मीडिया में हिंदी का पिंडदान

किसी भी भाषा, उसके व्याकरण और उसके शब्दों को लेकर हमारा रुख भी ऐसा ही होना चाहिए कि उसके प्रति कोई दुविधा न रहे, वह सर्वस्वीकार्य हो. व्याकरण का रुख लचीला हो, समय-समय पर वह परिमार्जित होता रहे. पाणिनि ने कहा था कि भाषा लोकप्रचलन की अनुगामिनी होती है. याद करें कि 2004 में हमसब ने ‘सुनामी’ शब्द पहली बार सुना था. उस वक्त पाठकों को समझाने के लिए मीडिया को खबर के साथ यह बताने की जरूरत पड़ी थी कि सुनामी एक जापानी शब्द है जिसका अर्थ है बंदरगाह पर टकराने वाली तरंगें. ‘सु’ का मतलब है बंदरगाह और ‘नामी’ का मतलब है तरंग.

Source: News18Hindi Last updated on: September 13, 2020, 1:42 PM IST
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मीडिया में हिंदी का पिंडदान
14 सितंबर को पूरा देश हिन्दी दिवस मनाता है, और अगले ही दिन हिन्दी हमसे कई सवाल कर रही होती है.
जिसकी लाठी उसकी भैंस – यह लोकोक्ति न्याय और निष्पक्षता के बनिस्बत धौंस की सत्ता स्थापित करती है. यह किसी आदिम समाज का सच हो सकता है पर किसी भी सभ्य समाज में यह स्वीकार नहीं हो सकता. वैसे, एक दूसरा सच तो यह भी है कि किसी भी फैसले से हर कोई सहमत और संतुष्ट नहीं हो सकता. फैसला वहीं करने की नौबत आती है, जहां विवाद होता है. विवाद का संबंध हमेशा दो पक्षों से होता है. फैसला जब भी किया जाता है वह किसी एक के पक्ष में होता है. भले उस फैसले का आधार तर्क और सबूत हों. जाहिर है फैसले से एक पक्ष संतुष्ट तो दूसरा असंतुष्ट होता है. कुछ फैसले ऐसे भी होते हैं जो दोनों पक्षों को संतुष्ट कर जाते हैं.

किसी भी भाषा, उसके व्याकरण और उसके शब्दों को लेकर हमारा रुख भी ऐसा ही होना चाहिए कि उसके प्रति कोई दुविधा न रहे, वह सर्वस्वीकार्य हो. व्याकरण का रुख लचीला हो, समय-समय पर वह परिमार्जित होता रहे. पाणिनि ने कहा था कि भाषा लोकप्रचलन की अनुगामिनी होती है. याद करें कि 2004 में हमसब ने ‘सुनामी’ शब्द पहली बार सुना था. उस वक्त पाठकों को समझाने के लिए मीडिया को खबर के साथ यह बताने की जरूरत पड़ी थी कि सुनामी एक जापानी शब्द है जिसका अर्थ है बंदरगाह पर टकराने वाली तरंगें. ‘सु’ का मतलब है बंदरगाह और ‘नामी’ का मतलब है तरंग. लेकिन यही शब्द दस बरस के भीतर हिंदी का मुहावरा बन गया. जब 2014 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को जबर्दस्त बहुमत मिला तो हर तरफ इसे ‘मोदी की सुनामी’ बताया गया. अब यह अलग बात है कि किसी ने ‘सुनामी’ लिखा तो किसी ने ‘सूनामी’.

हिंदी को लेकर जो संभावनाओं का द्वार है वह ऐसी छोटी-मोटी कमियों से आशंकाओं में नहीं बदलता. बीते दिनों एक राष्ट्रीय अखबार के पहले पन्ने पर छपी खबर का एक हिस्सा पढ़ें –
‘परमाणु युद्ध की संभावना : अल जजीरा को दिए साक्षात्कार में इमरान ने एक बार फिर परमाणु युद्ध की धमकी दी. उन्होंने कहा, मैं इस बात को लेकर बिल्कुल स्पष्ट हूं कि जब दो परमाणु शक्ति संपन्न देश पारंपरिक युद्ध लड़ते हैं, तो इसकी परिणीति परमाणु युद्ध में होने की पूरी संभावना बनती है.’
छोटे से इस एक अनुच्छेद में सटीक अभिव्यक्ति के स्तर पर संपादन की तीन चूकें दिख रही हैं. अखबार ने लिखा ‘जब दो परमाणु शक्ति संपन्न देश पारंपरिक युद्ध लड़ते...’ इस वाक्य में ‘दो’ शब्द का इस्तेमाल ‘देश’ के पहले किया जाता तो बेहतर होता. वाक्य ऐसे किया जा सकता था ‘जब परमाणु शक्ति संपन्न दो देश पारंपरिक युद्ध लड़ते हैं…’  दूसरी चूक है ‘परिणीति’. यह शब्द हिंदी में नहीं है. दरअसल, संपादन करने में एक अतिरिक्त मात्रा रह गई है, परिणति शब्द ‘परिणीति’ हो गया.

तीसरी लापरवाही ‘संभावना’ लिखा जाना है. खबर का यह हिस्सा बता रहा है कि इमरान खान आशंका जता रहे हैं न कि संभावना. हमसब लिखने और बोलने में इतने लापरवाह होते गए हैं कि आशंका और संभावना के अंतर की अनदेखी कर जाते हैं. ऐसा नहीं कि अभिव्यक्ति की ऐसी चूकें या शब्दों के प्रति ऐसी लापरवाहियां किसी एक अखबार में रहती हैं. यह हाल तो लगभग सारे अखबारों का है.

ऐसी चूकों की जब जड़ तलाशेंगे तो यह साफ होगा कि जो पत्रकारिता मिशन हुआ करती थी, वह अब ‘प्रफेशनल’ होने के नाम पर भाषा से मजाक कर रही है. अधिकतर मीडिया संस्थानों में संपादक नाम की संस्था भरभरा कर टूटी है. हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में संपादक के नाम पर ऐसे मैनेजर बैठाए गए हैं, जिनकी पसंद भाषा और खबर के बजाए ऐसे कर्मचारी हैं, जो हर बात में उनकी हां में हां मिलाएं. मजेदार बात यह कि इन मैनेजर मार्का संपादकों में भी लेखक के तौर पर अपनी पहचान बनाने की भरपूर चाह है. अपने किसी खास मुलाजिम से अपने नाम पर लेख लिखवाकर किसी प्रकाशक से संग्रह छपवा लेंगे. अब जरा सोचें कि किसी बड़े अखबार का संपादक अगर किसी दूसरे के लिखे लेखों से अपने पांच-पांच संग्रह छपवा कर लेखक बने तो कभी वह अखबार भाषा या खबर के मामले में कितना संवेदनशील होगा.असल मामला संवेदनशीलता का है. कर्मचारी को नौकरी करनी है, घर चलाना है तो ऐसे संपादकों की तानाशाही वह झेल जाता है. पर वह संपादक भाषा के प्रति कितना संवेदनशील होगा, जो दूसरों से लेख लिखवाकर अपना नाम डालने और संग्रह छपवाकर भी शर्मिंदा नहीं होता.

