कोरोना संकट: क्या सरकार के पास टैक्स बढ़ाने के सिवाय कोई और रास्ता नहीं है?

सवाल ये उठता है कि कोरोना संकट में जब सरकार से लोग रियायत की उम्मीद लगाए बैठे हैं ऐसे वक्त में सरकार बेतहाशा टैक्स क्यों बढ़ा रही हैं? क्या सरकारों के पास इसका कोई विकल्प है? सरकारें अचानक टैक्स क्यों बढ़ा रही हैं, इसको समझने के लिए हमें पिछले 6 महीने की देश की आर्थिक हालत को समझना पड़ेगा.

Source: News18Hindi Last updated on: May 6, 2020, 4:27 PM IST
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कोरोना संकट: क्या सरकार के पास टैक्स बढ़ाने के सिवाय कोई और रास्ता नहीं है?
बुधवार को शराब की ज्यादातर दुकानें बंद रही
कोरोना संकट (Corona Crisis) में सरकार के सामने अपने नागरिकों को बचाने के साथ साथ देश की अर्थव्यवस्था को बचाना भी कड़ी चुनौती है. यही कारण है कि लगातार हो रहे संक्रमण और मौतों के बाद चाहते हुए भी सरकार ने लॉकडाउन-3 में बहुत सारी छूट देनी पड़ी हैं. इसमें सबसे बड़ी छूट देश भर शराब की दुकानों को खोलने की है. इसको लेकर केंद्र और राज्य सरकारों की आलोचना हो रही है. निशाने पर राज्य सरकारें ज्यादा हैं, क्योंकि शराब की दुकानों पर सीधा नियंत्रण उनका ही होता है. शराब की दुकानों को खोलने के साथ ही राज्य सरकारों ने शराब पर बेतहाशा टैक्स बढ़ा दिया. आंध्र प्रदेश ने जहां 75 फीसदी टैक्स बढ़ाया तो दिल्ली ने 70 फीसदी, वहीं उत्तर प्रदेश और हरियाणा ने शराब की बोतल के हिसाब से टैक्स लगा दिया.

पेट्रोल पर टैक्स से बढ़ जाएगी महंगाई
सरकार का टैक्स सिर्फ शराब पर ही नहीं बढ़ा बल्कि राज्य सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर भी वैट बढ़ा दिया है. इसी तरह केंद्र सरकार ने भी पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दी है. हालात ये है कि करीब 18 रुपये में मिलने वाला पेट्रोल आम आदमी तक पहुंचते-पहुंचते अलग-अलग राज्यों में 70 से ₹75 के बीच में बिक रहा है. ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या सरकार के पास टैक्स बढ़ाने के सिवाय कोई और विकल्प था, क्योंकि शराब पर टैक्स का असर भले ही किसी व्यक्ति विशेष पर पड़े लेकिन पेट्रोल और डीजल पर बढ़े हुए केंद्र और राज्य के करों का बोझ आम आदमी पर सीधे पड़ेगा. सब्जी, राशन या जरूरी सामान ट्रांसपोर्ट के जरिए ही आम आदमी तक पहुंचता है. ऐसे में जब ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ेगी तो निश्चित है कि उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते उस सामान की लागत बढ़ जाएगी अंत में बढ़े टैक्स का बोझ आम आदमी को उठाना पड़ेगा.

आखिर सरकारें क्यों बढ़ा रही हैं इतना टैक्स
सवाल ये उठता है कि कोरोना संकट में जब सरकार से लोग रियायत की उम्मीद लगाए बैठे हैं ऐसे वक्त में सरकार बेतहाशा टैक्स क्यों बढ़ा रही हैं? क्या सरकारों के पास इसका कोई विकल्प है? सरकारें अचानक टैक्स क्यों बढ़ा रही हैं, इसको समझने के लिए हमें पिछले 6 महीने की देश की आर्थिक हालत को समझना पड़ेगा.

टैक्स कलेक्शन से जुड़े एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त कि पर जो बताया वो देश की आर्थिक हालात की तस्वीर साफ करता है. अधिकारी के अनुसार हर साल मार्च-अप्रैल, अक्टूबर- नवंबर में देश में जीएसटी कलेक्शन और राज्यों में वैट का कलेक्शन अन्य महीनों से ज्यादा होता है. अक्टूबर में दशहरा, नवंबर में दीपावली और मार्च में होली पड़ती है. साथ ही अप्रैल या मई महीने में ईद का त्यौहार आता है, आमतौर पर देश का नागरिक त्योहारों पर ज्यादा खरीदारी करते हैं. इसमें लोग गाड़ी, कपड़ों के साथ-साथ और भी सामान खरीदते हैं जिससे सरकार को जीएसटी और अन्य टैक्सों के मद में भारी आमदनी होती है. लेकिन इस साल अक्टूबर महीने में ही सरकार का गणित बिगड़ गया है.

अक्टूबर में दशहरा और दीपावली जैसे दो बड़े त्यौहार एक साथ आ गए जिसके कारण सिर्फ एक महीने के बजट में ही दोनों त्योहारों की खरीदारी करनी पड़ी जिससे लोगों ने कम खरीददारी की और कम टैक्स आया. कुछ यही हाल मार्च और मई में रहता है मार्च जहां होली होती है वहीं मई में मुसलमानों का सबसे बड़ा त्योहार ईद आता है जिस पर देश का हर मुस्लिम पर या परिवार कुछ ना कुछ खरीदारी जरूर करता है. इस खरीदारी में सरकार को बढ़ा टैक्स कलेक्शन होता है यानी सरकारी आंकड़ों की मानें तो अक्टूबर-नवंबर, मार्च और अप्रैल या मई में से 1 महीने में त्योहारी महीने होते हैं. 12 महीने में 4 महीने ऐसे होते हैं जहां टैक्स कलेक्शन की रफ्तार बढ़ती है लेकिन इस बार हालात बद से बदतर होते गए. अक्टूबर में दो त्यौहार एक साथ आए, वहीं मार्च आते-आते होली के त्यौहार से पहले ही देश में कोरोना वायरस ने दस्तक दे दी जिससे बाजारों में सन्नाटा हो गया और लोग घरों में बैठ गए और मॉल, सिनेमा हॉल भी खाली होने लगे.वित्तीय वर्ष की शुरूआत से ही खराब हालात
देश में नया वित्तीय वर्ष शुरू होने के पहले ही कोरोना ने अपना पांव पसारना शुरू किया. 22 मार्च को जनता कर्फ्यू और 23 मार्च से लॉक डाउन शुरू होने के बाद देश के बाजार बंद हो चुके थे. बाजारों में बिक्री खत्म हो गई थी, यहां तक की सड़क पर गाड़ियों का निकलना भी बंद हो गया था, जिससे पेट्रोल डीजल पर सरकार को मिलने वाला टैक्स जीरो के बराबर हो गया. शराब की दुकानों से मिलने वाला टैक्स जीरो हो गया. इसी तरह सिनेमा हॉल और माल बंद हुए तो इंटरटेनमेंट से मिलने वाला टैक्स भी खत्म हो गया, अप्रैल के टैक्स कलेक्शन के आंकड़ों को देखें तो जिन राज्य सरकारों को एक महीने में 12 से15 हजार कोरोड़ पर टैक्स मिलते थे उनके पास 100 से 200 करोड़ टैक्स आया है. जीएसटी का कलेक्शन जो एक लाख करोड़ के आसपास रहता था वह भी 10 हजार करोड़ से नीचे आ गया है. ऐसे में सरकारों के खजाने खाली हैं.

