जिंदादिल इंसानों की जुबान है कहावतों की बतकही

अमूमन कविता में ऐसा वैचारिक विचलन दिख जाता है जहां कवि की भाषा थोड़ी बहक जाती है. उन्हें सांप और जहर सकारात्मक ऊर्जा लग जाती है, विनीत और सरल होना कायरता दिखने लगती है. बिहार और झारखंड के कई हिस्सों में मगही भी बोली जाती है. इन प्रदेशों में भी यह आम धारणा है कि कमजोर और अशक्त लोगों से डरने की जरूरत नहीं.

Source: News18Hindi Last updated on: September 9, 2020, 6:31 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
जिंदादिल इंसानों की जुबान है कहावतों की बतकही
समाज जैसा था, अब वैसा नहीं रहा. उस समाज की जो भाषा थी, वह अब खूब बदल रही है. (फोटो साभारः Pixabay)
कवि-पत्रकार संजय कुंदन की खूब चर्चित कविता है 'कहावतें'. कविता के शुरू में ही ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ कहने वाले व्यक्ति के चरित्र की कल्पना करते हैं और लिखते हैं -
कितना हंसोड़ रहा होगा वह आदमी/जिसने एक ऊंट के साथ
मजाक किया होगा/उसके मुंह में जीरे का एक दाना रखकर…

कविता के अगले हिस्से में कुंदन उस शख्स के बारे में सोचते हैं जिसने 'छछूंदर के सिर पर चमेली का तेल' की कल्पना की होगी. वह लिखते हैं - 'सचमुच बड़ा फक्कड़ रहा होगा वह/बड़ा ही मस्तमौला/जिसने छछूंदर के सिर पर/चमेली के तेल मले जाने की/मजेदार बात सोची होगी…'
इसके बाद वह अपनी कविता में हमसे कहते हैं 'जरा कहावतों के जन्म के बारे में सोचो'
किसने कहा होगा पहली बार कि अधजल गगरी छलकत जाए/आए थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास…

कविता के अगले हिस्से में वह अपनी ओर से हमें बताते हैं -वे हमारे पूर्वज थे/जिन्हें कवि नहीं बनना था/नहीं होना था उन्हें प्रसिद्ध/इसलिए कहावतों में उन्होंने/अपना नाम नहीं जोड़ा/वे जिंदगी के कटु आलोचक रहे होंगे/गुलमोहर की लाल हंसी हंसने वाले/समय को गेंद की तरह उछालने वाले/अपनी नींद और अपने आराम के बारे में/खुद फैसले लेने वाले/यारबाश लोग रहे होंगे वे/उनमें से कोई तेज-तर्रार भड़भूंजा रहा होगा/जिसने पहली बार महसूस किया होगा कि/अकेला चना भांड़ नहीं फोड़ता/कोई उत्साही मल्लाह रहा होगा/जिसने निष्कर्ष निकाला- जिन खोजा तिन पाइयां गहरे पानी पैठ/क्या तुम उन अनाम पूर्वजों के/ साहस की तपिश महसूस कर सकते हो/जरा सोचो/उस दिन क्या हुआ होगा.

जब उन्हीं में से किसी ने/एक ढोंगी की ओर उंगली उठाकर
कहा होगा - मुंह में राम बगल में छुरी/उन अनाम पूर्वजों ने डरना तो शायद/सीखा ही नहीं होगा/जब मौत भी उनके सिरहाने/आ खड़ी होती होगी/तो वे उसे चिढ़ाते होंगे/रंगासियार कहकर/अब नहीं दिखते/वैसे मस्तमौला, फक्कड़ और साहसी लोग/नहीं रहे जिंदगी के कटु आलोचक/और इसीलिए दम तोड़ रही हैं कहावतें/तुम्हें अपनी भाषा की /कितनी कहावतें याद हैं/यह समझदार लोगों का दौर है/यह चालाक कवियों का दौर है/यह प्रायोजित शब्दों का दौर है/काश इस दौर के बारे में/मैं एक सटीक कहावत कह पाता.


