यह धोनी बार-बार हमें चौंकाता क्यों है

धोनी नहीं जानता था कि वह मैच जिता पाएगा, पर वह जानता था कि उसका आउट होना उसकी टीम का हार जाना होगा. ऐसी स्थितियों में अतिरिक्त सतर्कता उसका विकेट बचाए रखती थी और उसकी आक्रामकता गेंद को बार-बार सीमा रेखा के बाहर पहुंचाती रहती थी.

Source: News18Hindi Last updated on: August 18, 2020, 1:02 PM IST
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यह धोनी बार-बार हमें चौंकाता क्यों है
एमएस धोनी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेच से संन्यास ले चुके हैं (फाइल फोटो)
जो लोग झारखंड की संस्कृति और संस्कार को करीब से जानते हैं, उन्हें महेंद्र सिंह धोनी का इस तरह अचानक और चुपचाप इंटरनेशनल क्रिकेट को अलविदा कहना चौंकाया नहीं होगा. दरअसल, जिस तरह धोनी का खेल शास्त्रीयता को मुंह चिढ़ाता रहा है, उसे चुनौती देता रहा है और अपनी स्वाभाविकता की बदौलत पहचान बनाता रहा है, उसी तरह झारखंड के लोगों को शहरी शास्त्रीयता से दूर पाएंगे आप. यह यहां के लोगों की बड़ी पहचान है. यहां के लोग बेशक बहुत मेहनती होते हैं, छल-कपट और शोर-शराबे से दूर होते हैं. दिखावा तो खैर होता ही नहीं है. झारखंडियों की यह प्रकृति झारखंड की हवा में खुशबू की तरह पसरी है. इस पृष्ठभूमि में जब हम धोनी को याद करें, उसके फैसलों को याद करें, उसके खेल को याद करें तो हमें झारखंडी मिट्टी की सोंधी महक अपने नथुने में समाती मिलेगी.

इस टिप्पणी का मकसद धोनी या उसके खेल का शास्त्रीय विवेचन करना नहीं है, बल्कि धोनी के व्यवहार और उसके खेलों में दौड़ रही झारखंडी झलक की ओर इशारा करना भर है. इस टिप्पणी का एक मकसद यह बताना भी है कि आखिर रांची जैसे छोटे कस्बे से निकला माही कैसे धोनी बन पाया और कैसे उसने अपनी पहचान बना ली और क्यों इतनी ऊंचाई पर पहुंचकर अचानक और चुपचाप इंटरनेशनल क्रिकेट को विदा कह गया.

सचिन तेंदुलकर ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि जब पहली बार वह वानखेड़े स्टेडियम में प्रैक्टिस करने पहुंचे थे उसी समय वह जानते थे कि उन्हें टीम इंडिया के लिए खेलना है. ठीक इसके उलट धोनी ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि जब टीम इंडिया में उसका चयन हो गया तो उसने सोचा बस दो-चार मैच खेलने का अवसर मिलेगा. शुरुआती मैचों में खराब प्रदर्शन के बाद उसने मान लिया कि उसकी यात्रा अब थम जाएगी. उसने इतने भर से ही संतोष कर लिया था कि वह टीम इंडिया का हिस्सा बना. इसके बाद, अचानक पाकिस्तान के खिलाफ उसने 148 रन की यादगार पारी खेली. तब उसे पहली बार लगा कि अब 8-10 मैचों के लिए तो टीम इंडिया में उसकी जगह पक्की हो गई.

आखिर क्या वजह थी कि चयन होने से पहले ही तेंदुलकर को भरोसा था कि वे टीम इंडिया का हिस्सा बनेंगे और क्यों धोनी तमाम अंदेशों से घिरा था? सचिन और धोनी के बीच सोच का यह अंतर दरअसल उस मानसिक स्थिति की उपज है जो महानगर और कस्बाई शहर हममें बुनते हैं. उस वक्त तक क्रिकेट की पहचान अभिजात्य शहरों के क्रिकेटरों से थी. गली-मुहल्ले और छोटे से शहर से निकला शख्स यह उम्मीद कर ही नहीं सकता था कि वह भी टीम इंडिया का हिस्सा बन सकता है. पर यह वक्त बदला. छोटे शहर से नाता रखने वाले धोनी नाम के बड़े खिलाड़ी की कौंध ने चयनकर्ताओं को चौंकाया. बाद के दिनों में धोनी ने अपने खेल और फैसलों से लोगों को चौंकने का अवसर बार-बार मुहैया करवाया है.
धोनी की पहचान मैच जिताऊ क्रिकेटर की बनी. विपरीत परिस्थितियों में भी पूरे धैर्य से बल्लेबाजी करता धोनी ताबड़तोड़ रन बनाकर हाथ से निकले मैच को भी अपने पक्ष में कर लेने में माहिर रहा. यही उसका स्वाभाविक खेल था. इंटरनेशनल क्रिकेट में आने से पहले धोनी जिस भी टीम के साथ खेलता रहा, उस टीम की वह रीढ़ रहा. वह नहीं जानता था कि वह मैच जिता पाएगा, पर वह जानता था कि उसका आउट होना उसकी टीम का हार जाना होगा. तो ऐसी ही स्थितियों में उसके साथ पनपती गई वह सतर्कता जो उसका विकेट बचाए रखती थी और वह आक्रामकता जो गेंद को बार-बार सीमा रेखा के बाहर पहुंचाती रहती थी.

रांची के हरमू ग्राउंड में डीएवी की ओर से खेलते हुए जिस टूर्नामेंट में उसने नाबाद दोहरा शतक जड़ा था, उस मैच के कुछ हिस्सों का गवाह रहा हूं मैं. इस बल्लेबाजी को देखने के लिए जबर्दस्त भीड़ थी ग्राउंड में. अमूमन स्कूली मैच में इतनी भीड़ नहीं होती. उस मैच में लगभग तमाम गेंदबाज तमतमाए हुए थे. पूरी ताकत झोंक कर वह गेंद फेंकते और धोनी के बल्ले से टकराकर वह गेंद सनसनाती हुई सीमा रेखा के पार जाती. लगभग हर दूसरी गेंद की हालत यही कर रखी थी धोनी ने. इस मैच के बाद मैंने धोनी को पाकिस्तान के खिलाफ खेलते हुए टीवी पर देखा. उस वक्त नवभारत टाइम्स दिल्ली में आ चुका था मैं. उसकी धमाकेदार बल्लेबाजी का शोर पूरे दफ्तर में गूंज रहा था. मैं भी टीवी के सामने जा खड़ा हुआ. धोनी को खेलते देखा. हरमू ग्राउंड में जिस सहजता से धोनी बॉल को सीमा रेखा के पार पहुंचा रहा था, वही सहजता अब भी उसके खेल में यहां पाकिस्तान के खिलाफ दिख रही थी. हां, उसकी यह सहजता ज्यादा आक्रामक हो चुकी थी.

धोनी की विकेटकीपिंग पर ध्यान दें, उसके स्टंपिंग के तरीके को देखें तो आपको गली-मुहल्ले का क्रिकेट याद आ जाएगा, बचपन की अपनी वे चालाकियां याद आ जाएंगी जो आपने विरोधी टीम के खिलाड़ी को आउट करने के लिए बरती होंगी. धोनी की खासियत यह रही कि उसने इंटरनैशनल क्रिकेट खेलते हुए भी गली-मुहल्ले से निकली तकनीक को सहज भाव से अपने भीतर बसे रहने दिया था और उसे अंतरराष्ट्रीय मैचों में कामयाबी के साथ आजमाया भी.टीम इंडिया की कप्तानी करते हुए धोनी की जो सबसे बड़ी खासियत नजर आती है वह यह कि धोनी महज विकेट के पीछे नहीं रहता था, बल्कि पूरे ग्राउंड पर वह फैला रहता था. विकेट के पीछे रहते हुए वह बल्लेबाज के हाव-भाव पढ़ रहा होता था. मौसम पर नजर रख रहा होता था. हवा के बहाव पर उसकी निगाह होती थी. और इसके बाद मैदान पर ही वह टीम की रणनीति तैयार कर उसे अपने साथियों के बीच बांट लिया करता था. इसी का नतीजा है कि मैदान के हर हिस्से में धोनी खेलता हुआ नजर आता था.

तो मैच जिताऊ की उसकी जो छवि है, वह ओढ़ी हुई नहीं है. बल्कि उसकी रगो में वह माद्दा स्कूली दिनों से दौड़ रहा है कि अपनी टीम को किसी सार्थक अंत तक पहुंचाना है. खास बात यह कि अपने इस खेल का उसने कभी दंभ नहीं भरा. उसकी छवि तो हमने अपने भीतर नायक की रच डाली. एक ऐसे नायक की जो कभी हारता नहीं, जो सिर्फ हमारी उम्मीदों पर खरा उतरता है. ऐसे में नायकत्व के बहुत ऊंचे पायदान पर हमने धोनी को बैठा लिया. पर धोनी तो ठहरा ठेठ झारखंडी. उसे अपने नायक होने का जरा भी गुमान नहीं रहा, वह तो आम इनसान है. सादगी उसकी पसंद है. तामझाम और दिखावे से वह कोसों दूर है. इसीलिए तो उसने इतनी सादगी के साथ इंटरनैशनल क्रिकेट को अलविदा कह दिया.

जाहिर है धोनी का क्रिकेट उस झारखंड की पैदाइश है जहां अभावों में जिंदगी काटते आदिवासी रहते हैं. पर ये आदिवासी कहीं से कमजोर नहीं हैं. जो है, जितना है उसका बेहतर उपयोग करना वह जानते हैं. तीरंदाजी की दुनिया में नाम कमा चुकी रांची के रातू की दीपिका को याद करें. उसने आम के टिकोरों पर पत्थरों से निशाना साधना सीखा. धोनी इसी पथरीले झारखंड की पैदाइश है, जो चट्टानों से खौफ नहीं खाता बल्कि बहुत मेहनत से खुरच कर उसपर अपना नाम उगा लेता है. इस लिहाज से देखें तो धोनी झारखंडी तेवर का प्रतिनिधि चरित्र है और उसने क्रिकेट की जमीन पर अपना नाम ऐसे उगा लिया है कि सादगी से ली गई विदाई उस नाम को और चमकाती है, उसका और सम्मान बढ़ाती है. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
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First published: August 18, 2020, 1:02 PM IST
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