बिना भरोसे कैसे लड़ेंगे कोरोना से जंग

यहां भरोसा सिर्फ मालिक और मजदूर के बीच नहीं टूटा. यह भरोसा सरकार और आम नागरिक के बीच भी टूटा. दरअसल राज्य सरकारें और केंद्र सरकार भी मिलकर अपने कामगार- मजदूर तबके के लोगों को भरोसा नहीं दिला पाए कि अगले 2-3 महीने जब तक कोरोना का संकट है उनका पेट भरता रहेगा और उनका भविष्य अंधकार में नहीं जाएगा.

Source: News18Hindi Last updated on: May 18, 2020, 4:57 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
बिना भरोसे कैसे लड़ेंगे कोरोना से जंग
मजदूरों की हालत ऐसी हो गई जैसे देश में कोरोना के वाहक यही हैं.
कोरोना के खिलाफ जंग में सरकार रोज-रोज नई घोषणाएं कर रही हैं. देश का हर आम से खास आदमी तक कोरोना से जंग जीतने की पूरी कोशिश कर रहा है. चाहें हमारे स्वास्थ्य कर्मी हों, पुलिसकर्मी हों या सेवा क्षेत्र से जुड़ा कोई व्यक्ति. सभी इस जंग में सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या सब जिनके लिए हम लड़ रहे हैं वो हम पर भरोसा कर पा रहे हैं. अब तक के हालात को देखें तो कोरोना के खिलाफ जंग में जो सबसे बड़ी कमी दिख रही है भरोसे की कमी है. भरोसे की कमी ही है कि स्वास्थ्य की जांच करने जा रहे डॉक्टरों पर हमले हो रहे हैं, पुलिस कर्मियों और सफाईकर्मियों पर हमले हो रहे हैं.

सरकार की सलाह और चेतावनी के बाद भी लोग बिना मास्क लगाए सड़कों पर निकल रहे हैं. मस्जिदों में नमाज पढ़ी जा रही है, लोग बाजार जा रहे हैं. ऐसे तमाम काम हो रहे हैं जो कोरोना के इस दौर में नहीं होने चाहिए. सरकार की ओर से लगातार जारी हो रही चेतावनी को दरकिनार किया जा रहा है, साफ है देश में कुछ लोग ऐसे हैं जो सरकार की बात पर भरोसा नहीं कर रहे हैं ऐसे में जब एक चूक भारी पड़ने वाली है हम भरोसे की इस कमी में कोरोना के खिलाफ जंग कैसे जीतेंगे.

मालिक और मजदूरों के बीच टूटा भरोसा
बात करें उद्योग जगत की तो सबसे बड़ा जो भरोसा टूटा है, वह मालिक और मजदूर के बीच का टूटा है. सड़कों पर जो लाखों की संख्या में मजदूर पलायन करते दिख रहे हैं वह मालिक और मजदूर के उसी टूटे हुए रिश्ते की गवाही दे रहे हैं. दरअसल मार्च के अंतिम सप्ताह में हुए लॉक डाउन के बाद मालिक अपने मजदूरों को भरोसा नहीं दिला पाए कि वो उनका पेट भर सकते हैं , पेट भरने का भरोसा दिलाने में सरकारी भी नाकाम रही हैं. क्योंकि जिन मजदूरों, जिन कामगारों ने वर्षों अपने खून पसीने से उन फैक्ट्रियों, उन शहरों को खड़ा किया उसे वह सिर्फ 2 महीने की रोटी नहीं दे पाए.
मैंने नोएडा के आसपास के बहुत सारे मजदूरों और मालिकों से बात करके ये जानने की कोशिश की कि क्या कोरोना संकट के इस दौर में मालिक और मजदूरों के बीच संवाद हुआ. इसका जवाब मुझे नहीं में ही मिला. किसी फैक्ट्री मालिक, किसी बिल्डर या किसी ठेकेदार ने इस संकट के दौर में अपने कामगार- मजदूर से ऐसा कोई संवाद नहीं किया कि हम छोटी बचत के साथ या आधी तनख्वाह के साथ हम गुजारा कर लेंगे तो अच्छा समय आएगा. इस बातचीत के गैप ने कामगारों-मजदूरों का भविष्य अंधकार में डाल दिया. हालात ये है कि फैक्ट्री खुलने के बाद अब मजदूर मालिक पर भरोसा नहीं कर पा रहा है और सरकार और फैक्ट्री मालिकों की लाख कोशिश के बाद भी मजदूरों का पलायन जारी है.

सरकार पर से भी कमजोर हुआ भरोसा
यहां भरोसा सिर्फ मालिक और मजदूर के बीच नहीं टूटा. यह भरोसा सरकार और आम नागरिक के बीच भी टूटा. दरअसल राज्य सरकारें और केंद्र सरकार भी मिलकर अपने कामगार- मजदूर तबके के लोगों को भरोसा नहीं दिला पाए कि अगले 2-3 महीने जब तक कोरोना का संकट है उनका पेट भरता रहेगा और उनका भविष्य अंधकार में नहीं जाएगा. सरकारें भले बड़े- बड़े दावे कर रही हों कि मजदूरों को घर पर भोजन दिया जा रहा है, यहां तक कि कुछ सरकारें भी दावा कर रही हैं कि मिल मालिक फैक्ट्री मालिक मजदूरों को पूरा वेतन दे रहे हैं लेकिन सड़कों की हकीकत को देखें तो साफ दिखता है यह दावा बेमानी है. आप किसी मजदूर से बात करें तो पता चल जाएगा कि न तो उसे भरपेट रोटी मिली और ना ही कोई आश्वासन. हद तो तब हो गई जब सरकार में बैठे लोगों ने मजदूरों से भिखारी की तरह व्यवहार किया. अगर हम उन मजदूरों को नजदीक से देखें तो वह सिर्फ रोटी की तलाश में अपने गांव अपने शहर को छोड़कर नहीं आए थे उन्होंने अपने गांव से इन बड़े शहरों की ओर अपने सपने के साथ आए थे. उन्होंने तय किया था कि हमारी पीढ़ी भले बर्बाद हो रही है हम अगली पीढ़ी को बनाएंगे, पढ़ाएंगे, लिखाएंगे और मजबूत बनाएंगे. लेकिन कोरोना ने उनके सपनों को छीन लिया, उनके वर्तमान को छीन लिया उनके भविष्य को अंधकार में डाल दिया. हालात यहां तक पहुंच गए कि जिंदा रहने की लड़ाई शुरू हो गई , जिंदा रहने की इस लड़ाई के लिए सबसे जरूरी था उनका अपने गांव पहुंचना, लेकिन सत्ता और सरकार उन्हें उनके घर भी नहीं पहुंचा सकी.घर वापसी का भरोसा भी टूट रहा है
मजदूरों की हालत ऐसी हो गई जैसे देश में कोरोना के वाहक यही हैं. हर जिला‌ इन मजदूरों को अपने इलाके में घुसने से रोक रहा है. हर राज्य इन्हें अपनी सीमा पर रोक रहा है, राज्यों की सीमाओं पर अपने ही देश के लोगों से विदेशियों जैसा व्यवहार हो रहा है. कुछ राज्य मजदूरों को किसी भी हालत में अपने राज्य से बाहर भेजना चाहते हैं इसका उदाहरण दिल्ली में देखने को मिला जब कुछ दिनों पहले दिल्ली से पैदल चलकर लाखों की संख्या में मजदूर उत्तर प्रदेश की सीमा पर आ गए थे. कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा पर भी मजदूरों को इसी तरह रोका गया. हर राज्य की सीमाओं का हाल यही है, अपने घर लौट रहे मजदूरों को साधन मुहैया कराना तो दूर की बात है सरकारें उन्हे रास्ता तक देने को तैयार नहीं हैं.

सरकारी कोशिशें फिलहाल नाकाफी
ऐसा नहीं कि सरकारों ने भरोसा बहाली की कोशिश नहीं की लेकिन अब तक जो इंतजाम हुए हैं उन्हें नाकाफी साबित हो रहे हैं. बात करें मजदूरों की वापसी की तो सरकारों ने ट्रेनें चलाई, बस से चलाएं लेकिन अभी भी इंतजाम इतने नाकाफी हैं कि सरकारों के दावे के उलट मजदूर अभी भी सड़कों पर हैं. हर राज्य की उसके दूसरे राज्य से लगी सीमा पर हजारों की संख्या में मजदूर रोज पहुंच रहे हैं, इस पलायन के दौर में सैकड़ों मजदूर सड़क हादसों में अपनी जान गंवा चुके हैं और जब अपने गांव में पहुंच रहे हैं तब भी उन्हें छुआछूत का सामना करना पड़ रहा है. अगर आने वाले कुछ समय में औद्योगिक विकास को रफ्तार देनी है तो इन मजदूरों को वापस उन शहरों में लौटना पड़ेगा, जहां से बड़े बेआबरू होकर रुखसत किए गए हैं. ऐसे में सवाल यह है कि क्या सरकार ने अब तक जो भरोसा दिलाने की कोशिश की हैं वह काफी हैं.

20 लाख करोड़ के पैकेज के बाद भी नहीं खत्म हो रहा है नौकरी जाने का डर
केन्द्र सरकार ने 20 लाख करोड़ से ज्यादा के राहत पैकेज का ऐलान किया है. इसमें हर तबके के लिए कुछ न कुछ है, चाहे वो तब का खेती से जुड़ा हो मजदूर हो या उद्योगपति हो लेकिन फिर भी इतना बड़ा पैकेज आम लोगों में इतना भरोसा नहीं दिला पाया जितनी कि लोगों को उम्मीद थी. इस बड़े पैकेज के बाद भी ना तो पलायन रुक पाया है और न ही लोगों के मन से नौकरी जाने का डर खत्म हो पा रहा है. ऐसे में यदि पलायन इसी तरह जारी रहा तो देश के उद्योग पटरी पर कैसे आएंगे और बिना उद्योगों के पटरी पर आए अर्थव्यवस्था पटरी पर कैसे आएगी.

 
ब्लॉगर के बारे में
अनिल राय

अनिल रायएडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट)

अनिल राय भारत के प्रतिष्ठित युवा पत्रकार हैं, जिन्हें इस क्षेत्र में 18 साल से ज्यादा का अनुभव है. अनिल राय ने ब्रॉडकास्ट मीडिया और डिजिटल मीडिया के कई प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य किया है. अनिल राय ने अपना करियर हिंदुस्तान समाचार पत्र से शुरू किया था और उसके बाद 2004 में वह सहारा इंडिया से जुड़ गए थे. सहारा में आपने करीब 10 वर्षों तक विभिन्न पदों पर कार्य किया और फिर समय उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड में चैनल प्रमुख नियुक्त हुए. इसके साथ ही वह न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में तीन वर्ष तक मैनेजिंग एडिटर रहे हैं. फिलहाल आप न्यूज़ 18 हिंदी में एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट) के तौर पर कार्य कर रहे हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: May 18, 2020, 4:57 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर