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    गांधी के आदर्शों की कालीन पर आज के नेताओं के ढोंग का पैबंद

    1904 में जब दक्षिण अफ्रीका में प्लेग फैला तो महात्मा गांधी वहीं थे. प्रशासन की अनदेखी के बीच गांधी प्लेग से पीड़ित लोगों के बीच खुद पहुंच गए और उनके इलाज की व्यवस्था कराई. वहीं, जब कोरोना फैला हुआ है तो हमारे किसी नेता की हिम्मत नहीं हुई कि सड़कों पर उतर कर देश के लोगों में भरोसा जगाएं. ये अवसरवादी नेता कुर्सी के लालच में अब देखिए कैसे खोल से बाहर निकल कर बिहार में प्रचार करते हुए खुद को दूसरों से श्रेष्ठ बताने में जुटे हैं.

    Source: News18Hindi Last updated on: October 3, 2020, 8:54 AM IST
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    गांधी के आदर्शों की कालीन पर आज के नेताओं के ढोंग का पैबंद
    महात्मा गांधी.
    कोरोना महामारी के इस दौर में हमसब अपने-अपने घरों में दुबके पड़े हैं. सड़कों पर वही दिख रहे जिनका काम सड़कों पर रहे बिना चल नहीं सकता. मसलन, नौकरीपेशा अधिकतर लोगों ने 'घर से काम' (वर्क फ्रॉम होम) वाली सुविधाजनक संस्कृति अपना ली. दफ्तर गए बिना भी दफ्तर का काम कर ले रहे हैं. पर सब्जी बेचने वाले, रेहड़ी-पटरी लगाने वाले या दुकानदार क्या करें? जो थोड़े-बहुत संपन्न दुकानदार हैं, उन्होंने 'होम डिलिवरी' जैसी सुविधा अपने ग्राहकों के लिए कर दी. जो कम पूंजी वाले हैं वे क्या करें? जो आर्थिक कारणों से या अपनी नासमझी की वजह से कोरोना गाइडलाइन का भी पालन नहीं कर पा रहे उनकी मदद कौन करे? गाइडलाइन का पालन करने के लिए उन्हें कौन प्रेरित करे या उनके संकट को कौन दूर करे - यह बड़ा सवाल है.

    ऐसे सवालों से घिरकर बार-बार एक सवाल मन में उठता है कि ऐसे समय में महात्मा गांधी होते तो क्या करते? क्या वे बिहार चुनाव के लिए कांग्रेस के पक्ष में प्रचार करने जाते? वहां के मतदाताओं को जागरूक करने जाते? या घर पर रहकर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बिहार में ये दोनों काम कर रहे होते? सच यही है कि इसका सही जवाब हमारी कल्पना नहीं दे सकती, बल्कि इस सवाल का सही जवाब हमें महात्मा गांधी के जीवन से ही मिल सकता है.

    महात्मा गांधी की आत्मकथा 'सत्य के प्रयोग' में दक्षिण अफ्रीका की घटना का जिक्र है. गांधी जी की इस आत्मकथा से गुजरते हुए पता चलता है कि सन 1904 में वे दक्षिण अफ्रीका में थे. तब दक्षिण भारत के जोहानेसबर्ग से सात मील पूरब की कुली बस्ती में प्लेग फैला था. कुली बस्ती से मतलब हिंदुस्तानियों की आबादी वाली बस्ती से है. जोहानेसबर्ग की म्युनिस्पलिटी ने इस बस्ती को इसलिए उपेक्षित कर रखा था कि यह तबाह हो जाए और उसे गोरों की बस्ती से दूर हटा कर कहीं और बसा दिया जाए. यह सब समझने के बावजूद गांधी जी ने प्लेग जैसी महामारी के फैलने की आशंका से प्रशासन को आगाह किया था. पर प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया.


    हिंदुस्तानी बस्ती में फैले प्लेग की चर्चा टिम कैपन के शोध में भी है. दस साल लगा कर किए गए इस शोध में गांधी के उन पत्रों का जिक्र विस्तार से है जो उन्होंने प्लेग की आशंका को लेकर मेडिकल अफसर डॉ. पोर्टर को लिखा था. ध्यान रहे कि टिम कैपन इमिली ब्लैक के परपोते हैं. इमिली ब्लैक एक नर्स थीं, जो ब्रिटेन के संसदीय सचिव की बेटी थीं और हिंदुस्तानी बस्ती में फैले प्लेग के दौरान वहां के लोगों की सेवा में लगी थीं. इसी सेवा के दौरान बेहद कम उम्र में ही उनकी मौत हो गई थी. तो इन्हीं इमिली ब्लैक के परपोते टिम कैपन ने अपने शोध में गांधी जी के पत्रों का जिक्र किया है.
    उन्होंने बताया है कि हिंदुस्तानी बस्ती के बारे में गांधी जी ने 11 फरवरी 1904 को नगर परिषद के मेडिकल अफसर डॉ. पोर्टर को लिखा, 'इलाके में मौतें बढ़ गई हैं. अगर मौजूदा स्थितियां कायम रहीं तो एक दिन महामारी जरूरी फैलेगी.' डॉ. पोर्टर ने 15 फरवरी को इलाके का दौरा किया और इसके लिए गांधी ने उन्हें धन्यवाद दिया. उन्होंने म्यूनिस्पलिटी को लिखा भी लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ. गांधी ने फिर एक तीखा पत्र लिखा. उन्होंने लिखा कि इस मामले में एक एक मिनट की देरी आपदा को आमंत्रण है. इसके लिए ब्रिटिश इंडियन का कोई दोष नहीं है. उन्होंने लिखा कि अगर आज कुछ पौंड खर्च कर दिए गए तो भविष्य में हजारों पौंड बचाए जा सकते हैं. गांधी के इस पत्र का डॉ. पोर्टर ने बुरा माना.

    गांधी ने 20 फरवरी को जवाब में कहा, 'आपने पत्र के कुछ हिस्से पर आपत्ति की है. मैंने तो सफाई को ध्यान में रखते हुए पत्र लिखा. मुझे अपने देशवासियों का ख्याल है. मैं कोई बात वापस नहीं लूंगा क्योंकि जरूरी हुआ तो हमारी हर बात का समर्थन किया जाएगा.' डॉ. पोर्टर ने परिषद को बताया कि यहां की आबादी को कहीं और हटा दिया जाना चाहिए या उन्हें टेंट में रख देना चाहिए जल्दी से जल्दी. लेकिन लापरवाही जारी रही.

    गांधी ने 1 मार्च को पोर्टर को बताया कि इलाके में प्लेग आ गया है. न्यूमोनिया से मरने वाले बढ़ रहे हैं. लेकिन पोर्टर उनकी बात मानने को तैयार नहीं थे. पोर्टर श्वेतों की उस रंगभेदी योजना पर काम कर रहे थे जिसके तहत कुलियों की बस्ती को वहां से हटाना था. ऐसे समय में गांधी जी अपने समाज के लिए डट कर खड़े हो गए थे. 18 मार्च को प्लेग तेजी से फैल गया. गांधी ने पोर्टर को पेंसिल से लिखकर नोट भेजा. उन्होंने कहा 15 लोग बीमार हैं, एक मर गया है. कोई लाश नहीं उठा रहा है. स्वयं सेवक काम कर रहे हैं. आप खाली जगह को अस्पताल की तरह इस्तेमाल करने देंगे तो बड़ी कृपा होगी. पर तुरंत इसका कोई जवाब नहीं आया.देर होते देखकर गांधी और `इंडियन ओपिनियन' के प्रकाशक मदनजीत व्यावहारिक उस इलाके में गए और एक खाली घर के बंद दरवाजे को तोड़कर 36 बीमार लोगों को वहां ले गए. फिर एक निजी चिकित्सक डॉ. गाडफ्रे आए और उन्होंने इलाज शुरू किया. लेकिन इतने लोग काफी नहीं थे. गांधी ने अपने दफ्तर के उन लोगों को काम पर लगाया जो अविवाहित थे. इस बीच 17 लोगों की मौत हो गई. उनके नमूने परीक्षण के लिए लैब में भेजे गए और 19 मार्च को यह साबित हो गया कि यह बीमारी प्लेग ही है. महामारी घोषित होते ही प्रशासन सक्रिय हो गया. पुलिस कमिश्नर ने पूरा इलाका घेर लिया. आने जाने वाले लोगों के लिए पास जारी होने लगे. 20 मार्च को 22 लोगों की मौत हो गई. 17 से 25 मार्च के बीच 65 संक्रमित लोगों में 55 लोग मारे गए थे.

    उसी समय इमिली ब्लैक लंदन से आई थीं और उन्होंने सेवा करने वालों को सलाह दी कि वे ब्रांडी लेकर काम करें तो संक्रमण नहीं होगा. गांधी और उनके साथियों ने उनकी यह बात नहीं सुनी. वे गांधी जी के प्राकृतिक इलाज पर भरोसा करते रहे. गीली मिट्टी का सिर और पेट पर लेप करने का इलाज करते रहे. उससे दो लोग बच गए. बाद में 31 मार्च को इमिली भी इस संक्रमण की वजह से चल बसीं.

    इस प्रकरण के विस्तार से चर्चा का मकसद महज यह याद दिलाना है कि इस वक्त कोरोना महामारी के दौर में हमारे तमाम कद्दावर नेता चाहे वे भाजपा के हों या कांग्रेस के या किसी अन्य पार्टी के, सब के सब दुबके पड़े रहे. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सूचनाओं का आदान-प्रदान करते रहे. किसी की हिम्मत नहीं हुई कि सड़कों पर उतर कर देश के लोगों में भरोसा जगाएं, जो बुरी तरह डरे-सहमे और आतंकित लोग हैं उन्हें ढाढ़स बंधाएं और उपाए बताएं कि कैसे कोरोना संक्रमण से हम बचे रह सकते हैं. इन नेताओं का अपने-अपने खोल में दुबके रहना देश के आमलोगों का भरोसा डिगा देने जैसा है. ये अवसरवादी नेता कुर्सी के लालच में अब देखिए कैसे खोल से बाहर निकल कर बिहार में प्रचार करते हुए खुद को दूसरों से श्रेष्ठ बताने में जुटे हैं. क्या ऐसे नेताओं पर भरोसा किया जा सकता है? क्या हम यह दावा कर सकते हैं कि देश का पक्ष और विपक्ष वाकई देश के लोगों के लिए ही काम कर रहा है या हम निःसंकोच होकर कह सकते हैं कि ये नेता हमारे-आपके हितैषी होने का सिर्फ भ्रमजाल बुन रहे हैं. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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    First published: October 3, 2020, 8:54 AM IST
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