बढ़ते कोरोना संकट से कैसे लड़ेगा उद्योग जगत

मजदूरों के सामने संकट है कि जिन शहरों को और उद्योगों को उन्होंने अपने खून पसीने और मेहनत से सजाया संवारा, जो शहर उनकी मेहनत के बल पर रोशन हुए वो शहर उन्हें महज 50 दिन भी सुरक्षित नहीं रख पाए. खाने पीने की जरूरतों ने उन्हें मजदूर से भिखारी बना दिया. ऐसे में उनकी हिम्मत डोलना जायज था.

Source: News18Hindi Last updated on: May 12, 2020, 5:13 pm IST
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बढ़ते कोरोना संकट से कैसे लड़ेगा उद्योग जगत
पहले लॉकडाउन के बाद शुरू हुई मजदूरों के पलायन की स्थिति अब तक थमने का नाम नहीं ले रही है.
कोरोना का यह संकट देश और दुनिया में कब तक चलेगा इसका सही-सही अंदाजा अभी तक नहीं लग पाया है. दुनिया की अलग-अलग रिसर्च अलग-अलग दावा कर रही हैं. कोई रिसर्च ये दावा कर रही है कि कोरोना का पीक आकर गुजर चुका है. यानी आने वाले समय में कोरोना के मरीजों की संख्या घटेगी. लेकिन एम्स के डायरेक्टर डॉ. गुलेरिया समेत भारत के कई रिसर्च इंस्टीट्यूट ये दावा कर रहे हैं कि कोरोना का पीक अभी भारत में आना बाकी है. आगे क्या होगा इसका सही-सही अंदाजा लगाना मुश्किल दिख रहा है. ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि इस तरह का संकट देश और दुनिया में पहली बार आया है.



आने वाले समय में बढ़ेंगी चुनौतियां

एक बात तो तय है कि आने वाला समय और भी कठिन होने वाला है. कोरोना वायरस संक्रमण इस देश में जिस तेजी से बढ़ रहा है उससे आने वाले कुछ दिनों में मरीजों की संख्या 1 लाख का आंकड़ा भी पार कर जाएगी. लेकिन कोरोना का संकट एक लाख पहुंचते-पहुंचते देश की अर्थव्यवस्था को अपनी आगोश में ले लेगा. इसके साथ-साथ ही देश में रोजी रोटी और भूख का संकट भी तेजी से बढ़ रहा है. लॉकडाउन के पहले चरण के बाद शुरू हुई मजदूरों के पलायन की स्थिति अब तक थमने का नाम नहीं ले रही है. सरकार की लगातार कोशिशों के बाद भी मजदूर अभी अपने घरों तक नहीं पहुंचे हैं. लाखों की संख्या में मजदूर अभी भी सड़कों पर पैदल यात्रा कर रहे हैं जबकि उनसे ज्यादा मजदूर सूरत, अहमदाबाद, मुंबई जैसे बड़े औद्योगिक शहरों में घर जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. बीच-बीच में मजदूरों के उग्र होने की खबरें भी आती रहती हैं.



बिना मजदूर कैसे चलेगी फैक्ट्री

संकट सिर्फ मजदूरों के सामने नहीं है अब संकट फैक्ट्री मालिकों के सामने भी आ गया है. सरकार ने औद्योगिक उत्पादन शुरू करने की इजाजत तो दे दी है लेकिन मजदूरों के बिना किसी भी फैक्ट्री की कल्पना नहीं की जा सकती है, ऐसे में फैक्ट्रियां चलें तो चलें कैसे. आधे से ज्यादा मजदूर अपने-अपने घरों की ओर पलायन कर चुके हैं. सरकार ने श्रम कानूनों को शिथिल करके फैक्ट्री मालिकों को कुछ राहत दी है लेकिन बिना मजदूरों के लौटे सिर्फ इससे काम चलने वाला नहीं है. क्योंकि जो मजदूर बचे भी हैं फिलहाल वो मानसिक रूप से काम करने के लिए तैयार नहीं हैं.



मजदूर कैसे करें भरोसा

दरअसल कोरोना के बाद लॉकडाउन के दौर में जो सबसे बड़ा संकट खड़ा किया है वो है भरोसे का. मजदूरों के सामने संकट है कि जिन शहरों को और उद्योगों को उन्होंने अपने खून पसीने और मेहनत से सजाया संवारा. जो शहर उनकी मेहनत के बल पर रोशन हुए वो शहर उन्हें महज 50 दिन भी सुरक्षित नहीं रख पाए. खाने पीने की जरूरतों ने उन्हें मजदूर से भिखारी बना दिया. ऐसे में उनकी हिम्मत डोलना जायज था और उन्होंने अपने वर्षों के बने बनाए घर को छोड़, अपने सपनों को तोड़ पलायन का फैसला किया. ऐसे में वो उसी शहर में दोबारा लौटें तो कैसे. क्योंकि जिस कोरोना के डर से उनका सब कुछ छीन लिया गया वो डर तो अभी भी बना हुआ है. सवाल उनकी सुरक्षा का भी है कि क्या वो फैक्ट्रियों में सुरक्षित रह पाएंगे. उन्हें इसका भरोसा दिलाएगा कौन? क्योंकि अभी कुछ दिन पहले ही तो उनका सारा भरोसा तार-तार हुआ है.



समस्या फैक्ट्री मालिकों के सामने भी

समस्या सिर्फ मजदूरों के सामने नहीं है. समस्या फैक्ट्री मालिकों के सामने भी है. भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ समझे जाना वाला एमएसएमई सेक्टर कोरोना के बाद अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है. एक ओर बाजार में खरीदार नहीं हैं तो दूसरी ओर फैक्ट्री में मजदूर नहीं हैं. दरअसल सरकार ने कुछ शर्तों के साथ फैक्ट्रियां चलाने की इजाजत तो दे दी है लेकिन जो मजदूर वापस चले गए हैं वे आएं तो आएं कैसे. एनसीआर के कुछ फैक्ट्री मालिकों ने बताया कि उन्होंने बातचीत करके अपने आधे से ज्यादा मजदूरों को मानसिक रूप से आने के लिए तैयार तो कर लिया है. लेकिन पब्लिक ट्रांसपोर्ट के अभाव में वो मजदूरों को वापस नहीं ला पा रहे हैं और अलग-अलग मजदूरों को अलग-अलग गाड़ी भेज कर उनके गांव से वापस लाना संभव नहीं है. ऐसे में सरकार भले ही दावा कर रही हो कि फैक्ट्रियों में बहुत जल्दी उत्पादन शुरू हो जाएगा लेकिन धरातल पर मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं.



डरा हुआ है देश का एमएसएमई सेक्टर

कोरोना संकट के बाद देश और दुनिया में भर में बदले डिमांड एंड सप्लाई के रेशियो ने देश के लघु उद्योगों को डरा रखा है. बात करें नोएडा की तो यहां का एक बड़ा तबका होजरी एक्सपोर्ट से जुड़ा हुआ है, जो दुनिया के अलग-अलग देशों में होजरी आइटम की सप्लाई करता है. कोरोना के बाद पूरी दुनिया मंदी का शिकार है. इस संकट के दौर में केवल जरूरत के सामान के लिए मारामारी मची है. ऐसे में उनका दुनिया भर से मिला ऑर्डर भी कैंसिल हो रहा है और फिलहाल कोई नया आर्डर नहीं मिल रहा है ऐसे में संकट दोहरा है.



बिना मजदूर कैसे लड़ेंगे चीन से

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कोरोना के इस संकट के दौर में चीन से पलायन करने वाली कंपनियों को भारत लाने की बात कर रहे हैं. सरकार इसको लेकर योजनाएं भी बना रही है. कई कंपनियों ने यहां निवेश का फैसला भी कर लिया है लेकिन क्या केवल इंफ्रास्ट्रक्चर के बल पर चीन की आक्रामक औद्योगिक नीति से मुकाबला किया जा सकता है. लेकिन जिस तरह मजदूर अव्यवस्था का शिकार होकर पलायन कर रहे हैं और उनके मन में जो डर बैठा हुआ है वैसे में क्या हम बिना मजदूरों के चीन से लड़ सकते हैं. लड़ सकते हैं तो किस तरह से. क्योंकि चीन सस्ती दरों पर सामान बेचकर उद्योग जगत में नम्बर वन बना हुआ है. ऐसे में जब भारत में मजदूरों की डिमांड और सप्लाई का गणित बिगड़ेगा तो कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ेगी जो पहले ही चीन से ज्यादा है.



मजदूरों में भरोसा जगाना सबसे बड़ी चुनौती

साफ है सरकार भले ही एमएसएमई और अन्य सेक्टर में कंपनियों को अनुदान दे रही है, बैंक भी सस्ते दर्ज पर कर्ज दे रहे हैं. लेकिन इन सबके बीच औद्योगिक शहरों को छोड़ चुके मजदूरों को वापस इन शहरों में लाना बड़ी चुनौती है. क्योंकि जिन हालात और जिस तरीके से वे लोग इन शहरों से रुखसत हुए हैं उनकी हिम्मत जवाब दे गई है. उनका अपना फैक्ट्री मालिकों और सरकार दोनों से भरोसा उठ गया है. ऐसे में सबसे पहले चुनौती उन कामगारों को ये भरोसा दिलाने की है कि कोरोना के इस संकट में देश उनके साथ है और जैसा पिछले 2 महीनों में उनके साथ हुआ है वो अब आगे नहीं होगा.



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(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
अनिल राय

अनिल रायएडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट)

अनिल राय भारत के प्रतिष्ठित युवा पत्रकार हैं, जिन्हें इस क्षेत्र में 18 साल से ज्यादा का अनुभव है. अनिल राय ने ब्रॉडकास्ट मीडिया और डिजिटल मीडिया के कई प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य किया है. अनिल राय ने अपना करियर हिंदुस्तान समाचार पत्र से शुरू किया था और उसके बाद 2004 में वह सहारा इंडिया से जुड़ गए थे. सहारा में आपने करीब 10 वर्षों तक विभिन्न पदों पर कार्य किया और फिर समय उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड में चैनल प्रमुख नियुक्त हुए. इसके साथ ही वह न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में तीन वर्ष तक मैनेजिंग एडिटर रहे हैं. फिलहाल आप न्यूज़ 18 हिंदी में एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट) के तौर पर कार्य कर रहे हैं.

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First published: May 12, 2020, 5:13 pm IST