इसी ‘काश’ की टीस के साथ संजय कुंदन की यह कविता यहां खत्म हो जाती है. पर मेरा मानना है कि लिखे जाने में यह कविता पन्ने पर खत्म भले हो गई हो, वह पाठकों के दिलों में नए सिरे से कविता पैदा करने लगती है. वह कविता जो लोक में बसी, कहावतों में रची और मुहावरों की शक्ल में हम तक पहुंची.

कहावतों की दुनिया को याद करते हुए यह बार-बार लगता है कि सचमुच ये कहावतें जिंदादिल इनसानों की जुबान से निकली होंगी. ये ऐसे लोग रहे होंगे जिन्होंने जिंदगी को शिद्दत से जिया. जिन्होंने अपने चेहरे पर नकली चहरे नहीं लगाए. जिन्होंने अपनी इज्जत बनाए रखने के लिए दूसरों की इज्जत नहीं उतारी. बेहद बेबाक किस्म के लोग रहे होंगे वे. मानवीय गुणों से लबरेज, छिछोरी चालाकी समझने वाले लोग और जरूरत के मुताबिक उसपर चोट करने वाले की हिम्मत रखने वाले लोग रहे होंगे.

हम लीक पीटने वाले लोग हैं. बनी बनाई लीक पर चलने के आदी होते गए हैं हम. कुछ नया रचना या फिर रचे पर विचार करने को तैयार नहीं. वर्षों पहले की जो कहावतें हमने सुनीं, उसे ही अब तक बोलते चले आ रहे हैं. यह सोचने की भी जहमत नहीं उठा पा रहे कि तब का समाज जैसा था, अब वैसा नहीं रहा. उस समाज की जो भाषा थी, वह अब खूब बदल रही है. भाषा के स्तर पर अब भी कई चीजें बदलने जाने की जरूरत है. जाहिर है कि कई कहावतों का स्वरूप अब बदल जाना चाहिए. कई कहावतें खारिज भी की जानी चाहिए.

एक दौर था जब बाहरी रूप को देखकर कहावतें गढ़ी गईं. हालांकि मनुष्य का स्वभाव नहीं बदला इसलिए अब भी बाहरी रूप पर कहावतें गढ़ीं और कही जा रही हैं. अब गौर कीजिए न कि ‘जलेबी की तरह सीधा होना’ ऐसा ही एक मुहावरा है, जो अमूमन किसी शख्स को उसके सीधे न होने को लेकर व्यंग्य में बोला जाता है. यह सही है कि जलेबी का बाहरी रूप सीधा नहीं होता, जबकि उसके स्वाद और कुरमुरेपन का कोई जवाब नहीं. कहा जाता है कि हाजमा दुरुस्त करने में जलेबी का कोई मुकाबला नहीं.

मर्दों के इस समाज ने स्त्रियों का शोषण कई स्तरों पर किया है. इनके द्वारा रचे धर्म-शास्त्र समय-समय पर स्त्रियों को डराने का काम करते रहे हैं. शालीन, सौम्य और सुशील होने की नसीहत स्त्रियों को बचपन से घुट्टी की तरह पिलाई जाती रही है. ऐसी नसीहतों का नतीजा रहा कि स्त्रियों की छवि डरपोक और दब्बू की बनी, जबकि यह हकीकत नहीं है. शृंगार के नाम पर हमने उन्हें चूड़ियां पहनाईं. और फिर इन चूड़ियों को डर का प्रतीक बनाकर मुहावरा गढ़ा चूड़ियां पहनने का. जाहिर है कि जो मुहावरे किसी के अस्तीत्व को नकारते हों या झूठी छवि पेश करते हों उन्हें तुरंत बदल जाना चाहिए. संवेदनशीलता की इस ऊंचाई से अपनी लंबी कविता ‘पटकथा’ में सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ भी फिसलते हुए दिखे हैं. उन्होंने लिखा था -

... मैंने हरेक को आवाज़ दी है
हरेक का दरवाजा खटखटाया है
मगर बेकार…मैंने जिसकी पूंछ
उठायी है उसको मादा पाया है.


