स्त्रियों मे से 92 फीसद अवैतनिक घरेलू काम करती हैं. देश में औपचारिक रोजगार महज 23 फीसद स्त्रियों को नसीब है, जिसकी दर महामारी काल में और भी घटी है. इसके बावजूद गृहिणियों के परिश्रम का सही मूल्यांकन कठिन काम होगा. इसमें भी परिवारों की मासिक आमदनी की सीमा तय करना जरूरी होगा, वरना संपन्न घरानों की गृहिणियों को तो घर में उनके दाय का वेतन मिलेगा मगर गरीब परिवारों की घर और बाहर दोनों कामों की जिम्मेदारी उठाने वाली स्त्रियों के हाथ खाली रह जाएंगे. जाहिर है कि लाभार्थी स्त्रियों के बैंक खाते खुलवाने से लेकर उनको मिले वेतन को पतियों की अय्याशी में उड़ने से बचाने का निगरानी तंत्र बनाना भी चुनौतीपूर्ण होगा.भारत में साल 2011 की जनगणना के अनुसार 16 करोड़ स्त्रियों का पूर्णकालिक व्यवसाय घरेलू कामकाज ही उल्लिखित है. सो घरेलू काम के लिए वेतन के जरिए वे अपना आर्थिक आधार बना पाएंगी और बेरोकटोक शोषण का विरोध करने में सक्षम होंगी. अपने हाथ में चार पैसे होने पर वे उत्पीड़क शादी को तोड़ कर अपने बच्चों को अलग पालने की हिम्मत भी जुटा पाएंगी. वेतन के बदले किसी दूसरे के घर में वही काम करने में झिझक भी नहीं होगी. रूढ़िवादी ताकतें घरेलू काम के लिए सरकार से महिलाओं को वेतन मिलने को स्त्रियों के प्यार एवं समर्पण को पैसे में तोलने और उससे परिवार टूटने का भय भी दिखा सकती हैं. मणिकर्णिका फिल्म में रानी झांसी, लक्ष्मी बाई जैसा क्रांतिकारी किरदार निभा चुकीं कंगना द्वारा अपने ही लिंग की बहबूदी की राह खुलने का विरोध भी ऐसा ही है.

इसके बावजूद घरेलू काम के लिए वेतन से महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की जो राह खुलेगी, उससे परिवार, समाज, सरकार और देश को चौतरफा फायदा होगा. तार्किक दृष्टि से भी इस पेशकश से विशुद्ध घर चलाने वाली गृहिणियों के परिश्रम के सकारात्मक मूल्यांकन के बूते उन्हें पारिश्रमिक मिलेगा. उससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बदलेगी, क्योंकि सर्वेक्षण बताते हैं कि स्त्रियों की कमाई अमूमन घर-परिवार पर ही खर्च होती है. वेतन मिलने से उनकी पारिवारिक एवं सामाजिक हैसियत में इजाफा भी होगा.

कमल हासन के अनुसार उनके दल एमएनएम की सरकार भारतीयार यानी फिल्मकार भारती राजा की फिल्म ‘पुधुमाई पेन्न’ यानी ‘आधुनिक स्त्री’ की परिकल्पना को साकार करने के लिए महिलाओं की शिक्षा, रोजगार एवं उद्यमिता विकास पर ध्यान देगी. गृहिणियों की मेहनत और समर्पण को सम्मानित करने के लिए उनकी सरकार उन्हें मासिक वेतन देगी. इस वायदे के जरिए कमल हासन तमिलनाडु की राजनीति में सर्व स्वीकार्य नेता बनने की अपनी आकांक्षा पूरी करने के जुगाड़ में भले हों, मगर इसमें गृहिणियों के सशक्तिकरण की असीम गुंजाइश है. यह पेशकश उसी तरह क्रांतिकारी साबित हो सकती है, जैसे एमजीआर द्वारा स्कूलों में बच्चों के लिए शुरू की गई दोपहर के भोजन की योजना. दोपहर भोजन योजना को अंततः शिक्षा के बुनियादी अधिकार को साकार करने के लिए पूरे देश में लागू किया गया.

थलैवा रजनीकांत द्वारा अपने नरम स्वास्थ्य की दुहाई देकर राजनीति से तौबा करने के बाद कमल हासन की आकांक्षा और सक्रियता दोनों बढ़ी हैं. उनकी पार्टी एमएनएम 2019 के लोकसभा चुनाव में साढ़े तीन फीसद वोट हासिल कर चुकी है. अब वे खुद को एमजीआर का उत्तराधिकारी बता रहे हैं, क्योंकि उनसे कमल हासन के अच्छे ताल्लुक थे. हालांकि एमजीआर यानी तमिल फिल्मों के सुपर स्टार एवं राजनीति में पेरियारवादी द्रविड़ अस्मितावादी समूह में शामिल रहे एम जी रामचंद्रन को अन्ना द्रमुक अपना कॉपीराइट बताते नहीं अघाती.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 17 जनवरी को उनकी जयंती पर उन्हें भारत रत्न एमजीआर के रूप में श्रद्धांजलि दी और देश तथा तमिलनाडु की तरक्की में उनके योगदान को याद किया. तमिलनाडु में एमजीआर की जयंती सत्तारूढ़ अन्ना द्रमुक के मुख्यमंत्री एडापड्डी पलानिस्वामी एवं उपमुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वन ने भी उनकी मूर्ति को माला पहना कर, मिठाई सहित अन्य चीजें बांट कर धूमधाम से मनाई. जाहिर है कि चुनावी साल होने के कारण एमजीआर को द्रमुक के अलावा कमल हासन से लेकर ससिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरन तक तमाम नेताओं ने बढ़-चढ़ कर याद किया.

अन्नाद्रमुक की स्थापना स्वयं एमजीआर ने 17 अक्टूबर,1972 को मदुरै में द्रमुक और करूणानिधि से अलग होकर की थी. उनकी बदौलत अन्नाद्रमुक 1977 से 1987 तक पूरे 10 साल सत्तारूढ़ रही और वे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे. उन्होंने स्कूलों में दोपहर के भोजन जैसी अनेक कल्याणकारी योजनाएं लागू करके लगातार दो बार विधानसभा चुनाव जीता. उनकी विरासत फिल्मों में उनकी हीरोइन और राजनीतिक जीवन संगिनी जे जयललिता को मिली और वे भी छह बार कुल 14 साल तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं.

पुराची तलैवी जयललिता का दिसंबर 2016 में और एमजीआर के पुराने साथी और बाद में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी तथा 16 साल मुख्यमंत्री रहे कलैनर एम करूणानिधि का अगस्त 2018 में निधन हो चुका. करूणानिधि के पुत्र एम के स्टालिन अब द्रमुक के सर्वेसर्वा हैं और इसी साल मई में होने वाले विधानसभा चुनाव में सत्ता के प्रबल दावेदार हैं. द्रमुक गठबंधन साल 2019 में लोकसभा की 38 सीट जीत चुका है.

पलानिस्वामी भी खुद को अन्नाद्रमुक का मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करवा चुके हैं. गृहमंत्री अमित शाह खुद चेन्नई में बीजेपी के अन्नाद्रमुक से चुनावी गठबंधन का ऐलान कर चुके हैं. फिर भी आरएसएस के वरिष्ठ कार्यकर्ता एवं तुगलक पत्रिका के संपादक एस गुरूमूर्ति द्वारा अन्नाद्रमुक को अपनी ही अपदस्थ महासचिव ससिकला से गठजोड़ पर विचार करने की सलाह देने से खासी सुगबुगाहट है.

ससिकला पिछले चार साल से कर्नाटक की जेल में जबरदस्त भ्रष्टाचार की सजा काट रही हैं. उन्हें जयललिता एवं दो अन्य साथियों सहित सुप्रीम कोर्ट ने सजा सुनाई थी. उनकी रिहाई दो हफ्ते में ही होने को है, जिससे अन्नाद्रमुक में उठापटक सहित तमिलनाडु में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल सकते हैं. उनके भतीजे टीटीवी दिनाकरन भी अम्मा मक्कल पार्टी बनाकर शिद्दत से उनके इंतजार एवं पलानिस्वामी पर वार की फिराक में हैं.

*ये लेखक के निजी विचार हैं.
ब्लॉगर के बारे में
अनंत मित्तल

अनंत मित्तलवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार,लेखक,अनुवादक हैं. प्रिंट, रेडियो, टीवी एवं डिजिटल पत्रकारिता का लंबा अनुभव. जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, पीटीआई भाषा, दूरदर्शन आदि समूहों में संपादन, रिपोर्टिंग,प्रोडक्शन संबंधी कार्य किया है.

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First published: January 18, 2021, 6:30 PM IST
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