कोरोना वायरस के प्रकोप के बीच राजनीतिक संकट की ओर बढ़ता महाराष्ट्र

उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने मुख्यमंत्री के रूप में 28 नवंबर को शपथ ग्रहण किया. उस समय लगा कि महाराष्ट्र (Maharashtra) में फिलहाल सब कुछ ठीक हो गया लेकिन कोरोना संकट (Corona crisis) के साथ ही महाराष्ट्र में राजनीतिक संकट खड़ा होता दिख रहा है.

Source: News18Hindi Last updated on: April 16, 2020, 12:47 AM IST
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कोरोना वायरस के प्रकोप के बीच राजनीतिक संकट की ओर बढ़ता महाराष्ट्र
विधान परिषद में भले ही 11 सीटें रिक्त हों लेकिन उद्धव ठाकरे की राह इतनी आसान नहीं है.
जैसे-जैसे देश और दुनिया में कोरोना संकट आगे बढ़ रहा है, महाराष्ट्र में राजनीतिक संकट भी धीरे-धीरे पांव बढ़ा रहा है. महाराष्ट्र में 2019 के विधानसभा चुनावों के बाद से लगातार राजनीतिक उठा-पटक दिख रही है. सबसे पहले चुनावों में एक साथ गठबंधन में चुनाव लड़ी बीजेपी और शिवसेना अलग हो गईं. फिर अचानक एक दिन बीजेपी और एनसीपी की सरकार के मुखिया के रूप में देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली. लेकिन फडणवीस सरकार ने विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने से पहले ही इस्तीफा दे दिया. उसके बाद महाराष्ट्र में पहली बार शिवसेना-एनसीपी और कांग्रेस की सरकार बनी और उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री के रूप में 28 नवंबर को शपथ ग्रहण किया. उस समय लगा कि महाराष्ट्र में फिलहाल सब कुछ ठीक हो गया लेकिन कोरोना संकट के साथ ही महाराष्ट्र में राजनीतिक संकट खड़ा होता दिख रहा है.

क्या है महाराष्ट्र का राजनीतिक संकट
दरअसल संविधान की धारा 164 (4) के अनुसार कोई मंत्री या मुख्यमंत्री जो निरंतर छह महीने तक की किसी अवधि तक राज्य के विधान-मंडल का सदस्य नहीं है, उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा. साफ है ऐसे में उद्धव ठाकरे को 27 मई से पहले विधानसभा या विधानपरिषद किसी भी सदन का सदस्य होना जरूरी हो जाता है लेकिन वर्तमान हालात में महाराष्ट्र में विधान परिषद का चुनाव होता नहीं दिख रहा है. हालांकि राज्य में 9 विधान परिषद की सीटें 15 अप्रैल को रिक्त हो गई हैं लेकिन चुनाव आयोग ने फिलहाल कोरोना के चलते इन सीटों पर चुनाव अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया है. ऐसे में महाराष्ट्र धीरे-धीरे राजनीतिक संकट की ओर बढ़ता दिख रहा है.

क्या-क्या है विकल्प
ऐसे में सवाल उठता है उद्धव ठाकरे के पास इस राजनीतिक संकट को टालने के लिए क्या-क्या विकल्प हैं. पहला विकल्प ये है कि 3 मई को जब लॉकडाउन खत्म हो जाए, चुनाव आयोग विधान परिषद के चुनाव की अधिसूचना जारी करे और 28 मई से पहले इन 9 सीटों पर चुनाव करा ले. क्योंकि विधान परिषद के चुनाव की प्रक्रिया आमतौर पर 15 दिन में ही पूरी कर ली जाती है. दूसरा विकल्प राज्य विधान परिषद की 12 मनोनीत सीटों में रिक्त 2 सीटों में से एक पर राज्यपाल मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को मनोनीत कर दें जिसका प्रस्ताव राज्य कैबिनेट ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को भेज रखा है. तीसरा विकल्प ये भी है कि मुख्यमंत्री इस्तीफा देकर कुछ दिनों बाद एक बार फिर शपथ ग्रहण करें.

विकल्प कई लेकिन राह नहीं है आसान
विधान परिषद में भले ही 11 सीटें रिक्त हों लेकिन उद्धव ठाकरे की राह इतनी आसान नहीं है. दरअसल विधान परिषद की जिन 9 सीटों पर चुनाव होना है वो कब होंगे ये पूरा अधिकार चुनाव आयोग के पास है. जिन दो सीटों पर मनोनयन की बात हो रही है उन पर किसका मनोनयन होगा इसमें कैबिनेट के फैसले को मानने या न मानने का अधिकार राज्यपाल के पास है. इससे पहले भी राज्यपाल ने इन 2 रिक्त सीटों के लिए अदिति नाडवले और शिवाजी गुर्जे के नाम की कैबिनेट की सिफारिश को खारिज कर दिया था. यहां एक बात और गौर करने की है कि इन दोनों सीटों पर कार्यकाल 6 जून का समाप्त हो जाएगा यानी अगर उद्धव इन सीटों में किसी एक पर मनोनीत होते है तो भी उन्हें जल्द से जल्द किसी और रास्ते सदन में आना पड़ेगा लेकिन यहां उद्धव को 6 जून के बाद 6 महीने और यानी 6 दिसंबर तक का समय मिल जाएगा.क्या कहते हैं विशेषज्ञ
इस मामले में विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है. सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष विकास सिंह का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए चुनाव आयोग को 28 मई से पहले चुनाव करा लेना चाहिए. इसके लिए सरकार चाहे तो न्यायलय का दरवाजा खटखटा सकती है. लेकिन पद से इस्तीफा देकर दोबारा शपथ लेने को वो ठीक नहीं मानते.

सुप्रीम कोर्ट के 2001 के एक फैसले का जिक्र करते हुए विकास सिंह बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस आर सी लोहाटी और जस्टिस के जी बालाकृष्णन की पीठ ने 17 अगस्त 2001 के अपने फैसले में पंजाब सरकार में तेज प्रकाश सिंह को दोबारा मंत्री के रूप में शपथ लेने को गलत बताया था. कोर्ट ने कहा था कि एक ही विधानसभा के कार्यकाल में बिना सदन का सदस्य हुए 6 महीने से ज्यादा मंत्री रहना गलत है. दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एम एल लाहौटी दोबारा शपथ ग्रहण को गलत नहीं मानते, उनका मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में किसी ने कल्पना नहीं कि थी इसलिए संविधान में इसके लिए साफ-साफ कोई रास्ता नहीं है. ऐसे में अगर 28 मई तक महाराष्ट्र में विधान परिषद का चुनाव नहीं होता और राज्यपाल उन्हें मनोनीत भी नहीं करते तो उद्धव ठाकरे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते है .

(इस लेख में लेखक के निजी विचार हैं.) 

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अनिल राय

अनिल रायएडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट)

अनिल राय भारत के प्रतिष्ठित युवा पत्रकार हैं, जिन्हें इस क्षेत्र में 18 साल से ज्यादा का अनुभव है. अनिल राय ने ब्रॉडकास्ट मीडिया और डिजिटल मीडिया के कई प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य किया है. अनिल राय ने अपना करियर हिंदुस्तान समाचार पत्र से शुरू किया था और उसके बाद 2004 में वह सहारा इंडिया से जुड़ गए थे. सहारा में आपने करीब 10 वर्षों तक विभिन्न पदों पर कार्य किया और फिर समय उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड में चैनल प्रमुख नियुक्त हुए. इसके साथ ही वह न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में तीन वर्ष तक मैनेजिंग एडिटर रहे हैं. फिलहाल आप न्यूज़ 18 हिंदी में एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट) के तौर पर कार्य कर रहे हैं.

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First published: April 15, 2020, 4:00 PM IST
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