खजाना खाली लेकिन खर्च का दबाव बढ़ा
एक ओर सरकार का टैक्स कलेक्शन लगातार गिर रहा था, दूसरी ओर सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं, देश के मजदूरों के भोजन पर सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं. यहां तक कि सरकार को देश में रोजगार की संभावनाएं तलाशने के लिए एमएसएमएई (MSME) जैसे अकेले सेक्टर में एक लाख करोड़ पैकेज देना पड़ा और आने वाले समय में ढाई लाख करोड़ रुपए देने का अंदाजा लगाया जा सकता है. कई सेक्टर में टैक्स छूट भी दी जा रही है, आने वाले समय में सरकार का टैक्स कलेक्शन कम होने का अनुमान है और आम आदमी की जिंदगी पटरी पर लाने के लिए सरकार को एक बड़े फंड की जरूरत होगी आर्थिक जानकारों की मानें तो सरकार को इस संकट से गुजरने में करीब-करीब 50 लाख करोड़ रुपये खर्च करेने पड़ेंगे.

जल्द हो सकता है जीएसटी की दरों में बदलाव
टैक्स बढ़ाने के क्रम में सरकार आने वाले समय में कई वस्तुओं पर जीएसटी बढ़ा सकती है इसके लिए तैयारी की जा रही है. स्लैब के बदलाव के सवाल के जवाब में जीएसटी से जुड़े अधिकारी ने बाताया कि कुछ महत्वपूर्ण चीजों जीएसटी बढ़ाने की तैयारी कर ली गई हैं और आने वाले जीएसटी काउंसिल की बैठक में इस पर अंतिम फैसला लिया जाएगा और जिस तरह राज्य सराकरें लगातार टैक्स बढ़ा रही हैं उससे तय है कि जीएसटी काउंसिल की बैठक में टैक्स बढ़ाने का विरोध नहीं होगा.

टैक्स बढ़ाने के अलावा क्या है विकल्प
क्या सरकार के पास जनता से बढ़ा टैक्स लेने को छोड़ कोई और विकल्प है? जानकारों की मानें तो सरकार के पास टैक्स कलेक्शन को छोड़ जो दो रास्ते हैं उसमें पहला यह है कि वह रिजर्व बैंक से पैसा ले और दूसरा अपने सरकारी उपक्रमों में हिस्सेदारी बेचे. सरकार पहले भी इस तरह के प्रयोग कर चुकी है पिछले वित्तीय वर्ष और उसके पिछले वित्तीय वर्ष को देखें तो सरकार ने आरबीआई से जरूरत पड़ने पर पैसा लिया, साथ ही नवरत्न कंपनियों में से कुछ हिस्से बेचे गए. लेकिन वर्तमान माहौल में कंपनियों की हिस्सेदारी बेचना और रिजर्व बैंक का पैसा लेना भी आसाना नहीं है क्योंकि आऱबीआई अपने रिजर्व बैंक का बड़ा हिस्सा पहले ही सरकार को दे चुका है जबकि वर्तमाना हालात में सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी का सही कीमत मिलना संभव नहीं है इसके पहले भी सरकार की लाख कोशिशों के बाद एअर इंडिया जैसे उपक्रम नहीं बिक रहे हैं. ऐसे में सरकार विनिवेश के लिए सही समय का इंतजार करती दिख रही है.

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अनिल राय

अनिल रायएडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट)

अनिल राय भारत के प्रतिष्ठित युवा पत्रकार हैं, जिन्हें इस क्षेत्र में 18 साल से ज्यादा का अनुभव है. अनिल राय ने ब्रॉडकास्ट मीडिया और डिजिटल मीडिया के कई प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य किया है. अनिल राय ने अपना करियर हिंदुस्तान समाचार पत्र से शुरू किया था और उसके बाद 2004 में वह सहारा इंडिया से जुड़ गए थे. सहारा में आपने करीब 10 वर्षों तक विभिन्न पदों पर कार्य किया और फिर समय उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड में चैनल प्रमुख नियुक्त हुए. इसके साथ ही वह न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में तीन वर्ष तक मैनेजिंग एडिटर रहे हैं. फिलहाल आप न्यूज़ 18 हिंदी में एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट) के तौर पर कार्य कर रहे हैं.

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First published: May 6, 2020, 3:55 PM IST
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