दो लोगों के बीच के कड़वे संबंध को बताने के लिए ‘छत्तीस का रिश्ता’ लोकोक्ति बेहद सटीक दिखती है. पर इस लोकोक्ति से रिश्ते की कड़वाहट क्यों दिखने लगती है – यह बात आनेवाली पीढ़ी समझ पाएगी? दरअसल, हिंदी की लिपि देवनागरी का जब मानकीकरण किया गया तो हिंदी के अंक १२३... की जगह रोमन के 123... को अपना लिया गया है. अब तो हिंदी के अंक को लोग शायद ही पढ़ और समझ पाएं, तो ३६ का जो विरोधी रूप है, उसे कैसे समझेंगे. मुझे लगता है कि अब इस ‘छत्तीस का रिश्ता’ की जगह हम ‘छियानबे का रिश्ता’ कहें तो लोग तुरंत 96 के रूप से कड़वाहट के इस प्रतिनिधि लोकोक्ति को समझ सकते हैं.

अभी हाल ही में मेरे एक मित्र का फोन आया था. स्पीकर ऑन कर मैं बात कर रहा था. मेरी बेटी भी पास बैठी थी. किसी बात पर मेरे मित्र ने कहा कि तुम्हारी बात सोलह आने सही है. हमारी बातचीत जब खत्म हुई, मैंने फोन रख दिया तो मेरी बेटी ने पूछा कि सोलह आने का मतलब क्या हुआ? तब मैंने उसे बताया कि सोलह आने मतलब सौ फीसद, हंड्रेड परसेंट. कहने का मतलब यह कि अब की पीढ़ी के कितने नौजवानों को पता होगा कि कभी भारतीय मुद्रा ‘आना’ हुआ करती थी. एक आने की कीमत आज के 6 पैसे जितनी होती थी. सोलह आने का मतलब सौ फीसद हुआ करता है. तो फिर ऐसी कहावतों को ढोते रहने का औचित्य क्या है? या तो मुद्रा के इस इतिहास से परिचित करवाने के लिए बच्चों की किताबों में कोई एक छोटा सा अध्याय रखें या फिर इस सोलह आने की कहावत को तिलांजलि दे दें.

हिंदी में कई कहावतें ऐसी हैं जो रंगभेद, वर्णभेद, वर्गभेद और लिंगभेद करती हैं. शारीरिक अक्षमताओं और बीमारियों को लेकर भी कहावतें गढ़ी गई हैं. लोग धड़ल्ले से इनका इस्तेमाल भी करते हैं. पर किसी भी संवेदनशील समाज में भाषा के स्तर पर की जाने वाली यह हिंसा स्वीकार नहीं होनी चाहिए.

नुकसान पर नुकसान या बुरे वक्त में नुकसान होने पर अक्सर हमने लोगों को बोलते सुना है ‘कोढ़ में खाज’. यह मुहावरा हमारी विकृति का प्रतिनिधित्व करता है. यह बताता है कि हमारा यह समाज कितनी बुरी कल्पना कर सकता है. बुरे समय में नुकसान उठाने की अभिव्यक्ति के लिए ‘कोढ़ में खाज’ से बेहतर और सुघढ़ मुहावरा हिंदी में है ‘गरीबी में आटा गीला’. जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसी कहावतें हमें बताती हैं कि समाज में शक्तिशालियों का वर्चस्व हमेशा बना रहा है. शक्तिशालियों के सामने भारतीय समाज नतमस्तक होता रहा है. यह बात रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता ‘शक्ति और क्षमा’ में भी दिखती है. दिनकर ने लिखा है –

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो.


अमूमन कविता में ऐसा वैचारिक विचलन दिख जाता है जहां कवि की भाषा थोड़ी बहक जाती है. उन्हें सांप और जहर सकारात्मक ऊर्जा लग जाती है, विनीत और सरल होना कायरता दिखने लगती है. बिहार और झारखंड के कई हिस्सों में मगही भी बोली जाती है. इन प्रदेशों में भी यह आम धारणा है कि कमजोर और अशक्त लोगों से डरने की जरूरत नहीं. कमजोर लोगों के प्रतिरोध में ताकत नहीं होती. दरअसल वह सिर्फ झूठी धमकी देते हैं. इस बात को लेकर मगही की कहावत है ‘कोढ़िया डेरावे थूक से’. इस स्थिति के लिए इससे बेहतर अभिव्यक्ति हमारी भाषा में है ‘गीदड़भभकी’.

