Opinion : कोरोना के पॉजिटिव भी हो सकते हैं प्रभाव, बस गांवों को बनाना होगा विकास की धुरी!

कोरोना के इस दौर में एक बात जो सबसे कॉमन है, वह है कि हर आदमी अपने घर भाग रहा है. आप देखें तो चाहे वह बड़ा आदमी हो, कामकाजी हो या मजदूर, हर कोई अपने घर भागने की जल्दी में है. दुनियाभर में रेस्क्यू ऑपरेशन चल रहे हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: May 9, 2020, 3:44 PM IST
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Opinion : कोरोना के पॉजिटिव भी हो सकते हैं प्रभाव, बस गांवों को बनाना होगा विकास की धुरी!
पिछले करीब 2 महीने से दुनियाभर में हर तरह की गतिविधियों पर ताला लगा हुआ है.
वर्तमान समय में जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस की महामारी से लड़ रही है. दुनिया के करीब-करीब हर देश में कोरोना का दुष्प्रभाव दिख रहा है. ऐसे में यह सोचने का भी समय है कि क्या कोरोना में कुछ सकारात्मकता भी है. कोरोना में सकारात्मकता की बात करना कुछ लोगों को चौंका जाएगा, क्योंकि अमेरिका जैसा विकसित देश हो या चीन जैसा व्यापारिक रूप से संपन्न देश या भारत जैसा विकासशील देश, हर देश कोरोना की चपेट में है. अलग-अलग देशों में कोरोना से बीमार होने वाले और मरने वालों की संख्या भले ही अलग-अलग हो, लेकिन कोरोना की महामारी ने विकसित देश, विकासशील देश या वो देश जो विकासशील और विकसित दोनों की श्रेणी में नहीं आते हैं सबको अपनी चपेट में ले लिया है. पिछले करीब 2 महीने से दुनियाभर में हर तरह की गतिविधियों पर ताला लगा हुआ है.

कोरोना के दौर में ग्लोबल विलेज की बात बेमानी
जो लोग कुछ दिन पहले तक ग्लोबल विलेज की बात करते थे, उनकी दुनिया घर तक सिमट गई है. एक गांव से दूसरे गांव जाना, एक जिले से दूसरे जिले तक जाना ही मुश्किल हो गया है. ऐसे में एक देश से दूसरे देश जाने की बात करना, तो बेमानी सा लगेगा ही. साफ है अब ये दौर हमें अपनी जड़ों की ओर वापस लौटने को मजबूर कर रहा है, लेकिन हम इसे मजबूरी क्यों मानें. क्या हम इसे एक अवसर की तरह नहीं ले सकते. क्या हम इसी बहाने अपने गांव और अपने घरों को नए सिरे से नहीं संवार सकते. इसका एक उदाहरण कोरोना के दौर में भी देखने को मिला, जब एक स्कूल में रुके क्वारंटाइन किए गए मजदूरों ने जाते-जाते उस स्कूल का रंग-रोगन कर उसका हुलिया बदल दिया. ये सिर्फ एक उदाहरण है कि अगर हम इस तरह अपने गांव को रिटर्न गिफ्ट देने की नीयत से काम करें, तो गांवों में भी अवसरों की कमी नहीं हैं.

कोरोना ने सबको कराया घर के महत्व का अहसास
कोरोना के इस दौर में एक बात जो सबसे कॉमन है, वह है कि हर आदमी अपने घर भाग रहा है. आप देखें तो चाहे वह बड़ा आदमी हो, कामकाजी हो या मजदूर, हर कोई अपने घर भागने की जल्दी में है. दुनियाभर में रेस्क्यू ऑपरेशन चल रहे हैं. दुनिया के अलग अलग देशों की सरकारें अलग अलग देशों में फंसे अपने नागरिकों को वापस बुलाने के लिए खास इंतजाम कर रही हैं. इसी तरह देश में अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री अपने लोगों को उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचाने की कोशिश में लगे हैं. पहले छात्रों को घर पहुंचाया गया और अब मजदूरों की बारी है. हालांकि मजदूरों की हालत सबसे खराब है. देखें तो इस दौर में देश में लाखों की संख्या में मजदूर पैदल चलकर हजारों किलोमीटर की दूरी तय करके अपने घरों को पहुंच रहे हैं. बाद में सरकारों ने उनके लिए ट्रेन और बसों का इंतजाम किया है, यानी हर आदमी अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या दुनिया में सबसे सुरक्षित अपना ही घर है. वर्तमान हालात को देखें, तो जवाब 'हां' में ही है, क्योंकि हर आदमी को अपना घर ही सबसे सुरक्षित लग रहा है. और वो अपने घर लौटने की जल्दी में है.

कैसे मिलेगी गांव पहुंचने वालों को रोटी
शहरों के पलायन के साथ एक सवाल जो सबके जहन में उठ रहा है, वह है कि क्या गांव अपने यहां लौट रहे अपने लोगों को रोटी दे पाएंगे, क्योंकि ये वही लोग हैं जो रोजी-रोटी की तलाश में अपने गांव से हजारों किलोमीटर दूर मां-बाप, घर-बार, खेती, जमीन सब छोड़कर चले गए थे. अब गांवों में रोजगार और रोटी का संकट है. इस संकट का जवाब दुनियाभर की सरकारें तलाश रही हैं, क्योंकि कोरोना की लड़ाई के साथ-साथ रोटी का संकट शुरू हो गया है और इसी संकट ने दुनियाभर की सरकारों को बाजार खोलने पर मजबूर कर दिया है.क्या सबको रोटी देने के लिए तैयार हैं गांव
जब हर आदमी गांव लौट रहा है, ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हमारे गांव इस संकट से लड़ने के लिए तैयार हैं. इस सवाल का जवाब तलाशने हमें थोड़ा-सा पीछे जाना पड़ेगा. भारत की आजादी के साथ ही महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज की बात भी थी. ग्राम स्वराज का मतलब गांव को आत्मनिर्भर बनाने से है. आजमगढ़ के जिलाधिकारी नागेंद्र प्रताप सिंह ने एक फेसबुक पोस्ट के जरिए इन समस्याओं को बहुत सरल तरीके से लोगों को समझाया है. उनके सुझावों को देखें तो गांवो में रहना मुश्किल नहीं है. उनके रोडमैप के हिसाब से यदि गांव के लोग और गांव में आने वाले समय में अपने दैनिक उपयोग की एक लिस्ट बनाएं कि क्या-क्या जरूरतें हैं और उनमें से क्या-क्या गांव में पैदा किया जा सकता है तो इस समस्या का हल आसानी से खोजा जा सकता है.

दरअसल हमारे दैनिक उपयोग के सामानों में आधे से ज्यादा गांव में उपलब्ध हैं और जो नहीं उपलब्ध हैं उनका रॉ-मटीरियल गांव में ही पैदा होता है, एक ओर जहां खाने पीने के ज्यादातर सामान गांव में उपलब्ध हैं, वहीं कुछ सामान ऐसे भी हैं जो गांव में उपलब्ध नहीं है- जैसे शैम्पू, साबुन, किताबें, खेल के सामान दवाइयां इत्यादि. लेकिन उन्हें गांव में बनाना मुश्किल नहीं है, क्योंकि जो मजदूर शहरों से गांव की ओर गए हैं उनमें से ज्यादातर इसी तरह के सामान बनाने की कंपनियों में काम करते थे. ऐसे में यदि सरकारी योजनाएं जैसे ग्रामोद्योग, एमएसएमई की योजनाओं में ये युवा प्रशिक्षण लेकर गांव में ही कुछ उत्पादन शुरू करने में सफल होते हैं तो इससे गांव की आत्मनिर्भरता बढ़ेगी. साथ ही इसको शहरों में भेजकर गांव की आर्थिक स्थिति में भी सुधार लाया जा सकता हैं. हालांकि दवाइयों जैसी कुछ अत्यंत जरूरी वस्तुओं का गांवों में निर्माण संभव नहीं है, लेकिन अगर हम जरूरत की 80 से 90 फीसदी सामान भी गांवों में बना लेते हैं तो शहरों पर हमारी निर्भरता कम होगी, जिससे शहरों की ओर पलायन अपने आप रुक जाएगा.

गांव के विकास में है ही शहरों को फायदा
देश के ज्यादातर शहर भीड़ का दबाव नहीं झेल पा रहे हैं, जिसके कारण शहरों में हर जगह भीड़ दिख रही है साथ ही शहर की आम जरूरतों के लिए मारामारी मची रहती है. हालात ये हैं कि मुम्बई और दिल्ली जैसे शहरों में महीनों के हिसाब से स्लम बस रहे हैं और वोट की राजनीति के कारण इनका नियमीकरण भी किया जा रहा हैं. ऐसे में स्कूल, अस्पलाल, यातायात जैसी सुविधाएं पर्याप्त होने के बाद भी लगातार बढ़ रही भीड़ के कारण चरमरा गई हैं. ऐसे में अगर गांवों से शहरों की ओर पलायन रुकता है तो इसका सीधा फायदा शहरों को भी होगा और गांव के साथ-साथ शहर का जीवन भी आसान होगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी है.)

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अनिल राय

अनिल रायएडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट)

अनिल राय भारत के प्रतिष्ठित युवा पत्रकार हैं, जिन्हें इस क्षेत्र में 18 साल से ज्यादा का अनुभव है. अनिल राय ने ब्रॉडकास्ट मीडिया और डिजिटल मीडिया के कई प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य किया है. अनिल राय ने अपना करियर हिंदुस्तान समाचार पत्र से शुरू किया था और उसके बाद 2004 में वह सहारा इंडिया से जुड़ गए थे. सहारा में आपने करीब 10 वर्षों तक विभिन्न पदों पर कार्य किया और फिर समय उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड में चैनल प्रमुख नियुक्त हुए. इसके साथ ही वह न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में तीन वर्ष तक मैनेजिंग एडिटर रहे हैं. फिलहाल आप न्यूज़ 18 हिंदी में एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट) के तौर पर कार्य कर रहे हैं.

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First published: May 9, 2020, 3:29 PM IST
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