ऐसे ही नेतृत्व का असर है कि अखबार की भाषा इन दिनों बेहद असंवेदनशील होती गई है. मैनेजर मार्का संपादक जब अपने समाचार कक्ष के लिए कर्मचारियों का चयन करते है तो वह पहली बात यह तलाश करता है कि सामने वाला शख्स उसके अखबार में जिस सॉफ्टवेयर पर पन्ने बनाए जाते हैं, उसमें सिद्धहस्त है या नहीं. उनके लिए उसका ज्ञान और भाषा दोयम दर्जे की चीज होती है.
तो ऐसे अखबारों में अभिव्यक्ति का पिंडदान करती हुई भाषा पर गौर करें. अभी हाल ही में पितृपक्ष को लेकर एक टिप्पणी छपी देखी, जिसका शीर्षक था ‘गया में हर शख्स चाहता है पिंडदान’. हमसब की सामान्य जानकारी यह है कि गया शहर पिंडदान के लिए हिंदू परंपरा में खास महत्त्व रखता है. पर इस शीर्षक की अभिव्यक्ति यह है कि गया का हर शख्स पिंडदान करना चाहता है, जबकि पूरी टिप्पणी यह बता रही थी कि देश में रहने वाले हिंदू परंपरा के लोग गया में पिंडदान करना चाहते हैं. इस बात की अभिव्यक्ति ‘हर शख्स चाहता है गया में पिंडदान’ शीर्षक से हो सकती थी.
‘चोर की पिटाई से मौत’ या ‘चाचा की तलवार से काटकर हत्या’ जैसे शीर्षक छपे हुए दिखते हैं. हम खबर पढ़ें या नहीं, पर शीर्षक से सहज अनुमान लगा लेते हैं कि कहीं चोरी करने गए किसी शख्स को लोगों ने इतना पीटा कि उसकी मौत हो गई. या किसी विवाद की वजह से चाचा और भतीजे के बीच झड़प हुई हो, उसके बाद भतीजे ने हत्या कर दी. पर गौर करें कि ये शीर्षक क्या इन्हीं खबरों की अभिव्यक्ति हैं? जवाब न में मिलेगा. ‘चोर की पिटाई से मौत’ शीर्षक में यह जवाब नहीं मिलता कि चोर की पिटाई से कौन मरा. ठीक यही बात ‘चाचा की तलवार से काटकर हत्या’ वाले शीर्षक में भी है कि चाचा की तलवार से काटकर किसने किसकी हत्या की. इन दोनों शीर्षकों की अभिव्यक्ति थोड़ी-सी सजगता से ठीक की जा सकती थी. पहला शीर्षक होना चाहिए था ‘पिटाई से चोर की मौत’, जबकि दूसरे का ‘तलवार से काटकर चाचा की हत्या. अगर हम इस तरह के अभिव्यक्ति दोष को दूर करने की कोशिश नहीं करते हैं तो किसी दिन हमारा बनाया हुआ शीर्षक हास्यास्पद दिखेगा : ‘कुत्तों के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के काफिले के सामने आ जाने से हड़कंप’.

अपराध की खबरों का शीर्षक लगाते वक्त संपादन करने वाला शख्स अनजाने में न्यायाधीश बन जाता है. मसलन, ‘तलवार से चाचा की हत्या कर भतीजा फरार’ या ‘नाबालिग से बलात्कार करने वाला गिरफ्तार’ जैसे शीर्षक अमूमन छपते हैं. इन दोनों शीर्षकों में हम यह मान लेते हैं कि जो फरार है या गिरफ्तार है, वही अपराधी है. संपादन करते वक्त हमें अपनी सीमा और मामले की गंभीरता का ध्यान रखना चाहिए. भतीजे का फरार होना यह साबित नहीं करता कि उसी ने हत्या की है. या गिरफ्तार होने मात्र से यह साबित नहीं हो जाता कि वह बलात्कारी है. यह सबूतों के आधार पर न्यायाधीश को तय करना है कि वाकई वह अपराधी है या कोई और.

ऐसी स्थिति में हमें निर्णयात्मक शीर्षक से बचना चाहिए. अगर हम पुलिस के दावे को न्यायालय का फैसला मान कर शीर्षक लगाएं तो वह पत्रकारिता के मूल्यों के खिलाफ है. हां, ये शीर्षक इसी रूप में छापने हों तो उसे पुलिस के हवाले से ऐसे लिखा जा सकता है ‘तलवार से चाचा की हत्या कर भतीजा फरार : पुलिस’ या ‘नाबालिग से बलात्कार करने वाला गिरफ्तार : पुलिस’. बेहतर हो कि पाठकों के सामने शीर्षक के जरिए हम दो तथ्य रख दें, सोचने और समझने का काम वह खुद कर लेगा. इस तरह, ‘तलवार से चाचा की हत्या, भतीजा फरार’ या ‘नाबालिग से बलात्कार, एक गिरफ्तार’.

वैसे, मेरा भी मानना है कि अखबार जल्दी में लिखा गया साहित्य है, उसे जल्दी से पढ़कर निबटा देना चाहिए. हां, अभिव्यक्ति की चूक से बचने की कोशिश हमें जरूर करनी चाहिए लेकिन टंकण की चूक नजरअंदाज की जा सकती है जबतक कि उस चूक से अनर्थ न हो.
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First published: September 13, 2020, 1:42 PM IST
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