शारीरिक अक्षमताओं को लेकर भी कई कहावतें हैं, जिन्हें छोड़कर नए मुहावरे गढ़ने की क्षमता हमें दिखाने की जरूरत है. ‘आंख का अंधा नाम नयनसुख’ या ‘अंधों में काना राजा’ जैसी कहावतें सुनकर मन को सुख नहीं मिलता, बल्कि वह कसैला हो जाता है. क्या यह मुमकिन नहीं कि इन कसैले स्वाद वाली कहावतों की जगह नई अभिव्यक्ति हम तलाशें? आंख का अंधा नाम नयनसुख की जगह ‘पेड़ बबूल का नाम आभ्रपालि’ या ‘माल चीन का और मानक आईएसआई’ जैसा कुछ गढ़ा जा सकता है. ‘माल चीन का और मानक आईएसआई’ जैसा विकल्प सुझाते हुए यह ध्यान है कि आम धारणा के विपरीत चीन का हर उत्पाद घटिया या बिना गारंटी वाला नहीं होता और भारतीय मानक आईएसआई की पहचान वैश्विक स्तर पर कमजोर है. बावजूद इस तरह रास्ते तलाशे जा सकते हैं, यही बात यहां रखना चाहता हूं. हालांकि बिहार और उसके आसपास के इलाके में इस अभिव्यक्ति की एक कहावत खूब लोकप्रिय है – ऊपर से जीटजाट, अंदर से मोकामा घाट.

‘पूत सपूत तो क्या धन संचै, पूत कपूत तो क्या धन संचय’ कहने वाले परिवार ने क्या अपने घर में पुत्रियों की कामना कभी की ही नहीं.


कहावतों में जातिसूचक शब्दों से बचने की जरूरत है. उस स्थिति में तो और भी संवेदनशील होकर हमें ऐसी हर कहावत को खारिज करने की जरूरत है जिनमें किसी जाति को कमतर करके बताया जा रहा हो. मसलन ‘कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली’.

आपको पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं पर पुत्रियों के क्यों नहीं दिखते? जाहिर है कि जिस वक्त यह वाक्य कहावत के रूप में प्रचलित होना शुरू हुआ था, उस वक्त का समाज स्त्रियों की योग्यता स्वीकार नहीं करता होगा. वैसे, आज का सच हमारे उस समय के समाज से बहुत थोड़ा ही अलग है. आज भी समाज में स्त्रियों की योग्यता को अक्सर संदेह की दृष्टि से देखा जाता है, मर्दों से उन्हें कमतर माना जाता है.

‘पूत सपूत तो क्या धन संचै, पूत कपूत तो क्या धन संचय’ कहने वाले परिवार ने क्या अपने घर में पुत्रियों की कामना कभी की ही नहीं. या यह सच मानते रहे कि बेटियां तो पराया धन होती हैं. गौर करें कि तब के समाज ने अक्सर उस काम पर कब्जा जमाया जिससे आर्थिक लाभ होने की संभावना दिखती थी. घर में कपड़े सिलने का काम स्त्रियों का था, पर जब वही काम आर्थिक लाभ से जुड़ा तो दर्जी बनकर मर्दों ने उसपर कब्जा किया. खाना पकाने का काम स्त्रियों के जिम्मे रहा, पर यही काम से जब आर्थिक लाभ होने लगा तो मर्द रसोइया बनकर कमाने लगे.

हमें यह सोचना चाहिए कि बदलते वक्त के साथ नई लोकोक्तियां क्या हो सकती हैं? पुरानी पड़ती लोकोक्तियों में ताजगी कैसे लाई जा सकती है? लंबी टिप्पणियां उबाऊ हो सकती हैं. ऐसे में मुमकिन है कि पाठक नौ दो ग्यारह हो जाएं. यह स्थिति आए उससे पहले लेखक को बारह दस बाइस हो जाना चाहिए. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
facebook Twitter whatsapp
First published: September 9, 2020, 6:20 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर